नई दिल्ली, 26 अप्रैल : भारत के औद्योगिक उत्पादन (Index of Industrial Production – IIP) की वृद्धि दर मार्च 2026 में धीमी होकर लगभग 2 प्रतिशत सालाना रहने का अनुमान लगाया गया है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (UBI) की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट मुख्य रूप से विनिर्माण (manufacturing) और ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक कमजोरी, बढ़ती इनपुट लागत और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के कारण देखने को मिल सकती है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि फरवरी 2026 में जहां IIP ग्रोथ 5.2 प्रतिशत रही थी, वहीं मार्च में यह काफी घटकर 2 प्रतिशत तक आ सकती है। एक साल पहले मार्च 2025 में यह आंकड़ा 3.9 प्रतिशत था। इस गिरावट से संकेत मिलता है कि भारतीय औद्योगिक क्षेत्र पर लागत दबाव और मांग में सुस्ती का असर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
कोर सेक्टर में गिरावट से बढ़ी चिंता
औद्योगिक उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत योगदान देने वाला कोर सेक्टर मार्च में 0.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज कर सकता है, जो पिछले 19 महीनों में सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। फरवरी में यह सेक्टर 2.8 प्रतिशत की वृद्धि पर था, जबकि पिछले साल मार्च में 4.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
हालांकि प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, स्टील और सीमेंट जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक वृद्धि देखने को मिली, लेकिन कोयला, कच्चा तेल, उर्वरक और बिजली उत्पादन में गिरावट ने समग्र प्रदर्शन को प्रभावित किया। खास बात यह रही कि महीने-दर-महीने आधार पर उर्वरक उत्पादन में 25.9 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई।
हाई-फ्रीक्वेंसी संकेत मिले-जुले
रिपोर्ट के अनुसार, उच्च आवृत्ति (high-frequency) आर्थिक संकेतकों में मिश्रित रुझान देखने को मिला। ई-वे बिल जनरेशन मार्च में 12.9 प्रतिशत बढ़ा, हालांकि यह फरवरी के 18.8 प्रतिशत की तुलना में धीमा रहा। इसका कारण GST दरों में सुधार और माल परिवहन में निरंतर गतिविधि बताया गया है।
GST संग्रह भी 8.8 प्रतिशत बढ़कर फरवरी के 8.1 प्रतिशत से आगे रहा, जो उपभोग और कर अनुपालन में सुधार का संकेत देता है। यह दर्शाता है कि घरेलू मांग अभी भी पूरी तरह कमजोर नहीं हुई है।
ईंधन और ऊर्जा मांग में उतार-चढ़ाव
ईंधन खपत में भी अस्थिरता देखी गई। पेट्रोल और डीजल की खपत क्रमशः 7.6 प्रतिशत और 8 प्रतिशत बढ़ी, जिसका कारण पश्चिम एशिया में तनाव के चलते आपूर्ति बाधाओं की आशंका के बीच अग्रिम खरीदारी बताया गया।
हालांकि कुल पेट्रोलियम खपत घटकर 2.2 प्रतिशत पर आ गई, जो फरवरी में 5.5 प्रतिशत थी। इसका प्रमुख कारण विमानन ईंधन (ATF) की मांग में तेज गिरावट रही, क्योंकि कई उड़ानें रद्द की गईं। वहीं बिजली की मांग भी सामान्य रही क्योंकि मार्च के पहले 25 दिनों में सामान्य से अधिक बारिश हुई, जिससे कूलिंग की आवश्यकता कम रही।
विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में धीमापन
मैन्युफैक्चरिंग PMI मार्च में घटकर 53.9 पर आ गया, जो जून 2022 के बाद सबसे निचला स्तर है। फरवरी में यह 56.9 था। नए ऑर्डर और उत्पादन वृद्धि में कमी इसका प्रमुख कारण रही।
सेवा क्षेत्र का PMI भी 58.1 से घटकर 57.5 पर आ गया, जिससे संकेत मिलता है कि अर्थव्यवस्था के प्रमुख सेक्टरों में गति थोड़ी धीमी हो रही है।
ऑटोमोबाइल सेक्टर में स्थिरता
हालांकि समग्र औद्योगिक उत्पादन पर दबाव है, लेकिन ऑटोमोबाइल सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। दोपहिया वाहनों का उत्पादन फरवरी में 22 प्रतिशत बढ़ा, जबकि ट्रैक्टर उत्पादन 28.6 प्रतिशत तक बढ़ा। हालांकि यह वृद्धि पिछले महीने के 80 प्रतिशत के उछाल से कम है।
यात्री वाहनों का उत्पादन 9 प्रतिशत बढ़ा, जबकि रिटेल बिक्री में भी ग्रामीण मांग मजबूत बनी रही। दोपहिया बिक्री 28.7 प्रतिशत बढ़ी, जबकि यात्री वाहनों की बिक्री 21.5 प्रतिशत पर धीमी हो गई।
व्यापार घाटा घटा, लेकिन निर्यात दबाव में
मार्च में भारत का व्यापार घाटा घटकर 20.67 अरब डॉलर पर आ गया, जो फरवरी में 27.10 अरब डॉलर था। हालांकि यह गिरावट मुख्य रूप से निर्यात और आयात दोनों में कमी के कारण हुई है।
निर्यात 7.4 प्रतिशत और आयात 6.5 प्रतिशत घटा, जो वैश्विक मांग में कमजोरी की ओर संकेत करता है।
आगे की संभावनाएँ और जोखिम
UBI रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक उत्पादन में कमजोरी का मुख्य कारण ऊर्जा क्षेत्र की गिरावट और विनिर्माण में आपूर्ति बाधाएँ हैं। हालांकि सरकार द्वारा किए जा रहे पूंजीगत खर्च (capex) से इंफ्रास्ट्रक्चर और कैपिटल गुड्स सेक्टर को समर्थन मिल रहा है।
लेकिन जोखिम भी बने हुए हैं, जैसे कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, गैस की संभावित कमी, कमजोर वैश्विक मांग और निर्यात में सुस्ती। दूसरी ओर, तेज इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, नीति समर्थन और निवेश में वृद्धि इस गिरावट को कुछ हद तक संतुलित कर सकते हैं।
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