नई दिल्ली: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र (Private Space Sector) ने एक नया इतिहास रच दिया है। हैदराबाद की स्पेस स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने देश का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1 (Vikram-1)’ सफलतापूर्वक लॉन्च कर भारत को उन चुनिंदा देशों और कंपनियों की सूची में शामिल कर दिया है, जिन्होंने पहली ही कोशिश में ऑर्बिटल मिशन को सफल बनाया। यह उपलब्धि केवल एक रॉकेट लॉन्च नहीं, बल्कि दो दोस्तों की आठ साल की मेहनत, जोखिम और सपनों की जीत है।
Highlights
- भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 सफलतापूर्वक लॉन्च।
- स्काईरूट एयरोस्पेस बनी भारत की पहली एयरोस्पेस यूनिकॉर्न कंपनी।
- रॉकेट ने 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) हासिल की।
- दो पूर्व ISRO वैज्ञानिकों ने 8 साल की मेहनत से हासिल की सफलता।
- पहली ही टेस्ट फ्लाइट में ऑर्बिटल मिशन पूरा कर रचा इतिहास।
Vikram-1 की सफल लॉन्चिंग से भारत ने बनाया नया रिकॉर्ड
शनिवार, 18 जुलाई को दोपहर 12:05 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से विक्रम-1 ने उड़ान भरी। लॉन्च पैड ISRO का था, लेकिन रॉकेट की डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और मिशन संचालन पूरी तरह स्काईरूट एयरोस्पेस की टीम ने किया।
इस लॉन्च के साथ भारत का निजी स्पेस सेक्टर एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। विक्रम-1 ने लगभग 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर सर्कुलर लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) हासिल की, जो किसी भी निजी भारतीय कंपनी के लिए पहली बड़ी उपलब्धि है।
दो दोस्तों ने 8 साल पहले देखा था सपना
इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे दो दोस्तों और पूर्व ISRO वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका की कहानी है। दोनों ने 2018 में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की थी। उस समय भारत में निजी स्पेस कंपनियों का भविष्य स्पष्ट नहीं था, लेकिन उन्होंने जोखिम उठाया और अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत के लिए नई पहचान बनाने का लक्ष्य रखा।
आज वही सपना भारत के इतिहास का हिस्सा बन चुका है।
एलन मस्क की SpaceX जैसी बड़ी चुनौती
ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च करना दुनिया के सबसे कठिन इंजीनियरिंग मिशनों में गिना जाता है। बहुत कम कंपनियां अपनी पहली ऑर्बिटल उड़ान में सफलता हासिल कर पाती हैं।
स्काईरूट एयरोस्पेस ने पहली ही टेस्ट फ्लाइट में यह उपलब्धि हासिल कर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यही कारण है कि इस मिशन की तुलना अक्सर एलन मस्क की SpaceX जैसी कंपनियों की शुरुआती उपलब्धियों से की जा रही है।
को-फाउंडर्स ने क्या कहा?
स्काईरूट एयरोस्पेस के COO नागा भरत डाका ने कहा,
“पिछले आठ वर्षों में हमारी पूरी टीम ने दिन-रात मेहनत की। आज वही मेहनत भारत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बन गई है।”
वहीं कंपनी के CEO और सह-संस्थापक पवन कुमार चंदना ने कहा,
“यह हमारी पहली टेस्ट फ्लाइट थी। इस मिशन से हमें ऑर्बिट में रॉकेट के व्यवहार से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण डेटा मिला है, जो भविष्य के मिशनों को और बेहतर बनाएगा।”
पहले Vikram-S, अब Vikram-1
स्काईरूट एयरोस्पेस ने वर्ष 2022 में विक्रम-S नाम का सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया था। उस मिशन में रॉकेट लगभग 89.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था।
अब विक्रम-1 की सफलता के साथ कंपनी ने ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की क्षमता भी साबित कर दी है, जो भविष्य में छोटे और मध्यम आकार के सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजने का रास्ता खोलेगा।
कौन हैं नागा भरत डाका?
37 वर्षीय नागा भरत डाका देश के उभरते हुए स्पेस एंटरप्रेन्योर और एयरोस्पेस इंजीनियर हैं।
उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां भी शानदार रही हैं।
- AIEEE 2007 में ऑल इंडिया 91वीं रैंक
- IIT-JEE में 165वीं रैंक
- ISRO के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) में एवियोनिक्स इंजीनियर के रूप में करियर की शुरुआत
- 2015 में ISRO छोड़कर निजी क्षेत्र में कदम रखा
- बाद में सेमीकंडक्टर कंपनी Xilinx में कार्य किया
- 2018 में नौकरी छोड़कर पवन कुमार चंदना के साथ स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की
ISRO से स्टार्टअप तक का सफर
नागा भरत डाका और पवन कुमार चंदना दोनों पहले ISRO में वैज्ञानिक रह चुके हैं। सरकारी नौकरी छोड़कर उन्होंने अपना स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किया। शुरुआती वर्षों में तकनीकी चुनौतियों, फंडिंग और संसाधनों की कमी जैसी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन दोनों ने हार नहीं मानी।
आज उनकी कंपनी भारत की पहली एयरोस्पेस यूनिकॉर्न बन चुकी है।
यूनिकॉर्न बनने वाली पहली भारतीय एयरोस्पेस कंपनी
हाल ही में स्काईरूट एयरोस्पेस का वैल्यूएशन 1.1 बिलियन डॉलर (करीब 10,592 करोड़ रुपये) पहुंच गया, जिसके साथ यह भारत की पहली एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी यूनिकॉर्न कंपनी बन गई।
यह उपलब्धि दिखाती है कि भारतीय स्पेस स्टार्टअप अब वैश्विक स्तर पर भी मजबूत पहचान बना रहे हैं।
किन निवेशकों ने किया भरोसा?
स्काईरूट एयरोस्पेस को देश और दुनिया के कई बड़े निवेशकों का समर्थन मिला है। इनमें शामिल हैं—
- ग्रीनको ग्रुप
- सोलर इंडस्ट्रीज
- WhatsApp के पूर्व चीफ बिजनेस ऑफिसर नीरज अरोड़ा
- Myntra के संस्थापक मुकेश बंसल
- Google के शुरुआती बोर्ड सदस्य राम श्रीराम की Sherpalo Ventures
- कई प्रमुख वैज्ञानिक और टेक निवेशक
इन निवेशों ने कंपनी को अत्याधुनिक रॉकेट तकनीक विकसित करने में महत्वपूर्ण मदद दी।
भारत के स्पेस सेक्टर के लिए क्यों अहम है यह सफलता?
विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग केवल एक निजी कंपनी की उपलब्धि नहीं है। यह भारत के बढ़ते स्पेस इकोसिस्टम, स्टार्टअप संस्कृति और निजी भागीदारी की ताकत का प्रमाण है। आने वाले वर्षों में भारत का स्पेस उद्योग तेजी से विस्तार कर सकता है और छोटे सैटेलाइट लॉन्च के वैश्विक बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सकता है।
स्काईरूट एयरोस्पेस की यह सफलता भारतीय युवाओं, इंजीनियरों और स्टार्टअप्स के लिए भी प्रेरणा है कि बड़े सपने, सही तकनीक और लगातार मेहनत के दम पर दुनिया की सबसे कठिन चुनौतियों को भी पार किया जा सकता है।


