India GDP Growth: भारत की अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार के बीच वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में दर्ज 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ को लेकर बहस तेज हो गई है। पूर्व चीफ स्टैटिस्टिशियन प्रणब सेन ने इस आंकड़े को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। उनका सवाल सीधे विकास दर के आंकड़े पर नहीं, बल्कि उसे निकालने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे डेटा, कीमतों के समायोजन और गणना की प्रक्रिया पर है।
सेन का कहना है कि उन्हें पहली तिमाही की 7.8 फीसदी वास्तविक GDP वृद्धि को स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल लगता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति नॉमिनल GDP से नहीं है। उनका मुख्य सवाल यह है कि नॉमिनल GDP को कीमतों में बदलाव के हिसाब से समायोजित करके रियल GDP में बदलने की प्रक्रिया कितनी सटीक है।
GDP आंकड़ों में ‘अपवर्ड बायस’ का दावा
प्रणब सेन ने सरकारी GDP अनुमानों में लंबे समय से दिखने वाले एक संभावित अपवर्ड बायस की ओर ध्यान दिलाया है। उनके अनुसार, जब पिछली GDP सीरीज के बेस में बदलाव किए गए, तब करीब 2 से 3 फीसदी तक अधिक अनुमान सामने आने की समस्या देखी गई।
उनका तर्क है कि यदि ऐसा अंतर बार-बार दिखाई देता है तो यह केवल संयोग नहीं हो सकता। संभव है कि GDP की गणना में इस्तेमाल होने वाली मौजूदा प्रक्रिया में ही कुछ ऐसा हो, जिससे आर्थिक वृद्धि का अनुमान वास्तविकता से अधिक निकलता हो।
हालांकि, सेन ने यह भी कहा कि GDP सीरीज में संशोधन अपने आप में किसी तरह की गड़बड़ी या हेरफेर का प्रमाण नहीं है। शुरुआती तिमाही आंकड़े सीमित जानकारी पर आधारित होते हैं और बाद में अधिक डेटा उपलब्ध होने पर उनमें संशोधन किया जाना सामान्य प्रक्रिया है।
GDP के नए बेस पर भी सवाल
प्रणब सेन के मुताबिक हालिया GDP सीरीज में किया गया बेस और पद्धति से जुड़ा बदलाव काफी बड़ा है। इसी वजह से यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या पिछले वर्षों की आर्थिक वृद्धि को भी मौजूदा पद्धति के अनुरूप दोबारा मापा जाना चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां बैक सीरीज की जरूरत सामने आती है। यदि पुरानी अवधि के GDP आंकड़ों को नई पद्धति से दोबारा तैयार किया जाए, तो यह पता लगाना आसान होगा कि नई गणना प्रणाली से भारत की ऐतिहासिक विकास दर में कितना अंतर आया है।
‘डबल डिफ्लेशन’ सिस्टम पर भी चिंता
सेन ने GDP की गणना में इस्तेमाल होने वाली डबल डिफ्लेशन पद्धति को लेकर भी सवाल उठाए हैं। इस प्रणाली में अर्थव्यवस्था के आउटपुट और उसमें इस्तेमाल होने वाले इनपुट की कीमतों में बदलाव को अलग-अलग समायोजित किया जाता है।
सैद्धांतिक रूप से यह तरीका आर्थिक गतिविधियों की वास्तविक तस्वीर सामने लाने में मदद कर सकता है। लेकिन सेन का सवाल इसके इस्तेमाल के लिए जरूरी डेटा की उपलब्धता को लेकर है।
उनका कहना है कि पहले भारत के सामने बड़ी समस्या यह थी कि आवश्यक स्तर की विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं थी। अब डेटा कलेक्शन में कितना सुधार हुआ है और क्या नई पद्धति को लागू करने के लिए पर्याप्त डेटा मौजूद है, इस पर अधिक पारदर्शिता की जरूरत है।
प्रॉक्सी डेटा के इस्तेमाल पर भी सवाल
GDP की गणना के दौरान कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष आंकड़े उपलब्ध नहीं होने पर वैकल्पिक या प्रॉक्सी डेटा का इस्तेमाल किया जाता है। सेन ने इसी प्रक्रिया को लेकर भी चिंता जताई है।
उनके मुताबिक, यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन क्षेत्रों में किस तरह के प्रॉक्सी आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है और उनका GDP गणना पर क्या प्रभाव पड़ता है।
इससे GDP के आंकड़ों को समझने वाले अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों के लिए गणना की पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होगी।
7.8% GDP ग्रोथ पर क्या है विवाद?
पहली तिमाही में 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ सामने आने के बाद कुछ विशेषज्ञों ने इसकी तुलना पुराने GDP अनुमानों से करने की कोशिश की। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की ओर से भी एक अलग गणना सामने रखी गई थी, जिसमें पुराने अनुमान को आधार बनाकर वास्तविक वृद्धि काफी कम होने की बात कही गई थी।
हालांकि, प्रणब सेन इस तुलना से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि पुरानी GDP सीरीज के आंकड़े को नई सीरीज के साथ सीधे तुलना के लिए इस्तेमाल करना सैद्धांतिक रूप से सही नहीं है।
उनके अनुसार, जब GDP का बेस और सीरीज बदल जाती है तो पिछली अवधि के आंकड़ों को भी संशोधित किया जाता है। इसलिए नई GDP ग्रोथ की तुलना के लिए उसी सीरीज के संशोधित आंकड़ों को आधार बनाया जाना चाहिए।
GDP में संशोधन को हेरफेर मानना सही नहीं
प्रणब सेन ने GDP आंकड़ों में होने वाले संशोधनों को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही है। उनके मुताबिक, आंकड़ों में बदलाव होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उन्हें जानबूझकर बदला गया है।
तिमाही GDP का शुरुआती अनुमान सीमित उपलब्ध जानकारी पर तैयार किया जाता है। इसके बाद जैसे-जैसे कंपनियों, उद्योगों और अन्य आर्थिक गतिविधियों से ज्यादा आंकड़े मिलते हैं, अनुमान को अपडेट किया जाता है।
इसलिए GDP के शुरुआती और बाद के अनुमानों में अंतर होना सांख्यिकी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
पांच साल तक दोनों तरीकों से GDP जारी करने का सुझाव
GDP गणना को ज्यादा पारदर्शी बनाने के लिए सेन ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। उनका कहना है कि सरकार को करीब पांच वर्षों तक पुरानी और नई दोनों पद्धतियों के आधार पर GDP के आंकड़े जारी करने चाहिए।
इससे अर्थशास्त्रियों और बाजार विश्लेषकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि नई गणना पद्धति ने GDP ग्रोथ के आंकड़ों को किस हद तक प्रभावित किया है।
ऐसी तुलना से नीति निर्माताओं और आम लोगों के लिए भी GDP के आंकड़ों को समझना आसान होगा।
क्यों जरूरी है GDP की बैक सीरीज?
सेन के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले कुछ वर्षों में वास्तव में कैसा प्रदर्शन किया, इसका बेहतर आकलन करने के लिए नई पद्धति के आधार पर ऐतिहासिक GDP बैक सीरीज तैयार करना जरूरी है।
जब तक यह बैक सीरीज उपलब्ध नहीं होती, तब तक पुरानी और नई GDP गणना के बीच तुलना को लेकर सवाल बने रह सकते हैं।
निष्कर्ष
भारत की 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती को दिखाने वाला महत्वपूर्ण आंकड़ा है, लेकिन इसके साथ GDP की गणना की पद्धति और डेटा की गुणवत्ता पर चर्चा भी जरूरी है। प्रणब सेन की आपत्तियां मुख्य रूप से आंकड़ों की पारदर्शिता, डबल डिफ्लेशन, प्रॉक्सी डेटा और नई GDP सीरीज के ऐतिहासिक प्रभाव से जुड़ी हैं।
ऐसे में आने वाले समय में बैक सीरीज और गणना प्रक्रिया की ज्यादा पारदर्शिता यह समझने में अहम भूमिका निभा सकती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक विकास दर क्या रही है।


