वैश्विक बाजारों की नजर जिस फैसले पर टिकी थी, वह आखिरकार सामने आ गया। Federal Reserve (फेडरल रिजर्व) ने एक बार फिर ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। 2026 में यह लगातार तीसरी बार है जब केंद्रीय बैंक ने अपनी पॉलिसी रेट्स को जस का तस बनाए रखा है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक जटिल दौर से गुजर रही है—एक तरफ महंगाई का दबाव बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ रोजगार के आंकड़े स्थिर लेकिन अनिश्चित संकेत दे रहे हैं। ऐसे माहौल में फेड का यह रुख बाजारों के लिए संकेत देता है कि जल्दबाजी में कोई बड़ा कदम उठाने की तैयारी नहीं है।
दरें क्यों नहीं बदली गईं?
फेड ने फेडरल फंड्स रेट को 3.5% से 3.75% की रेंज में बरकरार रखा है। यह वही दर है जिस पर बैंक आपस में अल्पकालिक कर्ज लेते-देते हैं और इसका सीधा असर लोन, होम लोन, क्रेडिट कार्ड और निवेश पर पड़ता है।
इस फैसले के पीछे कई वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह है महंगाई, जो अभी भी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आई है। फेड का मानना है कि अगर इस समय दरों में कटौती की जाती है, तो महंगाई फिर से तेजी पकड़ सकती है।
दूसरी ओर, रोजगार के आंकड़े पूरी तरह कमजोर भी नहीं हैं। नौकरी बाजार में धीमी लेकिन स्थिर वृद्धि हो रही है, जो यह संकेत देती है कि अर्थव्यवस्था अभी दबाव में जरूर है, लेकिन कमजोर नहीं हुई है।
बाजार पहले से तैयार था
दिलचस्प बात यह है कि बाजार इस फैसले के लिए पहले से तैयार था। CME Group के FedWatch टूल ने पहले ही 100% संभावना जताई थी कि दरों में कोई बदलाव नहीं होगा।
इसका मतलब साफ है—निवेशक और बड़े फंड हाउस पहले से ही इस स्थिर रुख को अपनी रणनीति में शामिल कर चुके थे। इसलिए फैसले के बाद बाजार में कोई बड़ा झटका देखने को नहीं मिला।
नेतृत्व में बदलाव का असर
यह बैठक कई मायनों में खास भी रही। Jerome Powell के कार्यकाल की यह आखिरी बैठकों में से एक मानी जा रही है। करीब आठ साल तक फेड की कमान संभालने के बाद उनका कार्यकाल मई में खत्म होने वाला है।
उनकी जगह Kevin Warsh का नाम आगे बढ़ाया गया है, जिन्हें Donald Trump ने नामित किया है। अगर सब कुछ तय योजना के अनुसार होता है, तो अगले महीने फेड की नीति दिशा में बदलाव देखने को मिल सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे ब्याज दरों का रुख क्या होगा।
कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि 2026 के अंत तक या संभवतः 2027 तक फेड दरों में कटौती करने से बच सकता है। इसके पीछे कारण है लगातार ऊंची बनी हुई महंगाई और वैश्विक अस्थिरता।
अगर महंगाई नियंत्रण में नहीं आती, तो फेड के पास दरें ऊंची रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। वहीं अगर आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ती है, तो दरों में कटौती का रास्ता खुल सकता है।
भारत और वैश्विक बाजारों पर असर
फेड का हर फैसला सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहता। इसका असर भारत सहित दुनियाभर के बाजारों पर पड़ता है।
- डॉलर मजबूत बना रह सकता है
- विदेशी निवेश (FII) का रुख बदल सकता है
- भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है
- रुपये पर दबाव बना रह सकता है
यानी फेड का यह “कोई बदलाव नहीं” वाला फैसला भी बाजारों के लिए काफी मायने रखता है।
निष्कर्ष
फेडरल रिजर्व का यह कदम बताता है कि फिलहाल “रुको और देखो” की रणनीति अपनाई जा रही है। महंगाई अभी भी केंद्रीय चिंता बनी हुई है और जब तक इसमें स्पष्ट गिरावट नहीं दिखती, तब तक ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कम ही है।
आने वाले महीनों में नया नेतृत्व, महंगाई के आंकड़े और वैश्विक हालात तय करेंगे कि फेड अगला कदम क्या उठाता है।
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