West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत के सामने एक अहम संवैधानिक और कानूनी सवाल उठा—अगर किसी विधानसभा क्षेत्र में SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं की संख्या चुनाव में जीत के अंतर से अधिक हो, तो क्या न्यायपालिका नए चुनाव कराने का आदेश दे सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल पश्चिम बंगाल SIR से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान उठाया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से ऐसे 31 विधानसभा क्षेत्रों का विवरण पेश किया गया, जहां SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं की संख्या विजेता उम्मीदवार की जीत के अंतर से अधिक बताई गई।
31 विधानसभा सीटों का दिया गया हवाला
न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने दलीलें रखीं।
वकील ने अदालत को बताया कि 31 विधानसभा क्षेत्रों में BJP उम्मीदवारों की जीत का अंतर उन क्षेत्रों में SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम था। उदाहरण के तौर पर AC-145 में जीत का अंतर महज 401 वोट बताया गया, जबकि इस क्षेत्र में 8,785 मतदाताओं के नाम हटाए गए।
एक अन्य विधानसभा क्षेत्र में भी हटाए गए मतदाताओं की संख्या काफी अधिक थी, जबकि चुनाव में हार का अंतर सिर्फ 316 वोट रहा। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि ऐसी स्थिति में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि मतदाता सूची में हुए बदलाव का चुनावी नतीजों पर कितना प्रभाव पड़ा।
क्या SIR से चुनाव परिणाम प्रभावित हुए?
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील यह थी कि अगर बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए और उनका नाम मतदान के समय सूची में नहीं था, तो इससे उनके वोट देने का अधिकार प्रभावित हुआ होगा।
ऐसे मामलों में खासकर उन विधानसभा क्षेत्रों पर सवाल उठता है जहां हटाए गए मतदाताओं की संख्या और जीत के अंतर के बीच बड़ा अंतर है। हालांकि, केवल दोनों आंकड़ों की तुलना से यह अपने आप साबित नहीं होता कि चुनाव परिणाम गलत था। इसके लिए यह भी देखना जरूरी है कि हटाए गए मतदाताओं में कितने लोगों ने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील की और उनमें से कितने मामले अभी लंबित हैं।
यही मुद्दा सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सवालों के केंद्र में रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- क्या नए चुनाव का आदेश दिया जा सकता है?
दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए CJI सूर्य कांत ने मौखिक रूप से पूछा कि क्या अदालत इस आधार पर दोबारा चुनाव कराने का आदेश दे सकती है।
पीठ ने यह भी जानना चाहा कि जिन 31 विधानसभा क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है, वहां प्रभावित उम्मीदवारों ने चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए औपचारिक चुनाव याचिकाएं दायर की हैं या नहीं।
इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि कुछ विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव याचिकाएं दाखिल की गई हैं, लेकिन सभी सीटों पर ऐसा नहीं हुआ है।
इस सवाल का महत्व इसलिए भी है क्योंकि चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है। केवल मतदाता सूची में नाम हटने और जीत के अंतर के आंकड़ों के आधार पर चुनाव परिणाम को रद्द करना या दोबारा चुनाव कराना एक अलग कानूनी प्रश्न है।
जस्टिस बागची ने अपील के आंकड़ों पर दिया जोर
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने यह जानना जरूरी बताया कि SIR के दौरान जिन लोगों के नाम हटाए गए, उनमें से कितने लोगों ने अपील की।
इसे एक उदाहरण से समझें। अगर किसी सीट पर 100 मतदाताओं के नाम हटाए गए और जीत का अंतर 50 वोट है, तो पहली नजर में यह आंकड़ा महत्वपूर्ण लग सकता है। लेकिन अगर हटाए गए 100 लोगों में से केवल कुछ लोगों ने ही नाम बहाल कराने के लिए अपील की, तो कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।
वहीं, अगर 100 में से 60 या 70 लोगों ने अपील की हो और उनकी अपील अभी लंबित हो, तो मामला अधिक गंभीर हो सकता है। ऐसे में यह जांचना जरूरी होगा कि मतदाता सूची में बदलाव और चुनावी नतीजे के बीच कोई वास्तविक संबंध बनता है या नहीं।
चुनाव आयोग से मांगा गया लंबित अपील का डेटा
सुप्रीम कोर्ट ने इससे एक दिन पहले चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल में SIR के बाद मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दाखिल अपीलों का आंकड़ा पेश करने को कहा था।
अदालत ने आयोग से पूछा कि कितने मामलों का निपटारा हो चुका है और कितने मामले अभी लंबित हैं। साथ ही, लंबित अपीलों के समयबद्ध निपटारे के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी भी मांगी गई।
याचिकाकर्ता की ओर से कल्याण बंदोपाध्याय ने अदालत में दावा किया कि लोगों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही है कि अपीलीय न्यायाधिकरणों के सामने कितनी अपील लंबित हैं और कितने मामलों का निपटारा हो चुका है।
पंचायत और नगर निकाय चुनाव का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल में आगामी नगर निकाय और पंचायत चुनावों का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों का जल्द निपटारा जरूरी है, क्योंकि आने वाले चुनावों में मतदाता सूची की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि वह मामले को केवल उन 31 विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित नहीं रखना चाहता जिनका विवरण याचिकाकर्ता की ओर से पेश किया गया है।
इसका मतलब है कि अदालत पूरे SIR प्रक्रिया में अपीलों और उनके निपटारे की स्थिति को व्यापक रूप से देख सकती है।
60 लाख दावों और आपत्तियों का मामला
पश्चिम बंगाल में SIR के बाद मतदाता सूची से जुड़े करीब 60 लाख दावों और आपत्तियों के निपटारे के लिए बड़ी संख्या में न्यायिक अधिकारियों को लगाया गया था। पश्चिम बंगाल के साथ पड़ोसी राज्यों ओडिशा और झारखंड के करीब 700 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की गई थी।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मतदाता सूची से जुड़े दावों और आपत्तियों का मामला कितना व्यापक है।
24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपीलीय न्यायाधिकरणों को निर्देश दिया था कि ऐसे मामलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जाए जिनमें यह साबित होता है कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ तत्काल सुनवाई की जरूरत है।
अब सबसे अहम सवाल क्या है?
West Bengal SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने फिलहाल केवल यह सवाल नहीं है कि कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए। बड़ा सवाल यह है कि क्या हटाए गए नामों का वास्तविक प्रभाव चुनाव परिणामों पर पड़ा और इसे कानूनी रूप से कैसे साबित किया जा सकता है।
अगर किसी विधानसभा क्षेत्र में हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक है, तो यह निश्चित रूप से जांच का आधार बन सकता है। लेकिन अदालत के लिए यह भी देखना होगा कि प्रभावित मतदाताओं ने अपील की या नहीं, उनकी अपील का क्या परिणाम हुआ और क्या चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए संबंधित उम्मीदवारों ने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनाई है।
इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल—“क्या हम नए चुनाव कराने का निर्देश दे सकते हैं?”—West Bengal SIR विवाद में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाली सुनवाई में अपीलों के आंकड़े और उनके निपटारे की स्थिति इस पूरे मामले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।


