नई दिल्ली, अप्रैल 2026: भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रोथ की सबसे अहम धुरी—राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण—इस बार अपेक्षा के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर पाया। Ministry of Road Transport and Highways (MoRTH) वित्त वर्ष 2025-26 में तय 10,000 किलोमीटर के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका और कुल निर्माण 9,380 किलोमीटर पर सिमट गया।
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, इस कमी की सबसे बड़ी वजह जमीन अधिग्रहण में देरी और जरूरी पर्यावरणीय व प्रशासनिक मंजूरियों का समय पर न मिलना रहा। यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की चुनौती को उजागर करती है, जिस पर भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की पूरी रणनीति टिकी हुई है।
आंकड़ों में गिरावट: पिछले वर्षों की तुलना क्या कहती है?
अगर पिछले चार वर्षों के हाईवे निर्माण डेटा को देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि FY26 का प्रदर्शन एक स्पष्ट slowdown को दर्शाता है।
2023-24 में जहां 12,349 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाए गए थे, वहीं 2024-25 में यह घटकर 10,660 किलोमीटर रह गया। FY22-23 में यह आंकड़ा 10,331 किलोमीटर था।
इन सबके मुकाबले FY26 का 9,380 किलोमीटर का आंकड़ा न सिर्फ लक्ष्य से कम है, बल्कि 2017-18 के बाद का सबसे निचला स्तर भी है, जब 9,829 किलोमीटर निर्माण हुआ था।
इसका सीधा मतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में जो हाईवे निर्माण की गति बनी हुई थी, उसमें अब स्पष्ट गिरावट देखी जा रही है।
जमीन अधिग्रहण: विकास का सबसे बड़ा रोडब्लॉक
भारत में किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी चुनौती जमीन अधिग्रहण रही है, और इस बार भी यही सबसे बड़ा कारण बनकर सामने आया है।
हाईवे प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों हेक्टेयर जमीन की जरूरत होती है, जिसमें:
- किसानों से भूमि अधिग्रहण
- मुआवज़े पर विवाद
- कानूनी प्रक्रियाएं
- राज्य और केंद्र के बीच समन्वय
जैसी कई जटिलताएं शामिल होती हैं।
इन प्रक्रियाओं में देरी का सीधा असर प्रोजेक्ट की शुरुआत और उसकी प्रगति पर पड़ता है।
कई मामलों में प्रोजेक्ट की घोषणा तो हो जाती है, लेकिन जमीन उपलब्ध न होने के कारण काम शुरू ही नहीं हो पाता।
प्रोजेक्ट अवॉर्डिंग में गिरावट: असली संकेत यहीं छिपा है
हाईवे निर्माण की रफ्तार केवल निर्माण पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि कितने नए प्रोजेक्ट्स दिए जा रहे हैं।
यहां सबसे बड़ा गिरावट देखने को मिली है।
इसका मतलब यह है कि आने वाले वर्षों में भी निर्माण की रफ्तार पर असर पड़ सकता है, क्योंकि pipeline में नए प्रोजेक्ट्स की कमी है।
National Highways Authority of India की भूमिका और चुनौतियां
भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास का जिम्मा काफी हद तक National Highways Authority of India पर होता है।
हालांकि, हाल के वर्षों में NHAI को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है:
- बढ़ती परियोजना लागत
- फाइनेंसिंग दबाव
- PPP मॉडल में निजी निवेश की सीमाएं
इन कारकों ने परियोजनाओं के execution को प्रभावित किया है और अप्रत्यक्ष रूप से निर्माण गति को धीमा किया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था पर असर
हाईवे केवल सड़कें नहीं होते, बल्कि वे आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं।
जब हाईवे निर्माण धीमा होता है, तो इसका असर कई स्तरों पर पड़ता है:
- लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ती है
- सप्लाई चेन प्रभावित होती है
- औद्योगिक निवेश की गति धीमी पड़ती है
भारत जैसे तेजी से बढ़ते देश के लिए यह एक रणनीतिक चिंता का विषय है।
NewsJagran Analysis: क्या यह अस्थायी झटका है या बड़ा संकेत?
यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या FY26 का यह slowdown एक अस्थायी समस्या है या एक बड़े structural issue का संकेत।
अगर गहराई से देखा जाए, तो समस्या केवल एक साल की नहीं है, बल्कि यह कई वर्षों से बनती आ रही है:
- जमीन अधिग्रहण की पुरानी समस्या
- मंजूरी प्रक्रियाओं की जटिलता
- प्रोजेक्ट प्लानिंग और execution में अंतर
इसलिए यह slowdown एक “warning signal” भी हो सकता है कि सिस्टम में सुधार की जरूरत है।
सरकार के लिए आगे की राह
अगर सरकार हाईवे निर्माण की गति को फिर से बढ़ाना चाहती है, तो उसे कुछ बड़े सुधार करने होंगे:
- land acquisition process को तेज़ और पारदर्शी बनाना
- single-window clearance system लागू करना
- state और centre के बीच बेहतर coordination
- private sector participation को बढ़ाना
ये कदम न केवल मौजूदा प्रोजेक्ट्स को तेज़ करेंगे, बल्कि भविष्य की pipeline को भी मजबूत करेंगे।
भविष्य का परिदृश्य
भारत ने पिछले एक दशक में इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में तेजी से प्रगति की है, और हाईवे निर्माण इसका प्रमुख हिस्सा रहा है।
हालांकि FY26 का आंकड़ा गिरावट दिखाता है, लेकिन:
- ongoing projects
- expressway development
- government investment plans
यह संकेत देते हैं कि long-term growth story अभी भी intact है।
निष्कर्ष
Ministry of Road Transport and Highways द्वारा FY26 में लक्ष्य से पीछे रहना केवल एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि एक systemic challenge का संकेत है।
जमीन अधिग्रहण और प्रोजेक्ट अप्रूवल जैसी समस्याएं अगर समय पर हल नहीं की गईं, तो यह भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की गति को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती हैं।
हालांकि, सही सुधारों के साथ यह slowdown एक अस्थायी चरण भी साबित हो सकता है।
Disclaimer
यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है।
Also Read:


