पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होने जा रहा है। राज्य में इस बार दो चरणों में मतदान होगा—पहला चरण 23 अप्रैल और दूसरा 29 अप्रैल को। मतगणना 4 मई को होगी। इस बार मुकाबला एक बार फिर बेहद दिलचस्प माना जा रहा है, जहां मुख्य रूप से All India Trinamool Congress और Bharatiya Janata Party के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है, जबकि अन्य दल भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश में हैं।
इस चुनाव को सिर्फ सत्ता की लड़ाई के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे बंगाल की राजनीतिक दिशा और सामाजिक समीकरणों के भविष्य से भी जोड़ा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है, और यही कारण है कि 2026 का चुनाव कई मायनों में निर्णायक साबित हो सकता है।
पहले चरण में किन क्षेत्रों में मतदान?
पहले चरण में कुल 152 विधानसभा सीटों पर वोट डाले जाएंगे। इनमें उत्तर बंगाल के कई जिले और दक्षिण बंगाल के कुछ हिस्से शामिल हैं। इन क्षेत्रों में जातीय, धार्मिक और आर्थिक विविधता काफी अधिक है, जिससे चुनावी समीकरण और भी जटिल हो जाते हैं।
ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय मुद्दे—जैसे रोजगार, बुनियादी ढांचा और कृषि—प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में विकास, उद्योग और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे ज्यादा प्रभाव डालते हैं।
तृणमूल कांग्रेस (TMC): सत्ता बचाने की चुनौती
All India Trinamool Congress, जिसकी अगुवाई Mamata Banerjee कर रही हैं, पिछले 15 वर्षों से पश्चिम बंगाल की सत्ता में है। 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 294 में से 213 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी।
ममता बनर्जी की राजनीति का आधार “बंगाली अस्मिता” और कल्याणकारी योजनाएं रही हैं। ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं ने महिला मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत की है। इसके अलावा, पार्टी का जमीनी संगठन और बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ता नेटवर्क उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।
इस बार भी TMC “विकास + सामाजिक सुरक्षा” के एजेंडे के साथ मैदान में है। हालांकि, एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) और भ्रष्टाचार के आरोप उसके लिए चुनौती बन सकते हैं।
भाजपा (BJP): सत्ता में आने का बड़ा लक्ष्य
Bharatiya Janata Party ने पिछले एक दशक में बंगाल की राजनीति में तेजी से अपनी पकड़ बनाई है। 2016 तक जहां पार्टी हाशिए पर थी, वहीं 2021 में उसने 77 सीटें जीतकर खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित कर लिया।
इस बार पार्टी Narendra Modi की लोकप्रियता, केंद्रीय योजनाओं और राष्ट्रवाद के मुद्दे के साथ चुनाव लड़ रही है। राज्य स्तर पर Suvendu Adhikari और Sukanta Majumdar जैसे नेता अहम भूमिका निभा रहे हैं।
हालांकि, भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती मजबूत स्थानीय नेतृत्व और जमीनी संगठन को और मजबूत करना है। 2021 में पार्टी को मुस्लिम और कुछ प्रगतिशील वोटर्स का समर्थन नहीं मिल पाया था, जो इस बार भी एक बड़ा फैक्टर रह सकता है।
कांग्रेस: अस्तित्व बचाने की जंग
Indian National Congress, जो कभी बंगाल की राजनीति की मुख्य धुरी थी, अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। पार्टी को नेतृत्व की कमी, कमजोर संगठन और स्पष्ट रणनीति के अभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करीब 4.68% वोट शेयर मिला, जिससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लेकिन विधानसभा चुनाव में प्रभावी वापसी के लिए उसे मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट राजनीतिक संदेश की जरूरत है।
CPI(M): वापसी की कोशिश
Communist Party of India (Marxist), जिसने बंगाल में 34 वर्षों तक शासन किया, अब फिर से अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। 2021 और 2024 दोनों चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा।
इस बार CPI(M) ने “बंगाल बचाओ यात्रा” के जरिए जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने का प्रयास किया है। पार्टी का फोकस युवाओं और किसानों को फिर से अपने साथ जोड़ने पर है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह पुराने जनाधार को वापस हासिल कर पाती है या नहीं।
ISF और AIMIM: नए समीकरण
Indian Secular Front, जिसकी स्थापना Abbas Siddiqui ने की, मुस्लिम और वंचित वर्गों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। 2021 में भले ही पार्टी ने सिर्फ एक सीट जीती, लेकिन उसका प्रभाव बढ़ता दिख रहा है।
वहीं All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen, जिसकी अगुवाई Asaduddin Owaisi करते हैं, इस बार 11 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। AIMIM का लक्ष्य अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाना है।
इसके अलावा, AJUP जैसी नई पार्टियां भी चुनावी मैदान में हैं, जो स्थानीय स्तर पर समीकरण बदल सकती हैं।
चुनाव के प्रमुख मुद्दे
इस बार बंगाल चुनाव कई अहम मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रहा है:
- विकास बनाम पहचान की राजनीति
- महिलाओं और युवाओं के लिए योजनाएं
- रोजगार और औद्योगिक निवेश
- भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पारदर्शिता
- केंद्र-राज्य संबंध
इन मुद्दों के आधार पर मतदाता अपना फैसला करेंगे, जो राज्य की दिशा तय करेगा।
क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार मुकाबला पहले से ज्यादा कड़ा है। जहां TMC अपनी सत्ता बचाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है, वहीं BJP इसे अपने लिए “मेक या ब्रेक” चुनाव मान रही है।
तीसरे मोर्चे के रूप में कांग्रेस, वाम दल और अन्य पार्टियां वोट काटने का काम कर सकती हैं, जिससे परिणाम अप्रत्याशित हो सकते हैं।
निष्कर्ष: क्यों अहम है यह चुनाव?
पश्चिम बंगाल का यह चुनाव सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका असर 2029 के लोकसभा चुनाव तक देखने को मिल सकता है।
पहले चरण की वोटिंग के साथ ही यह साफ होने लगेगा कि जनता का रुझान किस ओर है। अब सबकी नजर 23 अप्रैल पर है, जब मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर राज्य की नई दिशा तय करेंगे।
Also Read :


