UP RERA IFMS Rules: उत्तर प्रदेश में नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ समेत दूसरे शहरों में फ्लैट या घर खरीदने वालों के लिए राहत की खबर है। उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (UP RERA) ने Interest Free Maintenance Security (IFMS) को लेकर नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अथॉरिटी ने 12वें संशोधन के जरिए Regulation 47 में IFMS की रकम के कलेक्शन, बैंक खाते में रखने, निवेश, इस्तेमाल, ऑडिट और RWA को ट्रांसफर करने की प्रक्रिया को ज्यादा स्पष्ट और सख्त कर दिया है। यह संशोधन 13 जुलाई 2026 को अथॉरिटी की वेबसाइट पर प्रकाशित होने के साथ प्रभावी हो गया।
नए नियमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि घर खरीदारों से एकमुश्त ली जाने वाली मेंटेनेंस सिक्योरिटी को बिल्डर अपनी दूसरी जरूरतों के लिए इस्तेमाल न कर सकें। साथ ही, प्रोजेक्ट के कॉमन एरिया का हैंडओवर होने पर इस फंड का पूरा हिसाब और रकम RWA या Association of Allottees को सौंपना होगा।
क्या होता है IFMS फंड?
IFMS यानी Interest Free Maintenance Security एकमुश्त मेंटेनेंस सिक्योरिटी राशि है, जिसे बिल्डर घर खरीदारों से लेते हैं। इसका उद्देश्य सोसायटी के कॉमन एरिया, सुविधाओं और साझा उपकरणों के लंबे समय तक रखरखाव, मरम्मत और जरूरत पड़ने पर उन्हें बदलने के लिए फंड उपलब्ध कराना है।
यह सामान्य मासिक मेंटेनेंस चार्ज से अलग होता है। नए नियमों में इस फंड को अलग तरीके से रखने और इस्तेमाल करने की व्यवस्था की गई है, ताकि खरीदारों से जमा की गई रकम का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के अलावा किसी दूसरे काम में न हो।
UP RERA ने क्यों बदले IFMS के नियम?
IFMS को लेकर होमबायर्स और RWA की ओर से अक्सर पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठते रहे हैं। मसलन, कितना पैसा जमा हुआ, उसे कहां रखा गया, उस पर कितना ब्याज मिला, कितना खर्च हुआ और प्रोजेक्ट हैंडओवर के समय RWA को कितनी रकम मिली—इन सवालों का स्पष्ट रिकॉर्ड होना जरूरी है।
UP RERA के 12वें संशोधन में अब इन सभी प्रक्रियाओं के लिए नियम तय कर दिए गए हैं। अथॉरिटी के अनुसार, इसका उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करना है।
UP RERA के नए IFMS नियमों में क्या बदला?
1. अलग बैंक खाते में रखना होगा IFMS का पैसा
अब प्रमोटर को IFMS की रकम एक अलग निर्धारित बैंक खाते में रखनी होगी। यह खाता Scheduled Bank में होना चाहिए। यानी IFMS की रकम को बिल्डर के दूसरे प्रोजेक्ट फंड या सामान्य ऑपरेशनल अकाउंट के साथ मिलाकर नहीं रखा जा सकेगा।
इसका सीधा फायदा होमबायर्स को मिलेगा, क्योंकि IFMS फंड का अलग रिकॉर्ड रखना आसान होगा और रकम के इस्तेमाल को ट्रैक किया जा सकेगा।
2. सबसे ज्यादा ब्याज वाली FD में निवेश
नए नियमों के तहत IFMS की जमा रकम को सिर्फ बैंक खाते में निष्क्रिय रखने के बजाय सबसे ज्यादा ब्याज देने वाली फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में निवेश करने की व्यवस्था की गई है।
इसके लिए प्रमोटर को बैंकों से ब्याज दर की कोटेशन लेनी होगी और उपलब्ध विकल्पों में सबसे ज्यादा ब्याज देने वाली FD का चयन करना होगा। इससे IFMS कॉर्पस पर मिलने वाला रिटर्न भी रिकॉर्ड में रहेगा।
3. RWA को पूरा IFMS कॉर्पस ट्रांसफर करना होगा
जब प्रोजेक्ट के कॉमन एरिया का हैंडओवर RWA या Association of Allottees को किया जाएगा, तब प्रमोटर को पूरा IFMS कॉर्पस ट्रांसफर करना होगा।
सिर्फ रकम ट्रांसफर करना ही पर्याप्त नहीं होगा। बिल्डर को इसके साथ फंड से जुड़ी विस्तृत जानकारी भी देनी होगी। इससे RWA के पास यह जांचने का आधार रहेगा कि शुरुआत से कितनी रकम जमा हुई और उसका इस्तेमाल कैसे हुआ।
4. यूनिट-वाइज हिसाब और ऑडिट ट्रेल देना होगा
IFMS ट्रांसफर के समय प्रमोटर को एक विस्तृत Transfer Statement देना होगा। इसमें यूनिट-वाइज कलेक्शन, किसी तरह की कटौती या एडजस्टमेंट, IFMS से किए गए खर्च और उससे जुड़े दस्तावेजों का ऑडिट ट्रेल शामिल होगा।
इससे RWA और घर खरीदार यह समझ सकेंगे कि कुल IFMS कॉर्पस कितना था और ट्रांसफर के समय वास्तविक बैलेंस कितना बचा है।
5. IFMS का इस्तेमाल सिर्फ कॉमन सुविधाओं के लिए
नए नियमों में IFMS के इस्तेमाल का दायरा भी स्पष्ट किया गया है। इस फंड का इस्तेमाल कॉमन एरिया, कॉमन उपकरणों और सामूहिक सुविधाओं के संचालन, रखरखाव, मरम्मत और रिप्लेसमेंट के लिए किया जा सकता है।
इसमें सोसायटी की साझा सुविधाओं और उपकरणों से जुड़े जरूरी रखरखाव कार्य शामिल हो सकते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि IFMS को किसी दूसरे कारोबारी या व्यक्तिगत खर्च के लिए डायवर्ट न किया जाए।
6. RWA को अलग अकाउंट रखना होगा
नियम सिर्फ बिल्डर तक सीमित नहीं हैं। IFMS का पैसा मिलने के बाद RWA या Association of Allottees को भी इसका अलग अकाउंट रखना होगा।
फंड से जुड़े सभी रिसीट, पेमेंट और इस्तेमाल का रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से बनाए रखना होगा। इससे सोसायटी के निवासियों के लिए फंड की निगरानी करना आसान होगा।
7. CA से ऑडिट कराना जरूरी
IFMS के इस्तेमाल का Chartered Accountant (CA) से ऑडिट कराना भी जरूरी होगा। ऑडिट रिपोर्ट को निर्धारित समयसीमा के भीतर AGM या EGM के सामने रखा जाना होगा।
नियमों के अनुसार, ऑडिट रिपोर्ट को फाइनल होने के तीन महीने के भीतर सदस्यों के सामने रखने की व्यवस्था की गई है।
IFMS की दरें भी तय
UP RERA ने अलग-अलग तरह के प्रोजेक्ट और आवासीय कैटेगरी के आधार पर IFMS की दरों को भी मानकीकृत किया है। रेजिडेंशियल ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में दरें प्रॉपर्टी की कैटेगरी और स्पेसिफिकेशन के आधार पर ₹20 से ₹100 प्रति वर्ग फुट तक हो सकती हैं।
कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के लिए भी अलग दरें तय की गई हैं। गैर-सेंट्रलाइज्ड AC कमर्शियल प्रोजेक्ट के लिए ₹40 प्रति वर्ग फुट और सेंट्रलाइज्ड AC कमर्शियल प्रोजेक्ट के लिए ₹50 प्रति वर्ग फुट की दर बताई गई है। प्लॉटेड रेजिडेंशियल और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के लिए भी अलग-अलग दरें निर्धारित की गई हैं।
होमबायर्स पर क्या पड़ेगा सीधा असर?
नए नियमों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि घर खरीदारों से जमा IFMS की रकम को लेकर जवाबदेही बढ़ेगी। अब खरीदारों को सिर्फ यह जानना जरूरी नहीं होगा कि उन्होंने कितना IFMS दिया, बल्कि उस रकम के कलेक्शन, निवेश, इस्तेमाल और ट्रांसफर का रिकॉर्ड भी उपलब्ध रहेगा।
मान लीजिए किसी सोसायटी में सैकड़ों फ्लैट हैं और हर खरीदार से IFMS लिया गया है। ऐसे में कुल कॉर्पस काफी बड़ी रकम हो सकता है। नए नियमों के तहत इस रकम को अलग खाते में रखना, FD में निवेश करना और बाद में पूरा कॉर्पस RWA को ट्रांसफर करना होगा। इससे फंड के डायवर्जन या रिकॉर्ड को लेकर विवाद की गुंजाइश कम हो सकती है।
बिल्डर और RWA दोनों की बढ़ेगी जिम्मेदारी
नए नियमों के बाद IFMS की जिम्मेदारी सिर्फ बिल्डर की नहीं रहेगी। प्रोजेक्ट हैंडओवर के बाद RWA को भी फंड का अलग लेखा-जोखा रखना होगा और CA से ऑडिट कराना होगा।
यानी व्यवस्था को दो स्तरों पर पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है—पहले बिल्डर द्वारा फंड के कलेक्शन और मैनेजमेंट में और फिर RWA द्वारा उसके इस्तेमाल में।
नोएडा-ग्रेटर नोएडा के होमबायर्स के लिए क्यों अहम?
नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद जैसे NCR के बड़े रियल एस्टेट बाजारों में बड़ी संख्या में हाउसिंग सोसायटियां हैं। यहां फ्लैट की कीमत के अलावा खरीदारों को कई तरह के चार्ज भी देने पड़ते हैं। ऐसे में IFMS की रकम और उसके इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम होना महत्वपूर्ण है।
लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के दूसरे RERA-रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स में भी इसका असर देखने को मिलेगा। हालांकि किसी प्रोजेक्ट में वास्तविक IFMS राशि कितनी होगी, यह लागू प्रोजेक्ट कैटेगरी और संबंधित नियमों के अनुसार देखना जरूरी है।
घर खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
अगर आप UP में फ्लैट खरीदने की तैयारी कर रहे हैं तो IFMS से जुड़े दस्तावेजों को नजरअंदाज न करें। बुकिंग या रजिस्ट्री से पहले यह जरूर देखें कि:
- IFMS की राशि कितनी ली जा रही है।
- रकम किस आधार पर तय की गई है।
- प्रोजेक्ट किस कैटेगरी में आता है।
- IFMS और सामान्य मेंटेनेंस चार्ज अलग-अलग बताए गए हैं या नहीं।
- प्रोजेक्ट के दस्तावेजों में IFMS का उल्लेख किस तरह किया गया है।
- प्रोजेक्ट हैंडओवर के समय फंड और उसका पूरा रिकॉर्ड RWA को कैसे ट्रांसफर किया जाएगा।
निष्कर्ष
UP RERA का 12वां संशोधन IFMS फंड को लेकर बड़ा बदलाव है। अब बिल्डरों को इस रकम के लिए अलग बैंक अकाउंट रखना होगा, उपलब्ध बैंकों में सबसे ज्यादा ब्याज देने वाली FD में निवेश करना होगा और कॉमन एरिया का हैंडओवर करते समय पूरा IFMS कॉर्पस RWA या Association of Allottees को ट्रांसफर करना होगा।
इसके साथ यूनिट-वाइज कलेक्शन, खर्च और ऑडिट ट्रेल की जानकारी देना तथा RWA के स्तर पर अलग अकाउंट और CA ऑडिट की व्यवस्था भी की गई है। इससे नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ और उत्तर प्रदेश के अन्य RERA-रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट्स में घर खरीदने वालों के लिए IFMS को लेकर पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है। UP RERA की वेबसाइट पर 12वें संशोधन को 13 जुलाई 2026 को अधिसूचित किया गया है।


