भारत में स्वच्छता को लेकर पिछले एक दशक में बड़े स्तर पर अभियान चलाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर एक सच्चाई बार-बार सामने आई है—सिर्फ शौचालय बना देना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती लोगों की सोच बदलना है। इसी सच्चाई का सामना तब हुआ जब Toyota Kirloskar Motor (TKM) ने कर्नाटक के ग्रामीण स्कूलों में शौचालय बनाए, लेकिन पाया कि उनका उपयोग लगभग नहीं हो रहा था।
यह अनुभव केवल एक कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) प्रोजेक्ट की असफलता नहीं था, बल्कि इसने भारत के स्वच्छता मॉडल की एक बड़ी खामी को उजागर किया—infrastructure बनाना आसान है, behaviour बदलना मुश्किल।
जब बने शौचालय, लेकिन कोई इस्तेमाल नहीं करता था
करीब एक दशक पहले TKM ने कर्नाटक के गांवों के सरकारी स्कूलों में शौचालय निर्माण का काम शुरू किया। शुरुआत में सब कुछ ठीक लग रहा था—स्कूलों में सुविधाएं बन रही थीं, रिपोर्ट्स में प्रगति दिखाई दे रही थी।
लेकिन जब ग्राउंड लेवल पर समीक्षा की गई, तो एक चौंकाने वाली बात सामने आई—शौचालय बने थे, पर बच्चे और समुदाय उनका उपयोग नहीं कर रहे थे।
PTI से बातचीत में TKM के कंट्री हेड और एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट Vikram Gulati ने बताया कि जब कंपनी ने इसका कारण समझने की कोशिश की, तो पता चला कि गांवों में यह धारणा गहरी जमी हुई थी कि घर या परिसर के अंदर शौचालय होना “अस्वच्छ” है।
कई लोग मानते थे कि खुले में जाना ही अधिक “स्वास्थ्यकर” और पारंपरिक रूप से सही तरीका है।
यहीं से बदली रणनीति: ‘बनाओ’ से ‘समझाओ’ तक
इस समस्या को समझने के बाद TKM ने एक बड़ा फैसला लिया—शौचालय निर्माण को रोक दिया गया और फोकस पूरी तरह behavioral change पर शिफ्ट कर दिया गया।
यहीं से 2015-16 में शुरू हुआ ABCD (A Behavioural Change Demonstration) कार्यक्रम।
इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य था लोगों की सोच बदलना—उन्हें यह समझाना कि शौचालय का उपयोग स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा के लिए क्यों जरूरी है।
दो बच्चियों की हड़ताल से आया पहला बड़ा बदलाव
इस कार्यक्रम की सबसे दिलचस्प और प्रभावशाली घटना कर्नाटक के रामनगर जिले में सामने आई।
लगभग 11-12 साल की दो बच्चियों ने अपने घरों में शौचालय बनवाने के लिए एक अनोखा कदम उठाया—उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी और अपने परिवारों पर दबाव बनाया कि वे घर में शौचालय बनाएं।
यह कदम सफल रहा और परिवारों ने आखिरकार शौचालय बनवाए।
Vikram Gulati के अनुसार, यह घटना कार्यक्रम के लिए पहला “breakthrough moment” थी। इससे यह साबित हुआ कि अगर बच्चों को सही जानकारी और प्रेरणा दी जाए, तो वे खुद बदलाव के एजेंट बन सकते हैं।
‘Child to Community’ मॉडल: बच्चों से समाज तक बदलाव
ABCD कार्यक्रम की सबसे बड़ी ताकत इसका Child to Community approach रहा।
इसमें बच्चों को केवल स्वच्छता के बारे में सिखाया नहीं गया, बल्कि उन्हें “change makers” बनाया गया।
स्कूलों में बच्चों को सिखाया गया:
- सही तरीके से हाथ धोना
- शौचालय का उपयोग
- व्यक्तिगत स्वच्छता
- साफ पानी का महत्व
फिर यही बच्चे घर जाकर अपने परिवारों को सिखाने लगे।
इस तरह बदलाव की एक “ripple effect” बनी—कक्षा से घर और फिर पूरे समुदाय तक।
आंकड़े बताते हैं असली कहानी
जब कार्यक्रम को कर्नाटक के रायचूर जिले में विस्तार दिया गया—जो कि भारत सरकार द्वारा “Aspirational District” के रूप में चिन्हित है—तब एक बेसलाइन सर्वे (दिसंबर 2023) ने स्थिति की गंभीरता उजागर की:
- केवल 48% आवश्यक शौचालय ही मौजूद थे
- उनमें से सिर्फ 20% ही उपयोग योग्य थे
- 12% स्कूलों में हैंडवॉश की सुविधा ही नहीं थी
- 90% बच्चे खुले नल के पानी पर निर्भर थे
- हर 4 में से 1 बच्चा अभी भी open defecation करता था
- 44% बच्चों के घर में शौचालय नहीं था
ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल infrastructure की नहीं, बल्कि awareness और maintenance की भी थी।
दो साल में बड़ा बदलाव
कार्यक्रम के लागू होने के दो वर्षों के भीतर, स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखा गया:
- शौचालय उपयोग 76% से बढ़कर 95% हो गया
- हैंडवॉश पालन 20.5% से बढ़कर 100% हो गया
- 75 नए शौचालय और 30 यूरिनल बनाए गए
- 58 हैंडवॉश टेप लगाए या ठीक किए गए
- 28 स्कूलों में सुरक्षित पेयजल सुविधा दी गई
- 3,546 किशोरियों को menstrual hygiene की ट्रेनिंग दी गई
यह बदलाव दिखाता है कि सही रणनीति के साथ behavioral change संभव है।
समुदाय पर असर: घरों तक पहुंचा बदलाव
इस कार्यक्रम का असर केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रहा।
- 1,382 माता-पिता को घर में शौचालय बनाने के लिए प्रेरित किया गया
- इनमें से 38 परिवारों ने निर्माण पूरा भी किया
हालांकि यह संख्या कम लग सकती है, लेकिन rural behaviour change के संदर्भ में यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत मानी जाती है।
स्वच्छ भारत मिशन और जमीनी हकीकत
Swachh Bharat Mission के तहत 2014 से अब तक करोड़ों शौचालय बनाए जा चुके हैं।
लेकिन कई स्वतंत्र शोध और सरकारी रिपोर्ट्स ने यह दिखाया है कि:
- शौचालय बनने के बाद भी उनका उपयोग नहीं होता
- पानी और maintenance की कमी रहती है
- behavioral barriers सबसे बड़ी चुनौती हैं
TKM का ABCD कार्यक्रम इसी gap को भरने की कोशिश करता है।
अंतरराष्ट्रीय पहचान
इस पहल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है।
- Harvard Business School ने इसे case study के रूप में शामिल किया
- Ivey Business School ने भी इसे प्रकाशित किया
ग्रामीण भारत की sanitation initiative को इस स्तर की recognition मिलना बेहद दुर्लभ माना जाता है।
CSR निवेश और विस्तार
TKM ने FY 2025-26 में CSR गतिविधियों पर ₹104.7 करोड़ खर्च किए।
कंपनी का CSR काम शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, स्किल डेवलपमेंट और सड़क सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है।
2025-26 में कंपनी ने अपना विस्तार 12 राज्यों तक कर लिया, जिनमें उत्तराखंड, नागालैंड, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और ओडिशा शामिल हैं।
अब 2026-27 तक इसे 22 राज्यों तक ले जाने की योजना है।
आगे की दिशा
रायचूर में कार्यक्रम अभी भी जारी है, जबकि रामनगर में यह स्थिर हो चुका है।
TKM का लक्ष्य है कि यह मॉडल देश के अन्य हिस्सों में भी लागू किया जाए, ताकि sanitation को केवल निर्माण नहीं बल्कि व्यवहार का हिस्सा बनाया जा सके।
निष्कर्ष: असली बदलाव सोच बदलने से आता है
Toyota Kirloskar Motor का यह अनुभव एक बड़ा सबक देता है—development केवल infrastructure नहीं, mindset का भी खेल है।
अगर लोग शौचालय का उपयोग नहीं करेंगे, तो लाखों करोड़ खर्च करने के बाद भी स्वच्छता का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।
ABCD कार्यक्रम दिखाता है कि सही रणनीति, बच्चों की भागीदारी और समुदाय की involvement के जरिए बड़े बदलाव संभव हैं।
Disclaimer
यह लेख PTI द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट और आधिकारिक बयानों पर आधारित है। आंकड़े कंपनी और सर्वे डेटा पर आधारित हैं, जिनमें समय के साथ बदलाव संभव है।
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