Highlights
- 75 साल का सबसे शक्तिशाली EL Nino, 2027 तक बने रहने की संभावना
- भारत में जलविद्युत उत्पादन में 21% तक गिरावट दर्ज
- खेती का रकबा 20.8% घटा, खरीफ फसलों पर बढ़ा दबाव
- दाल, खाद्य तेल और कपास के आयात में बढ़ोतरी की आशंका
- वैश्विक स्तर पर सूखा, बाढ़ और चक्रवात जैसी चरम मौसम घटनाओं का खतरा
नई दिल्ली। दुनिया भर में मौसम का मिजाज बदल रहा है और इसकी सबसे बड़ी वजह EL Nino (अल नीनो) को माना जा रहा है। अमेरिकी जलवायु पूर्वानुमान केंद्र के अनुसार, प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा वर्तमान अल नीनो पिछले लगभग 75 वर्षों में सबसे शक्तिशाली घटनाओं में से एक माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसके प्रभाव 2027 की शुरुआती वसंत ऋतु तक बने रह सकते हैं।
इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की कृषि, ऊर्जा उत्पादन, महंगाई, आयात-निर्यात और शेयर बाजार तक पर पड़ सकता है।
क्या है EL Nino?
EL Nino एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इससे वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है और कई देशों में सामान्य बारिश का पैटर्न बदल जाता है।
भारत में अक्सर मजबूत EL Nino के दौरान मानसून कमजोर पड़ता है, जिससे बारिश कम होती है और कृषि गतिविधियां प्रभावित होती हैं।
भारत के ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ा असर
कम बारिश के कारण देश के जलाशयों में पानी का स्तर घट रहा है, जिसका सीधा असर जलविद्युत उत्पादन पर दिखाई दे रहा है।
ऊर्जा मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार—
- जलविद्युत उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में करीब 21% की गिरावट दर्ज की गई।
- जून में समाप्त तिमाही के दौरान बांधों से बिजली उत्पादन लगभग 7% कम रहा।
- बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए कोयला, परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
यदि मानसून कमजोर रहता है तो बिजली उत्पादन लागत बढ़ सकती है और ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बना रह सकता है।
खेती पर सबसे बड़ा असर
EL Nino का सबसे अधिक प्रभाव कृषि क्षेत्र पर देखने को मिल रहा है।
5 जुलाई तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में कुल बुवाई क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में 20.8% कम रहा। सबसे अधिक असर खरीफ फसलों पर पड़ा है।
प्रभावित प्रमुख फसलें:
- धान
- गन्ना
- अरहर
- मूंगफली
- अन्य दलहन और तिलहन
कम बुवाई का सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा, जिससे किसानों की आय और खाद्य आपूर्ति दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
महंगाई और आयात बढ़ने की आशंका
यदि दलहन, तिलहन और कपास का उत्पादन घटता है तो भारत को इन उत्पादों का आयात बढ़ाना पड़ सकता है।
इसके संभावित परिणाम—
- दालों की कीमतों में बढ़ोतरी
- खाद्य तेल महंगा होने की संभावना
- कपास की कमी से टेक्सटाइल उद्योग पर दबाव
- कपड़ों की कीमतों में वृद्धि
- आयात बिल बढ़ने से व्यापार घाटे पर असर
यह स्थिति खुदरा महंगाई (Inflation) और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए चुनौती बन सकती है।
शेयर बाजार पर क्या होगा असर?
EL Nino का असर कई सेक्टरों में दिखाई दे सकता है।
नकारात्मक असर वाले सेक्टर
- कृषि और एग्री-इनपुट कंपनियां
- जलविद्युत कंपनियां
- टेक्सटाइल उद्योग
- खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र
संभावित लाभ वाले सेक्टर
- सिंचाई उपकरण निर्माता
- बिजली उत्पादन एवं वितरण कंपनियां
- मौसम आधारित कृषि तकनीक (Agri-Tech)
- खाद्य आयात और कमोडिटी ट्रेडिंग कंपनियां
कमजोर मानसून और बढ़ती महंगाई की आशंका निवेशकों की धारणा को भी प्रभावित कर सकती है।
दुनिया पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों के अनुसार इस बार का मजबूत EL Nino केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा।
दुनिया के विभिन्न हिस्सों में संभावित प्रभाव—
- लंबे समय तक सूखा
- अचानक बाढ़
- भीषण गर्मी
- शक्तिशाली चक्रवात
- अत्यधिक ठंड
- ऑस्ट्रेलिया में जंगलों में आग का बढ़ता खतरा
इन मौसमीय घटनाओं का असर वैश्विक खाद्य आपूर्ति, ऊर्जा बाजार और कमोडिटी कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।
निष्कर्ष
EL Nino केवल एक मौसम संबंधी घटना नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव कृषि उत्पादन, बिजली आपूर्ति, महंगाई, आयात, उद्योग और शेयर बाजार तक फैल सकता है। यदि इसकी तीव्रता लंबे समय तक बनी रहती है, तो भारत सहित दुनिया के कई देशों को खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा प्रबंधन और आर्थिक स्थिरता से जुड़ी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।


