नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा चीनी की जमाखोरी और सट्टेबाजी पर लगाम लगाने के उद्देश्य से लागू की गई नई शुगर स्टॉक लिमिट के बाद अब उद्योग जगत से विरोध के स्वर उठने लगे हैं। नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (NFCSF) ने केंद्र सरकार से इस फैसले की समीक्षा करने और उत्पादन के लिए चीनी का उपयोग करने वाले उद्योगों को राहत देने की मांग की है। महासंघ का कहना है कि मौजूदा नियमों का असर केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बिस्कुट, कन्फेक्शनरी, पेय पदार्थ, दवा और अन्य खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
Highlights
- केंद्र सरकार ने चीनी कारोबारियों के लिए स्टॉक लिमिट लागू की।
- 1 अगस्त 2026 से देशभर में नया नियम प्रभावी हो गया।
- NFCSF ने स्टॉक लिमिट की समीक्षा की मांग उठाई।
- पूर्वोत्तर राज्यों में चीनी आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका।
- मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए अलग स्टॉक सीमा तय करने की मांग।
सरकार ने क्यों लागू की चीनी स्टॉक लिमिट?
केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने, जमाखोरी रोकने और सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने के लिए चीनी कारोबारियों और डीलरों के लिए नई Sugar Stock Limit लागू की है।
नए नियमों के अनुसार—
- कोई भी चीनी डीलर 4,000 क्विंटल से अधिक चीनी का स्टॉक नहीं रख सकेगा।
- किसी भी कारोबारी के पास 30 दिनों से अधिक का स्टॉक नहीं होना चाहिए।
- यह आदेश 1 अगस्त 2026 से पूरे देश में लागू हो गया है।
सरकार का मानना है कि इस कदम से बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिशों पर रोक लगेगी और उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर चीनी उपलब्ध होगी।
NFCSF ने क्यों जताई चिंता?
सरकारी फैसले के बाद नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (NFCSF) ने कहा कि मौजूदा नियमों का असर केवल व्यापारियों तक सीमित नहीं रहेगा। महासंघ के अनुसार, इससे विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों में चीनी की नियमित आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जहां पहले से ही लंबी सप्लाई चेन के कारण अतिरिक्त स्टॉक रखना आवश्यक होता है।
NFCSF का कहना है कि यदि स्टॉक सीमा में संशोधन नहीं किया गया तो कई क्षेत्रों में समय पर चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी पड़ सकता है असर
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, NFCSF ने शुगर (कंट्रोल) ऑर्डर, 2025 में “डीलर” की विस्तारित परिभाषा पर भी आपत्ति दर्ज कराई है। नए प्रावधानों में उन कंपनियों को भी शामिल किया गया है जो चीनी को कच्चे माल (Raw Material) के रूप में इस्तेमाल करती हैं।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- कन्फेक्शनरी निर्माता
- बिस्कुट उद्योग
- पेय पदार्थ कंपनियां
- दवा निर्माता
- अन्य खाद्य प्रसंस्करण उद्योग
महासंघ का कहना है कि ये कंपनियां चीनी का उपयोग केवल अपने उत्पादन के लिए करती हैं, न कि व्यापार या रीसेल के लिए। ऐसे उद्योगों पर सामान्य डीलरों जैसी स्टॉक सीमा लागू करने से उत्पादन प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
क्या है NFCSF की मांग?
NFCSF ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि—
- कैप्टिव कंजम्प्शन (Captive Consumption) के लिए चीनी इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को स्टॉक लिमिट से छूट दी जाए।
- यदि पूरी छूट संभव नहीं हो तो इनके लिए अलग और व्यावहारिक स्टॉक सीमा तय की जाए।
- पूर्वोत्तर राज्यों की आपूर्ति व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधान बनाए जाएं।
महासंघ का मानना है कि इससे एक ओर सरकार का जमाखोरी रोकने का उद्देश्य भी पूरा होगा और दूसरी ओर उत्पादन आधारित उद्योगों का संचालन भी प्रभावित नहीं होगा।
क्या हो सकता है आगे?
अब उद्योग जगत की नजर केंद्र सरकार के अगले कदम पर है। यदि सरकार NFCSF की मांगों पर विचार करती है तो उत्पादन आधारित कंपनियों और दूरदराज के राज्यों के लिए अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है। वहीं यदि मौजूदा नियम यथावत रहते हैं तो कई उद्योगों को अपने स्टॉक मैनेजमेंट और सप्लाई चेन में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।


