अमेरिका में क्रिप्टोकरेंसी को लेकर लंबे समय से चल रही अनिश्चितता अब खत्म हो सकती है। अमेरिकी संसद में जल्द ही CLARITY Act पेश किया जाने वाला है, जिसे डिजिटल एसेट सेक्टर के लिए अब तक के सबसे महत्वपूर्ण कानूनों में माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर यह कानून पास हो जाता है, तो अमेरिका में क्रिप्टोकरेंसी, स्टेबलकॉइन और डिजिटल एसेट कंपनियों के लिए स्पष्ट नियम तय हो जाएंगे। हालांकि इस कानून ने क्रिप्टो कंपनियों, पारंपरिक बैंकों और स्टेबलकॉइन प्लेटफॉर्म्स के बीच बड़ा टकराव भी पैदा कर दिया है।
आखिर क्या है CLARITY Act?
CLARITY Act का उद्देश्य अमेरिका में डिजिटल एसेट्स के लिए स्पष्ट नियामक ढांचा तैयार करना है। इस कानून के तहत यह तय किया जाएगा कि कौन सी क्रिप्टो संपत्ति ‘सिक्योरिटी’ मानी जाएगी, कौन सी ‘कमोडिटी’ की श्रेणी में आएगी, किस सरकारी एजेंसी के पास निगरानी का अधिकार होगा और क्रिप्टो एक्सचेंज व ब्रोकर किन नियमों के तहत काम करेंगे।
इसके अलावा ग्राहक सुरक्षा को लेकर भी सख्त नियम तय किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अभी तक अमेरिका में क्रिप्टो सेक्टर अस्पष्ट नियमों के बीच काम कर रहा था, जिससे कंपनियों और निवेशकों दोनों में अनिश्चितता बनी हुई थी।
स्टेबलकॉइन को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
इस कानून का सबसे बड़ा विवाद स्टेबलकॉइन रिवॉर्ड को लेकर है। स्टेबलकॉइन ऐसी डिजिटल मुद्रा होती है, जिसकी कीमत आमतौर पर अमेरिकी डॉलर जैसी किसी स्थिर संपत्ति से जुड़ी रहती है।
अभी कई क्रिप्टो प्लेटफॉर्म USDT और USDC जैसे स्टेबलकॉइन को होल्ड करने पर निवेशकों को ब्याज या रिवॉर्ड देते हैं। लेकिन नए प्रस्ताव के तहत केवल वॉलेट में स्टेबलकॉइन रखने पर ब्याज या इनकम देने पर रोक लगाई जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका में स्पष्ट नियम आने से बिटकॉइन और अन्य डिजिटल एसेट्स में संस्थागत निवेश बढ़ सकता है।
बैंक क्यों कर रहे विरोध?
बैंकिंग उद्योग का कहना है कि अगर क्रिप्टो कंपनियां स्टेबलकॉइन पर ब्याज देती रहीं, तो लोग पारंपरिक बैंक खातों से पैसा निकालकर डिजिटल वॉलेट में रखने लगेंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार इससे बैंक डिपॉजिट घट सकते हैं, पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम पर असर पड़ सकता है और वित्तीय स्थिरता को खतरा हो सकता है। इसी वजह से बैंकिंग लॉबी इस तरह की सुविधाओं का विरोध कर रही है।
क्रिप्टो कंपनियां क्या कह रही हैं?
दूसरी तरफ क्रिप्टो कंपनियों का तर्क है कि स्टेबलकॉइन पर रिवॉर्ड रोकना प्रतिस्पर्धा के खिलाफ होगा।
कॉइनबेस के मुख्य कानूनी अधिकारी पॉल ग्रेवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बैंकिंग लॉबी की आलोचना करते हुए कहा कि यह बदलाव केवल प्रतिस्पर्धा को खत्म करने के लिए लाया जा रहा है।
क्रिप्टो उद्योग का कहना है कि डिजिटल एसेट्स को पारंपरिक बैंकिंग से अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। भारत में अभी तक क्रिप्टोकरेंसी को लेकर व्यापक नियामक ढांचा नहीं बना है, इसलिए अमेरिकी नियमों पर भारतीय बाजार की भी नजर बनी हुई है।
आम यूजर्स पर क्या असर पड़ेगा?
अगर यह कानून लागू होता है, तो आम क्रिप्टो निवेशकों को अपने डिजिटल वॉलेट में केवल स्टेबलकॉइन रखने पर मिलने वाला पैसिव इनकम, ब्याज और होल्डिंग रिवॉर्ड कम हो सकता है या पूरी तरह बंद हो सकता है।
हालांकि पेमेंट, ट्रांसफर और ब्लॉकचेन एक्टिविटी से जुड़े रिवॉर्ड जारी रह सकते हैं।
भारतीय निवेशकों पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिकी कानून सीधे भारत में लागू नहीं होगा, लेकिन इसका असर भारतीय निवेशकों पर भी पड़ सकता है।
भारत के कई क्रिप्टो निवेशक USDT और USDC जैसे स्टेबलकॉइन में पैसा रखते हैं और विदेशी एक्सचेंजों पर उन्हें स्टेक करके 5% से 10% तक सालाना रिटर्न कमाते हैं।
अगर अमेरिकी नियमों के कारण वैश्विक एक्सचेंज अपनी पॉलिसी बदलते हैं, तो भारतीय निवेशकों की यह कमाई घट सकती है।
स्टेबलकॉइन आखिर होते क्या हैं?
स्टेबलकॉइन एक खास तरह की क्रिप्टोकरेंसी होती है, जिसे इस तरह डिजाइन किया जाता है कि उसकी कीमत स्थिर बनी रहे।
बिटकॉइन और इथेरियम जैसी क्रिप्टोकरेंसी में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। वहीं स्टेबलकॉइन को अमेरिकी डॉलर जैसी स्थिर संपत्तियों से जोड़ा जाता है।
उदाहरण के लिए 1 USDT की कीमत लगभग 1 डॉलर के आसपास ही रहती है। इसी वजह से बाजार में गिरावट के दौरान कई निवेशक स्टेबलकॉइन को सुरक्षित विकल्प मानते हैं।
कौन से स्टेबलकॉइन सबसे लोकप्रिय हैं?
दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले स्टेबलकॉइन Tether (USDT) और USD Coin (USDC) माने जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार USDC को अपेक्षाकृत ज्यादा पारदर्शी माना जाता है, जबकि USDT का इस्तेमाल वैश्विक क्रिप्टो ट्रेडिंग में सबसे ज्यादा होता है।
अमेरिका का यह कदम क्यों अहम माना जा रहा है?
अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय बाजारों में शामिल है। ऐसे में वहां बनने वाले नियमों का असर अक्सर पूरी दुनिया के क्रिप्टो बाजार पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर CLARITY Act पास हो जाता है, तो क्रिप्टो कंपनियों के लिए स्पष्ट नियम बनेंगे, संस्थागत निवेश बढ़ सकता है और बैंक व क्रिप्टो सेक्टर के बीच नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।
हालांकि इसके साथ ही स्टेबलकॉइन आधारित passive income मॉडल पर दबाव बढ़ सकता है।
केवल कानून नहीं, डिजिटल वित्त की दिशा तय करने वाली लड़ाई
विशेषज्ञों के अनुसार यह विवाद केवल क्रिप्टो बनाम बैंक की लड़ाई नहीं है। यह आने वाले समय की डिजिटल बैंकिंग, डिजिटल करेंसी, फिनटेक इनोवेशन और वित्तीय नियंत्रण की दिशा तय करने वाली बड़ी बहस बन चुकी है।
अगर अमेरिका में यह कानून लागू होता है, तो आने वाले वर्षों में पूरी दुनिया का क्रिप्टो बाजार नए नियमों और नए बिजनेस मॉडल की तरफ बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में दुनिया भर की सरकारें डिजिटल एसेट्स और स्टेबलकॉइन के लिए सख्त लेकिन स्पष्ट नियम बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकती हैं।
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