Tewolde Gebremariam Success Story: अफ्रीका की एक छोटी एयरलाइन को ग्लोबल एविएशन पावरहाउस बनाने वाले टेवोल्डे गेब्रेमरियम अब एयर इंडिया की कमान संभालने जा रहे हैं। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती घाटे में चल रही एयरलाइन को दोबारा मुनाफे की राह पर लाना और एक मजबूत ग्लोबल ब्रांड बनाना है।
टाटा ग्रुप की एयरलाइन एयर इंडिया को आखिरकार नया सीईओ मिल गया है। टाटा ग्रुप ने इथियोपियन एयरलाइंस के पूर्व प्रमुख टेवोल्डे गेब्रेमरियम को एयर इंडिया का नया CEO और Managing Director नियुक्त किया है। यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब एयर इंडिया बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है और कंपनी को वित्तीय, परिचालन और सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
टेवोल्डे के सामने सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि जिस तरह उन्होंने इथियोपियन एयरलाइंस को अफ्रीका की सबसे बड़ी और सबसे सफल एयरलाइनों में शामिल किया, उसी तरह वह एयर इंडिया के लंबे समय से चले आ रहे बदलाव को भी रफ्तार दे सकें।
कौन हैं टेवोल्डे गेब्रेमरियम?
टेवोल्डे गेब्रेमरियम इथियोपिया के अनुभवी एविएशन एग्जीक्यूटिव हैं। उन्होंने Addis Ababa University से Economics और Business की पढ़ाई की। खास बात यह है कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत इथियोपियन एयरलाइंस में निचले स्तर की जिम्मेदारी से की थी और धीरे-धीरे कंपनी के शीर्ष पद तक पहुंचे।
उनका एयरलाइन इंडस्ट्री से जुड़ाव केवल मैनेजमेंट तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने इथियोपियन एयरलाइंस के लिए अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में जिम्मेदारियां संभालीं। भारत में भी उन्होंने एयरलाइन के रीजनल डायरेक्टर के रूप में काम किया था। इसके अलावा सऊदी अरब और अमेरिका में भी उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं।
यानी एयर इंडिया के लिए उनकी खासियत सिर्फ CEO के तौर पर अनुभव नहीं, बल्कि एयरलाइन के ऑपरेशन को जमीन से समझने का लंबा अनुभव भी है।
11 साल में बदल दी इथियोपियन एयरलाइंस की तस्वीर
टेवोल्डे ने 2011 से 2022 तक इथियोपियन एयरलाइंस का नेतृत्व किया। इस दौरान उन्होंने एयरलाइन के बिजनेस मॉडल, नेटवर्क, बेड़े और अंतरराष्ट्रीय विस्तार पर खास जोर दिया।
उनके नेतृत्व में कंपनी ने तेजी से विस्तार किया और अफ्रीका की प्रमुख एविएशन कंपनियों में अपनी जगह मजबूत की। रिपोर्टों के मुताबिक, इस अवधि में एयरलाइन का रेवेन्यू करीब चार गुना बढ़ा और उसका विमान बेड़ा भी लगभग तीन गुना हुआ।
उनकी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि इथियोपियन एयरलाइंस ने केवल अपने घरेलू बाजार पर निर्भर रहने के बजाय Addis Ababa को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय हब के रूप में विकसित किया। इससे अफ्रीका को यूरोप, एशिया, अमेरिका और मध्य पूर्व से जोड़ने में एयरलाइन को फायदा मिला।
यही हब-आधारित रणनीति कंपनी की ग्रोथ का बड़ा आधार बनी।
छोटी एयरलाइन से अफ्रीका की बड़ी ताकत तक
जब टेवोल्डे ने नेतृत्व संभाला, तब इथियोपियन एयरलाइंस के सामने कई सीमाएं थीं। अफ्रीकी एविएशन मार्केट में अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी आसान नहीं थी और कई देशों के बीच हवाई यातायात भी सीमित था।
लेकिन कंपनी ने अपने लोकेशन का फायदा उठाया। Addis Ababa को ट्रांजिट हब बनाकर एयरलाइन ने अफ्रीका के अलग-अलग हिस्सों को दुनिया के दूसरे क्षेत्रों से जोड़ना शुरू किया।
इस रणनीति का नतीजा यह हुआ कि एयरलाइन का नेटवर्क तेजी से बढ़ा और इथियोपियन एयरलाइंस अफ्रीका की सबसे बड़ी एयरलाइनों में शामिल हो गई।
टेवोल्डे का मॉडल सिर्फ ज्यादा उड़ानें शुरू करने पर आधारित नहीं था। इसमें फ्लीट विस्तार, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, कार्गो बिजनेस, ट्रांजिट पैसेंजर और ऑपरेशनल एफिशिएंसी जैसे कई हिस्से शामिल थे।
कोरोना महामारी में भी दिखा नेतृत्व
टेवोल्डे के नेतृत्व की असली परीक्षा कोरोना महामारी के दौरान भी हुई। दुनिया की कई एयरलाइंस को भारी नुकसान हुआ और सरकारों से आर्थिक मदद की जरूरत पड़ी।
इथियोपियन एयरलाइंस ने इस दौर में यात्री उड़ानों में आई गिरावट के बीच अपने कार्गो ऑपरेशन का इस्तेमाल किया। Reuters के मुताबिक, टेवोल्डे ने कंपनी को महामारी के दौरान सरकारी बेलआउट के बिना चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
एयर कार्गो और लॉजिस्टिक्स पर फोकस ने कंपनी को संकट के समय अतिरिक्त सहारा दिया। यही अनुभव एयर इंडिया के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि भारत जैसे बड़े बाजार में इंटरनेशनल पैसेंजर ट्रैफिक के साथ एयर कार्गो में भी बड़ा अवसर मौजूद है।
2022 में क्यों छोड़ी इथियोपियन एयरलाइंस?
टेवोल्डे ने करीब 11 साल तक इथियोपियन एयरलाइंस का नेतृत्व करने के बाद 2022 में पद छोड़ दिया। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए CEO पद से इस्तीफा दिया था।
इसके बाद भी उनका एविएशन इंडस्ट्री से रिश्ता खत्म नहीं हुआ। वह एविएशन और बिजनेस से जुड़ी रणनीतिक सलाहकार भूमिकाओं में सक्रिय रहे।
अब करीब चार साल बाद वह एक नई चुनौती के साथ वापस एयरलाइन इंडस्ट्री के सबसे चर्चित बाजारों में से एक भारत में लौट रहे हैं।
एयर इंडिया के लिए आसान नहीं होगी राह
टेवोल्डे के पास शानदार ट्रैक रिकॉर्ड जरूर है, लेकिन एयर इंडिया की समस्या इथियोपियन एयरलाइंस से काफी अलग है।
टाटा ग्रुप के स्वामित्व में आने के बाद एयर इंडिया ने कई बड़े बदलाव किए हैं। बेड़े के आधुनिकीकरण से लेकर ब्रांडिंग, डिजिटल सिस्टम और Vistara के साथ विलय तक कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
इसके बावजूद कंपनी अभी तक मुनाफे की स्थिति में नहीं पहुंच पाई है।
FY26 में एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस का संयुक्त नेट लॉस ₹22,238 करोड़ रहा, जो पिछले वित्त वर्ष के ₹10,859 करोड़ के नुकसान से दोगुने से भी ज्यादा है। दोनों कंपनियों का संयुक्त रेवेन्यू भी करीब 9% घटकर ₹71,870 करोड़ रह गया।
इसलिए टेवोल्डे के सामने सिर्फ एयरलाइन को बड़ा बनाने की चुनौती नहीं है। उन्हें पहले इसे आर्थिक रूप से टिकाऊ और ऑपरेशनल रूप से मजबूत बनाना होगा।
सुरक्षा और भरोसा भी बड़ी चुनौती
एयर इंडिया के नए CEO के सामने वित्तीय प्रदर्शन के साथ सुरक्षा और यात्री भरोसा भी बड़ा मुद्दा है।
2025 में एयर इंडिया की एक Boeing 787 दुर्घटना के बाद सुरक्षा और रेगुलेटरी अनुपालन को लेकर कंपनी पर काफी दबाव रहा है। Reuters के अनुसार, नए CEO को सुरक्षा और compliance से जुड़ी चिंताओं के बीच एयरलाइन को संभालना होगा।
टेवोल्डे के लिए यहां उनका पुराना अनुभव काम आ सकता है। उन्होंने इथियोपियन एयरलाइंस को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में बदलते समय सुरक्षा, ऑपरेशन और फ्लीट मैनेजमेंट को भी प्राथमिकता दी थी।
पाकिस्तान का एयरस्पेस और पश्चिम एशिया संकट
एयर इंडिया के लिए मौजूदा समय में भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी चुनौती बढ़ा रही हैं।
पाकिस्तान के एयरस्पेस से जुड़ी पाबंदियों और पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कई इंटरनेशनल रूट प्रभावित हुए हैं। लंबी दूरी के वैकल्पिक रूट अपनाने से उड़ान का समय और ईंधन खर्च बढ़ता है। इससे कुछ रूट आर्थिक रूप से कम आकर्षक हो सकते हैं।
इसके अलावा जेट फ्यूल की कीमत, विमान की उपलब्धता, स्पेयर पार्ट्स और नए विमानों की डिलीवरी में देरी जैसी समस्याएं भी एयरलाइन की लागत पर असर डालती हैं।
500 से ज्यादा विमानों का बड़ा ऑर्डर, लेकिन डिलीवरी चुनौती
एयर इंडिया ने भविष्य में अपने बेड़े को काफी बड़ा करने की योजना बनाई है। कंपनी के पास 500 से ज्यादा विमानों का बड़ा ऑर्डर है, लेकिन विमानों की डिलीवरी, पुराने विमानों का आधुनिकीकरण और केबिन रिफर्बिशमेंट अपने आप में बड़ी चुनौती हैं।
टेवोल्डे को यह तय करना होगा कि किस रूट पर कितनी क्षमता लगाई जाए, किन बाजारों में विस्तार किया जाए और किन उड़ानों को आर्थिक रूप से बेहतर बनाया जाए।
यहीं उनका पुराना अनुभव सबसे ज्यादा काम आ सकता है।
एयर इंडिया को टेवोल्डे से क्या उम्मीद?
टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने टेवोल्डे की नियुक्ति को उनके पिछले ट्रैक रिकॉर्ड से जोड़ते हुए कहा है कि दुनिया की कुशल और लाभदायक एयरलाइन बनाने का उनका अनुभव एयर इंडिया के लिए उपयोगी हो सकता है। उनकी ऑपरेशनल क्षमता, सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता और ग्रोथ का नजरिया एयर इंडिया के लिए महत्वपूर्ण होगा।
लेकिन टाटा ग्रुप खुद भी मान चुका है कि एयर इंडिया का पूरा बदलाव कुछ तिमाहियों में नहीं होगा। चंद्रशेखरन के अनुसार, एक ग्लोबल एयरलाइन बनाने की प्रक्रिया में 5 से 10 साल तक लग सकते हैं।
इसका मतलब है कि टेवोल्डे के सामने कोई शॉर्ट-टर्म चमत्कार करने की उम्मीद नहीं होनी चाहिए। असली परीक्षा लंबे समय में एयरलाइन की लागत, नेटवर्क, ग्राहक अनुभव, सुरक्षा और मुनाफे में सुधार की होगी।
इथियोपियन मॉडल क्या एयर इंडिया में काम करेगा?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
इथियोपियन एयरलाइंस की सफलता में Addis Ababa की भौगोलिक स्थिति, अफ्रीकी बाजार की जरूरतें और कंपनी की हब रणनीति का बड़ा योगदान रहा। भारत का बाजार इससे बहुत अलग है।
भारत में घरेलू एविएशन मार्केट में मजबूत प्रतिस्पर्धा है और इंटरनेशनल रूट्स पर भी Emirates, Qatar Airways, Singapore Airlines जैसी बड़ी ग्लोबल एयरलाइंस मौजूद हैं।
इसलिए टेवोल्डे को इथियोपियन मॉडल को हूबहू कॉपी करने के बजाय भारतीय बाजार के हिसाब से बदलना होगा।
उनके लिए सबसे बड़ा अवसर यह हो सकता है कि भारत को एक मजबूत ग्लोबल ट्रांजिट हब के रूप में विकसित किया जाए और एयर इंडिया की इंटरनेशनल नेटवर्क क्षमता का ज्यादा प्रभावी इस्तेमाल किया जाए।
टेवोल्डे के सामने असली मिशन
टेवोल्डे गेब्रेमरियम के सामने अब सिर्फ एक एयरलाइन का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी नहीं है। उन्हें टाटा ग्रुप के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में से एक को सफल बनाना है।
उनके सामने मुख्य चुनौतियां होंगी—
- एयर इंडिया के भारी घाटे को कम करना
- सुरक्षा और रेगुलेटरी अनुपालन को मजबूत करना
- विमान बेड़े के आधुनिकीकरण में तेजी लाना
- इंटरनेशनल नेटवर्क को ज्यादा लाभदायक बनाना
- फ्लीट और क्रू का बेहतर इस्तेमाल करना
- ईंधन और दूसरी परिचालन लागत को नियंत्रित करना
- यात्रियों के अनुभव और भरोसे में सुधार करना
- एयर इंडिया को एक मजबूत ग्लोबल ब्रांड बनाना
अगर वह इन क्षेत्रों में लगातार सुधार कर पाते हैं, तो एयर इंडिया के लिए उनका कार्यकाल भारतीय एविएशन इंडस्ट्री में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
इथियोपियन एयरलाइंस को अफ्रीका की एविएशन ताकत बनाने के बाद अब टेवोल्डे गेब्रेमरियम के सामने भारत की सबसे चर्चित एयरलाइन को बदलने की चुनौती है। उनका पिछला रिकॉर्ड उम्मीद जगाता है, लेकिन एयर इंडिया का आकार, बाजार और मौजूदा समस्याएं कहीं ज्यादा जटिल हैं। इसलिए अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि वह अपने अफ्रीकी अनुभव को भारतीय बाजार की जरूरतों के साथ कैसे जोड़ते हैं।


