Gold Reserves: दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने सोने के भंडार की लोकेशन को लेकर नई रणनीति अपना रहे हैं। यूरोप के कुछ देशों ने अमेरिका में रखे अपने गोल्ड रिजर्व का हिस्सा वापस मंगाना शुरू किया है। नीदरलैंड्स ने हाल ही में अमेरिका और कनाडा से करीब 86 टन सोना निकालकर लंदन पहुंचाया। इससे पहले फ्रांस भी न्यूयॉर्क से बड़ी मात्रा में सोना यूरोप वापस ला चुका है।
इन घटनाक्रमों के बीच सवाल उठ रहा है कि आखिर यूरोपीय देश अमेरिका से अपना सोना क्यों निकाल रहे हैं? क्या उन्हें विदेशों में रखे गोल्ड रिजर्व की सुरक्षा को लेकर चिंता है? और क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दूसरे देशों के अमेरिका में रखे गोल्ड रिजर्व को जब्त कर सकते हैं?
भारत की स्थिति भी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपने गोल्ड रिजर्व का कुछ हिस्सा विदेशों में रखता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत में रखे सोने की मात्रा में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
नीदरलैंड्स ने क्यों वापस मंगाया अपना सोना?
नीदरलैंड्स का फैसला यूरोप में बदलती गोल्ड-रिजर्व रणनीति का अहम उदाहरण माना जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, देश ने अमेरिका और कनाडा में रखे करीब 86 टन सोने को लंदन ट्रांसफर किया है।
डच केंद्रीय बैंक के मुताबिक, इस कदम का उद्देश्य किसी गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट की स्थिति में अपने गोल्ड रिजर्व को अधिक आसानी से उपलब्ध रखना है। नीदरलैंड्स के पास कुल मिलाकर करीब 313 टन सोने का रिजर्व है।
यह फैसला किसी सामान्य परिस्थिति में सोने को इस्तेमाल करने की तैयारी के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे संकट के समय रिजर्व एसेट पर बेहतर नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति माना जा रहा है।
यूरोप के दूसरे देश भी बदल रहे हैं रणनीति
नीदरलैंड्स का फैसला अकेला नहीं है। यूरोप के कुछ अन्य देशों ने भी पिछले वर्षों में विदेशों में रखे अपने गोल्ड रिजर्व की समीक्षा की है।
जर्मनी लंबे समय से अपने गोल्ड रिजर्व के एक हिस्से को न्यूयॉर्क और पेरिस से वापस देश में लाने की रणनीति पर काम कर चुका है। इसी तरह फ्रांस ने भी अमेरिका में रखे सोने का एक हिस्सा यूरोप वापस भेजा है।
इटली भी इस चर्चा में अहम है। उसके पास दुनिया के सबसे बड़े केंद्रीय बैंक गोल्ड रिजर्व में से एक है और उसके सोने का एक बड़ा हिस्सा विदेशों में रखा गया है।
इस बदलाव के पीछे सिर्फ अमेरिका पर अविश्वास को वजह मानना सही नहीं होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, जियोपॉलिटिकल तनाव, युद्ध, व्यापारिक विवाद, महंगाई, ब्याज दरें और संकट के समय सोने को तेजी से ट्रेड करने की जरूरत जैसे कई कारण मिलकर केंद्रीय बैंकों की रणनीति को प्रभावित कर रहे हैं।
लंदन क्यों बन रहा है गोल्ड का पसंदीदा ठिकाना?
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका से निकाला गया सोना जरूरी नहीं कि सीधे अपने देश में ही वापस लाया जाए। लंदन भी केंद्रीय बैंकों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बन रहा है।
लंदन दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड ट्रेडिंग सेंटर में शामिल है। इसके अलावा बैंक ऑफ इंग्लैंड के वॉल्ट में दुनिया के कई केंद्रीय बैंकों और अन्य संस्थानों का सोना रखा जाता है।
इसका एक बड़ा फायदा यह है कि जरूरत पड़ने पर सोने को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपेक्षाकृत आसानी से ट्रेड किया जा सकता है। इसलिए किसी देश के लिए गोल्ड को घरेलू वॉल्ट में रखना और कुछ हिस्सा बड़े अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग सेंटर में रखना—दोनों रणनीतियों का अपना महत्व है।
केंद्रीय बैंक तेजी से खरीद रहे हैं सोना
दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की सोने में दिलचस्पी पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, केंद्रीय बैंकों ने हाल के वर्षों में औसतन करीब 1,000 टन सोना सालाना खरीदा है।
यह पिछले दशक के औसत की तुलना में काफी ज्यादा है। केंद्रीय बैंक डॉलर और दूसरी विदेशी परिसंपत्तियों के साथ अपने रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी को भी अहम मान रहे हैं।
सोने को किसी दूसरे देश की सरकार या वित्तीय संस्था की देनदारी नहीं माना जाता। इसी वजह से इसे लंबे समय से एक सुरक्षित रिजर्व एसेट के रूप में देखा जाता है।
भारत के पास कितना गोल्ड रिजर्व है?
भारत भी पिछले कुछ वर्षों में अपने गोल्ड रिजर्व की संरचना में बदलाव कर रहा है।
RBI की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2026 तक भारतीय रिजर्व बैंक के पास 880.52 टन सोना था।
इसमें से:
- 312.32 टन सोना भारत में जारी किए गए नोटों के बैकअप के तौर पर रखा गया था।
- 367.73 टन सोना RBI के बैंकिंग विभाग की संपत्ति के रूप में देश में रखा गया था।
- कुल मिलाकर 680.05 टन, यानी करीब 77 फीसदी सोना भारत में रखा गया था।
- करीब 200.47 टन सोना विदेशों में रखा गया था।
इससे साफ है कि भारत का अधिकांश गोल्ड रिजर्व अब देश के भीतर रखा हुआ है।
एक साल में भारत के गोल्ड रिजर्व में क्या बदला?
भारत के गोल्ड रिजर्व की लोकेशन में पिछले कुछ समय में महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है।
मार्च 2025 में RBI के आंकड़ों के मुताबिक करीब 511.98 टन सोना भारत में और करीब 367.60 टन विदेशों में रखा गया था। इसके बाद मार्च 2026 तक घरेलू स्तर पर रखे सोने की मात्रा बढ़कर 680.05 टन हो गई।
यानी एक साल के दौरान भारत में रखे गोल्ड रिजर्व में करीब 168 टन की बढ़ोतरी हुई। वहीं कुल गोल्ड होल्डिंग में बदलाव बहुत सीमित रहा।
RBI ने अपनी रिपोर्ट में इस बदलाव की विस्तृत वजह स्पष्ट नहीं की है। इसलिए इसे किसी एक भू-राजनीतिक घटना से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
क्या ट्रंप दूसरे देशों का सोना जब्त कर सकते हैं?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है।
अमेरिका में दूसरे देशों के केंद्रीय बैंकों का सोना सुरक्षित वॉल्ट में रखा जाता है। लेकिन किसी देश का सोना अमेरिका में रखा होने का मतलब यह नहीं है कि वह अपने आप अमेरिकी सरकार की संपत्ति बन जाता है।
हालांकि, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक इस बात पर जरूर विचार कर रहे हैं कि संकट की स्थिति में विदेशी क्षेत्राधिकार में रखी संपत्तियों तक उनकी पहुंच कितनी सुरक्षित रहेगी।
2022 में रूस के केंद्रीय बैंक की विदेशी संपत्तियों को पश्चिमी देशों द्वारा फ्रीज किए जाने की घटना ने इस बहस को और तेज किया। इस घटनाक्रम के बाद कई देशों ने विदेशों में रखी अपनी रिजर्व संपत्तियों से जुड़े जोखिमों पर दोबारा विचार किया।
यही वजह है कि कुछ विशेषज्ञ अब गोल्ड रिजर्व के मामले में ‘फिजिकल कंट्रोल’ को भी महत्वपूर्ण मानते हैं।
क्या यूरोप में मची है अमेरिका से सोना निकालने की ‘भगदड़’?
इसे सीधे तौर पर भगदड़ कहना शायद सही नहीं होगा।
जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड्स के फैसले बताते हैं कि कुछ यूरोपीय केंद्रीय बैंक अपने गोल्ड रिजर्व की लोकेशन को लेकर अधिक सक्रिय रणनीति अपना रहे हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी देश अमेरिका से अपना सोना निकाल रहे हैं या अमेरिकी वॉल्ट पर भरोसा खत्म हो गया है।
न्यूयॉर्क और लंदन दोनों ही दुनिया के प्रमुख गोल्ड सेंटर हैं। इन जगहों पर सोना रखने का फायदा यह भी है कि जरूरत पड़ने पर इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसलिए केंद्रीय बैंकों के लिए असली सवाल सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि सुरक्षा, पहुंच, ट्रेडिंग और भू-राजनीतिक जोखिम के बीच संतुलन बनाने का है।
सोने की कीमतों में भी जबरदस्त तेजी
गोल्ड रिजर्व को लेकर बढ़ती दिलचस्पी ऐसे समय में सामने आई है जब सोने की कीमतों ने भी हाल के वर्षों में रिकॉर्ड स्तर देखे हैं।
2026 की शुरुआत में सोने की कीमत 5,000 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के ऊपर चली गई थी। फरवरी में यह महंगाई के हिसाब से समायोजित स्तर पर करीब 5,394 डॉलर तक पहुंचने की बात सामने आई।
बाद में कीमतों में गिरावट आई और जुलाई तक सोना करीब 4,046 डॉलर प्रति औंस के आसपास आ गया। हालांकि, ऐतिहासिक औसत की तुलना में यह अभी भी काफी ऊंचा स्तर था।
गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने 2026 के अंत तक सोने की कीमत करीब 4,900 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस तक पहुंचने का अनुमान जताया है।
भारत के लिए क्या है इसका मतलब?
भारत के मामले में फिलहाल तस्वीर यूरोप के कुछ देशों से अलग दिखाई देती है। RBI ने पिछले वर्षों में अपने गोल्ड रिजर्व का बड़ा हिस्सा देश के भीतर रखा है और मार्च 2026 तक करीब 77 फीसदी सोना भारत में मौजूद था।
विदेश में रखा करीब 200.47 टन सोना भी रिजर्व मैनेजमेंट का हिस्सा है। विदेशी वॉल्ट में गोल्ड रखने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में जरूरत के समय उसे इस्तेमाल करना आसान हो सकता है।
इसलिए भारत का मॉडल पूरी तरह सोना देश में रखने या पूरी तरह विदेश में रखने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने वाला नजर आता है।
निष्कर्ष
दुनिया के केंद्रीय बैंकों के लिए सोना एक बार फिर रणनीतिक संपत्ति बनता जा रहा है। अमेरिका और यूरोप के बीच बदलते संबंध, रूस की संपत्तियों को फ्रीज करने जैसी घटनाएं और वैश्विक तनाव ने रिजर्व की लोकेशन के महत्व को बढ़ा दिया है।
हालांकि, अभी ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया के देशों का सोना जब्त करने जा रहे हैं। अमेरिका से कुछ देशों द्वारा सोना वापस लाने को ज्यादा सही तरीके से जोखिम कम करने और अपने रिजर्व पर भौतिक नियंत्रण बढ़ाने की रणनीति के रूप में समझा जाना चाहिए।
भारत की बात करें तो RBI के पास मार्च 2026 तक 880.52 टन सोना था, जिसमें करीब 77 फीसदी भारत में और करीब 23 फीसदी विदेशों में रखा गया था। आने वाले समय में अगर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो दुनिया के केंद्रीय बैंकों की गोल्ड-स्टोरेज रणनीति पर नजर रखना और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा।


