पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भारत जैसे देशों पर इसका असर ज्यादा पड़ता है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की बचत करने और एक साल तक गैर-जरूरी सोने की खरीद टालने की अपील की है।
लेकिन क्या भारत के पास पहले से तेल का भंडार नहीं है? क्या देश के रणनीतिक तेल रिजर्व खत्म होने वाले हैं? आखिर जमीन के नीचे बनाई गई इन विशाल गुफाओं में कितना तेल रखा गया है और यह कितने दिनों तक देश की जरूरतें पूरी कर सकता है? आइए विस्तार से समझते हैं।
जमीन के नीचे गुफाओं में रखा है भारत का रणनीतिक तेल भंडार
भारत ने अपना रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी Strategic Petroleum Reserve (SPR) जमीन के काफी नीचे चट्टानी गुफाओं में बना रखा है। ये विशाल भूमिगत भंडार देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। फिलहाल भारत के तीन प्रमुख रणनीतिक तेल भंडार मंगलौर, पादुर और विशाखापत्तनम में मौजूद हैं।
इनका संचालन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) करता है, जो पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन काम करता है। विशेषज्ञों के मुताबिक ये भंडार किसी भी वैश्विक संकट, युद्ध या सप्लाई रुकने की स्थिति में देश को कुछ समय तक ऊर्जा सुरक्षा देने के लिए बनाए गए हैं।
कितनी विशाल हैं ये भूमिगत तेल गुफाएं?
भारत की ये भूमिगत गुफाएं सामान्य स्टोरेज टैंक नहीं हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक ये गुफाएं जमीन से लगभग 90 मीटर नीचे स्थित हैं, इनकी लंबाई करीब 1 किलोमीटर तक है और ऊंचाई लगभग 10 मंजिला इमारत जितनी है।
इन चट्टानी संरचनाओं को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इनमें लंबे समय तक सुरक्षित तरीके से कच्चा तेल रखा जा सके।
समुद्र के नीचे भी रखा गया है ईंधन
भारत ने केवल जमीन के नीचे ही नहीं बल्कि समुद्र स्तर से नीचे भी ईंधन भंडारण सुविधाएं तैयार की हैं। विशाखापत्तनम में लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का भंडारण समुद्र तल से करीब 196 मीटर नीचे किया गया है। इसे दुनिया की सबसे गहरी भूमिगत ईंधन भंडारण सुविधाओं में गिना जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इस तरह की संरचनाएं युद्ध, मिसाइल हमले या प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में अधिक सुरक्षित मानी जाती हैं।
भारत के पास कितना तेल भंडार मौजूद है?
भारत के मौजूदा रणनीतिक भंडारों में लगभग 53.30 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल संग्रहित किया जा सकता है। यह मात्रा करीब 3.8 करोड़ बैरल तेल या देश की लगभग 10 दिनों की जरूरत के बराबर मानी जाती है।
हालांकि सरकार और तेल कंपनियों के वाणिज्यिक भंडारों को जोड़ दिया जाए तो भारत के पास कुल मिलाकर लगभग 74 दिनों की जरूरत पूरी करने लायक तेल मौजूद माना जाता है।
फिर PM मोदी ने सोना न खरीदने की अपील क्यों की?
यही सबसे बड़ा सवाल है। विशेषज्ञों का कहना है कि रणनीतिक तेल भंडार स्थायी समाधान नहीं होते। ये केवल आपातकालीन स्थिति में सीमित समय तक राहत दे सकते हैं।
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है और इसके लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च करता है। अगर युद्ध लंबा चलता है, तेल महंगा होता है, डॉलर मजबूत होता है और सप्लाई बाधित होती है, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव तेजी से बढ़ सकता है।
इसी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से ईंधन बचाने, सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने और गैर-जरूरी सोने की खरीद टालने की अपील की है। सोने का आयात भी डॉलर में होता है और भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड इंपोर्टर्स में शामिल है।
क्या भारत अपना तेल भंडार बढ़ा रहा है?
जी हां। भारत लगातार अपने रणनीतिक तेल भंडार का विस्तार कर रहा है। सरकार ने ओडिशा के चांदीखोल में 40 लाख मीट्रिक टन और कर्नाटक के पादुर में 25 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले नए भंडार मंजूर किए हैं।
इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भारत की कुल रणनीतिक भंडारण क्षमता में करीब 65 लाख मीट्रिक टन की अतिरिक्त बढ़ोतरी होगी।
भूमिगत गुफाओं में तेल रखने के क्या फायदे हैं?
विशेषज्ञों के मुताबिक भूमिगत चट्टानी गुफाएं रणनीतिक तेल भंडारण के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प मानी जाती हैं। इनके फायदे हैं:
- हवाई हमलों से सुरक्षा
- प्राकृतिक आपदाओं से कम खतरा
- वाष्पीकरण में कमी
- कम पर्यावरणीय जोखिम
- और लंबी अवधि तक सुरक्षित भंडारण।
इन गुफाओं में आधुनिक निगरानी प्रणाली भी लगाई जाती है ताकि रिसाव या दूषण जैसी समस्याओं को तुरंत पकड़ा जा सके।
कोविड संकट में भारत ने उठाया था बड़ा फायदा
साल 2020 में कोविड महामारी के दौरान जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से गिरी थीं, तब भारत ने सस्ता तेल खरीदकर अपने रणनीतिक भंडार भर लिए थे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इससे भारत को लगभग 5,000 करोड़ रुपये की बचत हुई थी।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में शुरू हुई थी योजना
भारत में रणनीतिक तेल भंडारण की अवधारणा 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद गंभीरता से सामने आई थी। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान 1998 में भूमिगत रणनीतिक तेल गुफाओं की योजना पर काम शुरू हुआ।
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत ने इस मॉडल को स्वीडन, जापान, दक्षिण कोरिया और फिनलैंड जैसे देशों से प्रेरित होकर अपनाया।
क्या भारत ऊर्जा संकट से पूरी तरह सुरक्षित है?
विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि रणनीतिक भंडार भारत को कुछ समय की सुरक्षा जरूर देते हैं, लेकिन लंबे समय तक आयात रुकने की स्थिति में चुनौती गंभीर हो सकती है। इसी वजह से नवीकरणीय ऊर्जा, घरेलू गैस उत्पादन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ऊर्जा बचत पर लगातार जोर दिया जा रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को भविष्य में तेल आयात निर्भरता घटाने के लिए बड़े संरचनात्मक बदलाव करने होंगे।
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