भारतीय शेयर बाजार ने आर्थिक उदारीकरण के बाद लंबी और ऐतिहासिक यात्रा तय की है। 1991 में करीब 1,909 के स्तर पर रहने वाला सेंसेक्स पिछले साल दिसंबर में पहली बार 86,000 के पार पहुंच गया। यानी करीब साढ़े तीन दशक में इंडेक्स ने लगभग 8,500% का रिटर्न दिया। इस दौरान सेंसेक्स की सालाना कंपाउंडेड ग्रोथ रेट यानी CAGR करीब 14% रही।
यह सिर्फ सेंसेक्स के बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था, पूंजी बाजार और निवेश के बदलते स्वरूप की भी कहानी है।
संकट के दौर से शुरू हुई बड़ी यात्रा
1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। देश का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम रह गया था और यह स्थिति आयात भुगतान को लेकर बड़ी चुनौती बन गई थी। सरकार को अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए आपातकालीन वित्तीय सहायता का सहारा लेना पड़ा।
इसी दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने वाले बड़े फैसले लिए गए। जुलाई 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक बजट पेश किया। इसमें लाइसेंस राज को कम करने, निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने और भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार के लिए खोलने की दिशा में कई अहम कदम उठाए गए।
इन बदलावों को उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण यानी LPG सुधारों की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।
1991 के बजट के बाद बाजार में आई तेजी
आर्थिक सुधारों का असर शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। 1991 के बजट वाले दिन सेंसेक्स में करीब 5% की तेजी आई। पूरे 1991 में इंडेक्स ने लगभग 82% रिटर्न दिया और साल का अंत 1,909 के स्तर पर हुआ।
इसके बाद भी बाजार में तेजी जारी रही। फरवरी 1992 में मनमोहन सिंह के दूसरे बजट से पहले के सात महीनों में सेंसेक्स करीब 94% चढ़ चुका था।
हालांकि उस समय की तेजी के पीछे सिर्फ आर्थिक सुधार नहीं थे। शेयर बाजार में बड़े पैमाने पर सट्टेबाजी भी हो रही थी और हर्षद मेहता का नाम इस दौर से प्रमुख रूप से जुड़ा।
हर्षद मेहता घोटाले ने दिखाया बाजार का जोखिम
मार्च 1992 में सेंसेक्स पहली बार 4,000 के पार पहुंचा। लेकिन कुछ ही समय बाद बाजार को बड़ा झटका लगा।
28 अप्रैल 1992 को हर्षद मेहता घोटाले के सामने आने के बाद सेंसेक्स में करीब 13% की भारी गिरावट दर्ज की गई। इस घटना ने तेज बाजार तेजी के साथ जुड़े जोखिमों को उजागर किया।
इसके बाद भारतीय पूंजी बाजार में नियमन और निगरानी को मजबूत करने की दिशा में कई बदलाव हुए। समय के साथ बाजार का ढांचा अधिक व्यवस्थित हुआ और अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ शेयर बाजार का आकार भी बढ़ता गया।
सेंसेक्स की लंबी अवधि की शानदार ग्रोथ
1991 के 1,909 से 86,000 के पार पहुंचने तक सेंसेक्स ने निवेशकों को करीब 8,500% का रिटर्न दिया। करीब 14% की CAGR यह दिखाती है कि लंबी अवधि में कंपाउंडिंग ने निवेशकों की संपत्ति बढ़ाने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई।
सेंसेक्स की शुरुआत जनवरी 1986 में हुई थी। तब यह 1,000 के आसपास के स्तर से नीचे था। इसके बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार, कंपनियों के विस्तार, वित्तीयकरण और घरेलू निवेश में बढ़ोतरी के साथ इंडेक्स ने कई महत्वपूर्ण पड़ाव पार किए।
आंकड़ों के अनुसार, अपनी शुरुआत से सेंसेक्स ने 40 में से करीब 30 वर्षों में सकारात्मक रिटर्न दिया है।
2014 से 2025 तक भी जारी रही तेजी
सेंसेक्स की हालिया यात्रा भी काफी तेज रही है। 2014 में करीब 25,000 के स्तर पर रहने वाला इंडेक्स 2025 तक लगभग 86,000 के आसपास पहुंच गया।
2024 सेंसेक्स के लिए खास साल रहा। इस दौरान इंडेक्स ने 75,000, 80,000 और 85,000 जैसे तीन महत्वपूर्ण स्तर पार किए। यह तेजी भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ते निवेश, कंपनियों की आय में वृद्धि और घरेलू बाजार में बढ़ती भागीदारी के बीच आई।
हालांकि रिकॉर्ड स्तर के बाद बाजार में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर चिंता, मध्य पूर्व में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव जैसे कारकों ने समय-समय पर निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया।
बाजार पूंजीकरण में भारत की मजबूत स्थिति
भारतीय शेयर बाजार की लंबी अवधि की कहानी सिर्फ सेंसेक्स तक सीमित नहीं है। बाजार पूंजीकरण में भी भारत ने पिछले कुछ दशकों में तेजी से विस्तार किया है।
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के चेयरमैन रामदेव अग्रवाल ने भारतीय बाजार की क्षमता को समझाते हुए भारत की तुलना वैश्विक बाजारों में ‘फेरारी’ से की है। उनके मुताबिक कंपाउंडिंग ग्रोथ, बढ़ता वित्तीयकरण और अर्थव्यवस्था में हो रहे संरचनात्मक बदलाव भारतीय बाजार की मजबूती के प्रमुख आधार हैं।
उनके अनुसार, पिछले दो दशकों में भारत के बाजार पूंजीकरण में डॉलर के लिहाज से करीब 14% की सालाना दर से वृद्धि हुई है, जबकि अमेरिकी बाजार में यह दर करीब 7% रही। इस तरह की वृद्धि से बाजार का आकार लगभग हर पांच से छह साल में दोगुना होने की क्षमता रखता है।
1991 से अब तक क्या बदला?
सेंसेक्स की यात्रा को देखें तो भारतीय शेयर बाजार में कई बड़े बदलाव हुए हैं। 1991 में जहां अर्थव्यवस्था संकट से जूझ रही थी, वहीं आज भारत दुनिया की प्रमुख तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
इस बदलाव के साथ शेयर बाजार में भी निवेशकों की भागीदारी बढ़ी है। म्यूचुअल फंड, SIP, ऑनलाइन ट्रेडिंग और डिजिटल निवेश प्लेटफॉर्म ने आम निवेशकों के लिए बाजार तक पहुंच आसान की है।
कंपनियों के लिए पूंजी जुटाने के विकल्प बढ़े हैं और भारतीय पूंजी बाजार पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़ा और आधुनिक हो चुका है।
आगे भी महत्वपूर्ण रहेगी लंबी अवधि की सोच
सेंसेक्स का 1,909 से 86,000 के पार पहुंचना यह बताता है कि शेयर बाजार में लंबी अवधि का कंपाउंडिंग प्रभाव कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार हर साल सकारात्मक रिटर्न देगा। बीच-बीच में बड़ी गिरावट, आर्थिक संकट और वैश्विक घटनाओं का असर बाजार पर पड़ता रहा है।
फिर भी करीब साढ़े तीन दशकों की तस्वीर देखें तो सेंसेक्स की यात्रा भारतीय अर्थव्यवस्था में हुए व्यापक बदलावों का आईना है। 1991 के आर्थिक सुधारों से शुरू हुई यह प्रक्रिया आज बढ़ते वित्तीयकरण, घरेलू निवेश और मजबूत पूंजी बाजार तक पहुंच चुकी है।
यही वजह है कि मौजूदा उतार-चढ़ाव के बावजूद सेंसेक्स की दीर्घकालीन कहानी भारतीय शेयर बाजार के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक बनी हुई है।


