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Reading: केजरीवाल की याचिका खारिज: जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सुनवाई से हटने से किया इनकार, कहा— “आरोप सिर्फ कयास”
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केजरीवाल की याचिका खारिज: जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सुनवाई से हटने से किया इनकार, कहा— “आरोप सिर्फ कयास”

Namam Sharma
Last updated: 2026/04/21 at 6:01 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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7 Min Read
kejriwal-plea-rejected-delhi-high-court-justice-swarnkanta-sharma-liquor-policy-case
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नई दिल्ली, 20 अप्रैल 2026 — दिल्ली की राजनीति और न्यायपालिका के बीच एक अहम घटनाक्रम सामने आया है, जहां अरविंद केजरीवाल द्वारा दायर याचिका को दिल्ली हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया। इस याचिका में केजरीवाल ने मांग की थी कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा खुद को दिल्ली शराब नीति मामले की सुनवाई से अलग कर लें।

Contents
पूरा मामला क्या है और विवाद की जड़ कहाँ से शुरू हुई?कोर्ट का साफ संदेश: “न्याय अनुमान पर नहीं चलता”आरएसएस कार्यक्रम में शामिल होने का आरोप — कोर्ट ने क्यों खारिज किया?“हितों का टकराव” — क्या सच में कोई आधार था?राजनीतिक बयानों का कोर्ट पर कोई असर नहीं“कैच-22” स्थिति: जज ने खुद समझाया पूरा द्वंद्व“यह अदालत आरोपों के बोझ तले नहीं दबेगी”कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?आगे क्या होगा?निष्कर्ष: सिर्फ एक केस नहीं, सिस्टम के लिए संदेश

हालांकि, कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि बिना ठोस साक्ष्य के लगाए गए आरोप न केवल निराधार हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश भी माने जा सकते हैं।


पूरा मामला क्या है और विवाद की जड़ कहाँ से शुरू हुई?

दिल्ली शराब नीति से जुड़ा मामला पिछले काफी समय से राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बना हुआ है। इसी सिलसिले में जब मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तो केजरीवाल ने एक याचिका दायर कर जज के निष्पक्ष होने पर सवाल उठाए।

याचिका में कहा गया कि उन्हें “वास्तविक और उचित आशंका” है कि मौजूदा बेंच के सामने उन्हें निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिल पाएगी। यह मांग भारतीय न्यायिक प्रणाली में असामान्य नहीं है, लेकिन इसे साबित करने के लिए ठोस आधार जरूरी होता है।

यहीं पर केजरीवाल की याचिका कमजोर पड़ती दिखी।


कोर्ट का साफ संदेश: “न्याय अनुमान पर नहीं चलता”

सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने बेहद स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि:

“याचिका में लगाए गए आरोप केवल आशंकाओं और कयासों पर आधारित हैं, जिनका कोई ठोस साक्ष्य नहीं है।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि अदालत ऐसे आरोपों के आधार पर खुद को मामलों से अलग करने लगे, तो इससे न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा।

यह टिप्पणी सिर्फ इस केस तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक सिद्धांत को दर्शाती है — न्यायपालिका की स्वतंत्रता और स्थिरता।


आरएसएस कार्यक्रम में शामिल होने का आरोप — कोर्ट ने क्यों खारिज किया?

केजरीवाल की ओर से यह भी आरोप लगाया गया था कि जस्टिस शर्मा आरएसएस से जुड़े संगठन के कार्यक्रमों में शामिल हुई हैं, जिससे पक्षपात की आशंका पैदा होती है।

इस पर कोर्ट ने विस्तार से जवाब दिया।

जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि:

  • ये कार्यक्रम कानूनी विषयों, नए आपराधिक कानूनों और महिला दिवस जैसे मुद्दों पर आधारित थे
  • ऐसे आयोजनों में कई न्यायाधीश समय-समय पर शामिल होते रहे हैं
  • इसे किसी राजनीतिक विचारधारा से जोड़ना गलत व्याख्या है

उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीश समाज से अलग-थलग नहीं रह सकते और उनका विभिन्न मंचों पर जाना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।


“हितों का टकराव” — क्या सच में कोई आधार था?

याचिका में एक और बड़ा आरोप यह था कि जस्टिस शर्मा के बच्चे सरकारी वकीलों के पैनल से जुड़े हैं, जिससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) की स्थिति बन सकती है।

लेकिन कोर्ट ने इस दावे को भी ठोस आधार के अभाव में खारिज कर दिया।

जस्टिस शर्मा ने कहा:

  • याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि उनके बच्चों का इस केस से कोई संबंध है
  • सिर्फ रिश्तों के आधार पर पक्षपात मान लेना न्यायसंगत नहीं है
  • न्यायाधीशों के परिवार के सदस्यों को भी अपने पेशे चुनने का अधिकार है

यहां कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू भी उठाया — मौलिक अधिकार।


राजनीतिक बयानों का कोर्ट पर कोई असर नहीं

याचिका में अमित शाह के एक बयान का भी हवाला दिया गया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ सकता है।

इस पर कोर्ट ने साफ कहा:

“किसी राजनेता के सार्वजनिक बयान पर न्यायालय का कोई नियंत्रण नहीं होता, और न ही इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।”

यह टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि अदालतें बाहरी दबाव या राजनीतिक माहौल से स्वतंत्र होकर काम करती हैं।


“कैच-22” स्थिति: जज ने खुद समझाया पूरा द्वंद्व

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने फैसले में एक दिलचस्प लेकिन गंभीर स्थिति का जिक्र किया, जिसे उन्होंने “कैच-22” बताया।

उन्होंने कहा:

  • अगर वे खुद को मामले से अलग करती हैं, तो कहा जाएगा कि वे दबाव में झुक गईं
  • अगर नहीं हटतीं, तो पक्षपात का आरोप लगाया जाएगा

इस तरह की स्थिति में कोर्ट को संतुलन बनाना होता है — और उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायिक कर्तव्य से पीछे हटना सही विकल्प नहीं है।


“यह अदालत आरोपों के बोझ तले नहीं दबेगी”

अपने फैसले के अंतिम हिस्से में जस्टिस शर्मा ने बेहद सख्त टिप्पणी की:

“यह न्यायालय आरोपों और संकेतों के बोझ तले नहीं दब सकता। यदि ऐसा किया गया, तो यह न्याय का प्रबंधन (managed justice) कहलाएगा, न कि न्याय।”

यह बयान इस फैसले का सबसे मजबूत संदेश माना जा रहा है।


कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

कई कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करता है।

उनके अनुसार:

  • अगर केवल आरोपों के आधार पर जज बदलने की अनुमति मिल जाए, तो इसका दुरुपयोग हो सकता है
  • इससे “फोरम शॉपिंग” जैसी प्रवृत्ति बढ़ सकती है, जहां पक्ष अपने हिसाब से जज चुनने की कोशिश करते हैं

इस फैसले ने ऐसे संभावित खतरों पर रोक लगाने का संकेत दिया है।


आगे क्या होगा?

अब जबकि याचिका खारिज हो चुकी है:

  • उसी बेंच के सामने मामले की सुनवाई जारी रहेगी
  • दिल्ली शराब नीति केस में अगली सुनवाई और भी महत्वपूर्ण हो सकती है
  • राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर इस फैसले के प्रभाव देखने को मिलेंगे

निष्कर्ष: सिर्फ एक केस नहीं, सिस्टम के लिए संदेश

यह मामला सिर्फ केजरीवाल या एक याचिका तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े सवाल से जुड़ा है कि क्या न्यायपालिका बाहरी आरोपों और दबाव से प्रभावित हो सकती है?

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि:

  • न्याय केवल साक्ष्यों पर आधारित होगा
  • आरोपों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया नहीं बदली जाएगी

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TAGGED: Court News Hindi, Delhi Liquor Policy Case, Indian Judiciary, Kejriwal Plea Rejected, अरविंद केजरीवाल केस, केजरीवाल याचिका खारिज, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा, दिल्ली हाई कोर्ट, शराब नीति मामला
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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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