Parenting Tips: हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा आत्मविश्वासी हो, अपनी बात बिना झिझक के रखे और मुश्किल परिस्थितियों में भी घबराए नहीं। लेकिन बच्चे का कॉन्फिडेंस केवल स्कूल में अच्छे नंबर या किसी प्रतियोगिता में जीतने से तय नहीं होता। घर का माहौल, माता-पिता का व्यवहार और बच्चे की गलतियों पर उनका रिएक्शन भी उसके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है।
कई बार माता-पिता बच्चे की भलाई और सुरक्षा के लिए कुछ ऐसा करते हैं, जिसका असर उल्टा पड़ सकता है। जरूरत से ज्यादा रोकना-टोकना, हर काम में दखल देना, दूसरे बच्चों से तुलना करना या छोटी-सी गलती पर डांट देना बच्चे को धीरे-धीरे खुद पर शक करना सिखा सकता है।
अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा अपने फैसले लेने, समस्याओं का सामना करने और अपनी बात रखने में ज्यादा सक्षम बने, तो इन 7 पैरेंटिंग आदतों पर ध्यान देना जरूरी है।
1. हर गलती पर डांटने की आदत छोड़ें
बच्चों से गलतियां होना उनकी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। अगर हर छोटी गलती पर उन्हें डांट मिले, तो बच्चा धीरे-धीरे गलती करने से डरने लग सकता है। उसे लग सकता है कि कुछ नया करने पर असफल हुआ तो उसे फिर डांट पड़ेगी।
ऐसे माहौल में बच्चा नई चीजों को आजमाने के बजाय सुरक्षित विकल्प चुन सकता है। इसलिए गलती होने पर सिर्फ यह बताने के बजाय कि उसने क्या गलत किया, उसे यह भी समझाएं कि अगली बार वह क्या बेहतर कर सकता है।
उदाहरण के लिए: अगर बच्चे से कोई सामान टूट गया है, तो तुरंत गुस्सा करने के बजाय उससे पूछें कि ऐसा कैसे हुआ और आगे इसे कैसे संभाला जा सकता है।
इस तरह बच्चा गलती को डर के बजाय सीखने के अवसर के रूप में देखना सीखता है।
2. जरूरत से ज्यादा ओवर-प्रोटेक्टिव न बनें
माता-पिता का बच्चे को सुरक्षित रखना स्वाभाविक है, लेकिन हर छोटी परेशानी से उसे बचाने की कोशिश उसके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती है।
अगर बच्चे का होमवर्क हमेशा माता-पिता पूरा कर दें, उसके छोटे फैसले भी पैरेंट्स ही लें या दोस्तों के साथ होने वाली हर छोटी समस्या को माता-पिता खुद सुलझाने लगें, तो बच्चे को अपनी क्षमता आजमाने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता।
बच्चे की उम्र और समझ के अनुसार उसे छोटे-छोटे फैसले लेने दें। उसे अपने खिलौने व्यवस्थित करने, स्कूल बैग तैयार करने या किसी छोटी समस्या का समाधान खुद खोजने का मौका दिया जा सकता है।
जब बच्चा खुद किसी समस्या का हल निकालता है, तो उसके अंदर यह भरोसा बढ़ता है कि ‘मैं भी यह कर सकता हूं।’
3. बच्चे की भावनाओं को नजरअंदाज न करें
बच्चा दुखी हो, डर रहा हो या गुस्से में हो, तो उसकी भावनाओं को छोटा समझना सही तरीका नहीं है। ‘इतनी सी बात पर क्यों रो रहे हो?’, ‘रोना बंद करो’ या ‘डरने की कोई जरूरत नहीं है’ जैसे वाक्य बच्चे को अपनी भावनाएं छिपाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
इसके बजाय पहले उसकी बात ध्यान से सुनें। जरूरी नहीं कि हर समस्या का समाधान तुरंत दिया जाए। कई बार बच्चे को सिर्फ यह महसूस करने की जरूरत होती है कि उसके माता-पिता उसकी बात समझ रहे हैं।
आप उससे पूछ सकते हैं कि उसे किस बात से बुरा लगा या वह कैसा महसूस कर रहा है। इससे बच्चा धीरे-धीरे अपनी भावनाओं को पहचानना और उन्हें शब्दों में व्यक्त करना सीखता है।
4. सिर्फ कमियां न बताएं, खूबियों को भी पहचानें
अगर बच्चे को बार-बार उसकी गलतियां ही सुनाई जाएं, तो उसके मन में अपने बारे में नकारात्मक धारणा बन सकती है। उसे लग सकता है कि वह किसी काम में अच्छा नहीं है।
इसलिए बच्चे की कमियों पर बात करने के साथ-साथ उसकी खूबियों को पहचानना भी जरूरी है। वह किसी काम में मेहनत करता है, किसी की मदद करता है, जिम्मेदारी निभाता है या किसी विषय में रुचि दिखाता है, तो उसकी सराहना करें।
हालांकि तारीफ करते समय सिर्फ ‘तुम बहुत अच्छे हो’ कहने के बजाय उसके प्रयास पर ध्यान देना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
जैसे: ‘तुमने इस काम के लिए काफी मेहनत की और हार नहीं मानी।’
इससे बच्चे को यह समझने में मदद मिलती है कि केवल परिणाम ही नहीं, उसकी मेहनत और सीखने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है।
5. दूसरे बच्चों से तुलना करने से बचें
‘देखो, तुम्हारा भाई कितना अच्छा पढ़ता है’, ‘तुम्हारे दोस्त ने तुमसे ज्यादा नंबर लिए हैं’ या ‘उससे कुछ सीखो’ जैसी बातें माता-पिता को सामान्य लग सकती हैं, लेकिन बार-बार की तुलना बच्चे के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती है।
बच्चा यह मानने लग सकता है कि उसकी कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि वह दूसरों की तुलना में कितना बेहतर है।
हर बच्चे की क्षमता, रुचि और सीखने की गति अलग होती है। इसलिए दूसरे बच्चे से तुलना करने के बजाय उसके अपने पिछले प्रदर्शन पर ध्यान दें।
उसे यह बताएं कि उसने पिछली बार की तुलना में कितना सुधार किया है। इससे उसका ध्यान प्रतिस्पर्धा से हटकर खुद को बेहतर बनाने पर जाता है।
6. उम्र के हिसाब से जिम्मेदारियां दें
बच्चे में आत्मविश्वास केवल उसकी तारीफ करने से नहीं आता। उसे जिम्मेदारियां देने और उनके परिणामों को समझने का मौका देना भी जरूरी है।
उम्र के अनुसार बच्चे को छोटे काम सौंपे जा सकते हैं। जैसे अपने खिलौने रखना, स्कूल बैग व्यवस्थित करना, अपनी चीजों का ध्यान रखना या किसी छोटे घरेलू काम में मदद करना।
अगर वह किसी काम में गलती करता है, तो हर बार तुरंत उसकी जगह काम करने के बजाय उसे सुधारने का मौका दें।
साथ ही उसे यह भी समझाएं कि हर परिस्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं होती, लेकिन जिस चीज पर हमारा नियंत्रण है, उसमें बेहतर कोशिश जरूर की जा सकती है।
यह सोच बच्चे को समस्याओं के सामने ज्यादा मजबूत बनने में मदद कर सकती है।
7. परफेक्शन नहीं, प्रोग्रेस पर ध्यान दें
बच्चे से हर काम बिल्कुल सही करवाने की उम्मीद करना उसके लिए दबाव बढ़ा सकता है। अगर उसे लगातार यह महसूस कराया जाए कि गलती की कोई जगह नहीं है, तो वह नई चीजें आजमाने से भी बच सकता है।
इसलिए बच्चे के हर काम में परफेक्शन तलाशने के बजाय उसके सुधार पर ध्यान दें।
अगर उसके नंबर पहले से बेहतर हुए हैं, उसने किसी मुश्किल काम को पूरा करने की कोशिश की है या पहले की तुलना में थोड़ा सुधार किया है, तो उसे नोटिस करें।
बच्चे को यह संदेश मिलना चाहिए कि सीखने के दौरान गलतियां होना सामान्य है और धीरे-धीरे बेहतर होना ही असली प्रगति है।
बच्चे का कॉन्फिडेंस बढ़ाने के लिए पैरेंट्स क्या करें?
बच्चे का आत्मविश्वास एक दिन में नहीं बनता। यह रोजमर्रा के छोटे-छोटे अनुभवों से धीरे-धीरे विकसित होता है। इसलिए माता-पिता का व्यवहार इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
बच्चे को अपनी बात रखने दें, उसकी भावनाओं को समझें, उसकी उम्र के अनुसार जिम्मेदारियां दें और गलतियों से सीखने का मौका दें। साथ ही यह भी जरूरी है कि उसकी तुलना दूसरों से करने के बजाय उसके अपने विकास पर ध्यान दिया जाए।
याद रखें, हर समय बच्चे को बचाना या हर गलती को तुरंत सुधार देना उसे मजबूत बनाने का सबसे अच्छा तरीका नहीं है। कई बार सही मार्गदर्शन के साथ उसे खुद कोशिश करने देना ही उसके आत्मविश्वास को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम होता है।
जरूरी बात
हर बच्चा अलग होता है और उसके आत्मविश्वास के विकास की गति भी अलग हो सकती है। इसलिए पैरेंटिंग में किसी एक तरीके को हर बच्चे पर समान रूप से लागू करने के बजाय बच्चे की उम्र, स्वभाव और परिस्थिति को ध्यान में रखना बेहतर है।


