नई दिल्ली — सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान कड़ा रुख देखने को मिला, जब मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि यदि निराधार याचिकाएं दायर करना जारी रखा गया, तो अदालत में प्रवेश तक प्रतिबंधित किया जा सकता है।
यह टिप्पणी उस समय आई जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनकी आजाद हिंद फौज से जुड़े एक संवेदनशील मुद्दे पर फिर से याचिका दाखिल की गई थी, जिसे पहले भी खारिज किया जा चुका था।
क्या था पूरा मामला?
दरअसल, याचिकाकर्ता पिनाकपानी मोहंती ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर यह मांग की थी कि भारत की आजादी का श्रेय आधिकारिक रूप से नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज को दिया जाए।
इसके अलावा याचिका में कई अन्य मांगें भी रखी गई थीं, जैसे:
- नेताजी को “राष्ट्रीय पुत्र” घोषित किया जाए
- उनके जन्मदिन को “राष्ट्रीय दिवस” घोषित किया जाए
- ओडिशा के कटक स्थित उनके जन्मस्थान को राष्ट्रीय संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाए
- 1946-47 के विद्रोह और स्वतंत्रता से जुड़े तथ्यों की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए
हालांकि, अदालत ने इन मांगों को न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे से बाहर बताते हुए याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने क्यों जताई नाराज़गी?
सुनवाई के दौरान सबसे अहम बात यह रही कि यह याचिका पहली बार नहीं लगाई गई थी।
CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से पूछा:
“क्या आपने पहले भी ऐसी याचिका दायर की थी?”
इस पर याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि “यह बार अलग है”, लेकिन अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा:
- इसी तरह की याचिका पहले ही 2024 में खारिज की जा चुकी है
- बार-बार एक ही मुद्दे को अलग रूप में पेश करना न्यायालय का समय बर्बाद करना है
“सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बैन कर देंगे” — सख्त चेतावनी
पीठ ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा:
“अब सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बैन करवा देंगे तुम्हारा… पहले भी यही याचिका खारिज हो चुकी है।”
यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि अदालत अब फ्रिवोलस (निराधार) याचिकाओं के खिलाफ और ज्यादा सख्त रुख अपना रही है।
कोर्ट का स्पष्ट रुख: इतिहास तय करना न्यायपालिका का काम नहीं
अदालत ने साफ किया कि:
- ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या या उनका श्रेय तय करना न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र नहीं है
- यह विषय इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के दायरे में आता है
इस तरह कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि हर संवेदनशील या भावनात्मक मुद्दा अदालत के हस्तक्षेप का विषय नहीं हो सकता।
क्यों बढ़ रही हैं ऐसी याचिकाएं?
पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स में PIL की संख्या तेजी से बढ़ी है। इनमें से कई याचिकाएं:
- सार्वजनिक हित से ज्यादा व्यक्तिगत या प्रचार आधारित होती हैं
- पहले से खारिज मामलों को दोहराने की कोशिश करती हैं
- न्यायालय के समय और संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं
इसी कारण अब अदालतें ऐसे मामलों में सख्ती दिखा रही हैं।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला और टिप्पणी एक जरूरी संदेश देती है:
- न्यायपालिका का समय सीमित है और उसे गंभीर मामलों के लिए सुरक्षित रखना जरूरी है
- बार-बार एक ही विषय पर याचिका दाखिल करना “process abuse” माना जा सकता है
- अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो न्यायिक प्रणाली पर बोझ बढ़ेगा
निष्कर्ष: न्यायालय का समय बर्बाद करना पड़ेगा भारी
इस पूरे मामले से एक बात साफ है —
सुप्रीम कोर्ट अब बिना आधार वाली याचिकाओं को लेकर बिल्कुल भी नरमी के मूड में नहीं है।
CJI सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी यह बताती है कि:
- अदालत अपने समय और प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखना चाहती है
- बार-बार एक ही मुद्दे को उठाने वालों पर कार्रवाई हो सकती है
- जरूरत पड़ी तो कोर्ट में एंट्री तक बैन की जा सकती है
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