नई दिल्ली क्या कर्मचारियों को महीने में सिर्फ एक बार सैलरी मिलनी चाहिए या फिर दो बार? यह सवाल एक बार फिर चर्चा में आ गया है। शार्क टैंक इंडिया के जज और Shaadi.com के संस्थापक अनुपम मित्तल ने कंपनियों से अपील की है कि वे कर्मचारियों को महीने में दो बार वेतन देने के मॉडल पर विचार करें। उनका मानना है कि मौजूदा सैलरी सिस्टम ब्रिटिश काल की सोच पर आधारित है और आज के डिजिटल युग में इसे बदलने की जरूरत है।
मित्तल ने LinkedIn पर एक पोस्ट में कहा कि ज्यादातर कंपनियां कर्मचारियों को अगले महीने की शुरुआत में वेतन देती हैं, जबकि कर्मचारियों के खर्च पूरे महीने चलते रहते हैं। ऐसे में वेतन मिलने में कुछ दिनों की देरी भी कई लोगों के लिए आर्थिक परेशानी का कारण बन सकती है।
क्या है अनुपम मित्तल का प्रस्ताव?
अनुपम मित्तल का सुझाव है कि कर्मचारियों को महीने में दो बार वेतन दिया जाए। उदाहरण के लिए, आधी सैलरी 15 तारीख को और बाकी राशि महीने की 30 या 31 तारीख को दी जा सकती है।
उनका कहना है कि इससे कर्मचारियों का कैश फ्लो बेहतर होगा और उन्हें रोजमर्रा के खर्चों, किराए, ईएमआई और अन्य वित्तीय जिम्मेदारियों को संभालने में आसानी होगी।
मित्तल के अनुसार, Shaadi.com ने कुछ साल पहले अपनी पेरोल प्रक्रिया में बदलाव किया था। कंपनी अब अगले महीने वेतन देने के बजाय चालू महीने के अंतिम दिनों में ही कर्मचारियों के खाते में सैलरी ट्रांसफर कर देती है।
कर्मचारियों पर क्या असर पड़ेगा?
भारत में बड़ी संख्या में कर्मचारी हर महीने वेतन मिलने का इंतजार करते हैं। वेतन में कुछ दिनों की देरी होने पर कई लोगों को क्रेडिट कार्ड, पर्सनल लोन या दोस्तों-रिश्तेदारों से उधार लेने तक की नौबत आ जाती है।
यदि महीने में दो बार सैलरी मिलने लगे तो कर्मचारियों को निम्नलिखित फायदे हो सकते हैं:
- ईएमआई और किराए का भुगतान समय पर होगा।
- क्रेडिट कार्ड पर निर्भरता कम हो सकती है।
- अचानक आने वाले खर्चों को संभालना आसान होगा।
- बचत और बजट प्रबंधन बेहतर हो सकता है।
- आर्थिक तनाव और मानसिक दबाव में कमी आ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर कैश फ्लो कर्मचारियों की उत्पादकता और नौकरी संतुष्टि पर भी सकारात्मक असर डाल सकता है।
क्या दुनिया के अन्य देशों में ऐसा मॉडल है?
अमेरिका, कनाडा और कुछ यूरोपीय देशों में कई कंपनियां कर्मचारियों को Bi-Weekly या Semi-Monthly Pay System के तहत वेतन देती हैं। इसमें कर्मचारी को हर दो सप्ताह या महीने में दो बार भुगतान किया जाता है।
टेक्नोलॉजी और फिनटेक कंपनियों के बढ़ते प्रभाव के कारण दुनिया भर में “Earned Wage Access” मॉडल भी लोकप्रिय हो रहा है, जिसमें कर्मचारी अपनी कमाई का एक हिस्सा सैलरी डेट से पहले भी निकाल सकते हैं।
भारत में अभी अधिकांश कंपनियां मासिक वेतन प्रणाली का पालन करती हैं, लेकिन स्टार्टअप सेक्टर में नए प्रयोग देखने को मिल रहे हैं।
क्या कंपनियों के लिए यह आसान होगा?
महीने में दो बार सैलरी देने का विचार कर्मचारियों के लिए आकर्षक जरूर है, लेकिन कंपनियों के सामने कुछ चुनौतियां भी हो सकती हैं।
सबसे बड़ी चुनौती पेरोल प्रोसेसिंग की होगी। हालांकि आधुनिक HRMS और Payroll Software की मदद से यह प्रक्रिया पहले की तुलना में काफी आसान हो चुकी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी कंपनियां इस मॉडल को अपेक्षाकृत आसानी से लागू कर सकती हैं, लेकिन छोटे और मध्यम व्यवसायों के लिए यह अतिरिक्त प्रशासनिक लागत का कारण बन सकता है।
अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
अनुपम मित्तल का मानना है कि बेहतर कैश फ्लो का सीधा असर उपभोक्ता खर्च पर पड़ सकता है। जब लोगों के पास नियमित अंतराल पर पैसा उपलब्ध होगा तो वे अधिक आत्मविश्वास के साथ खर्च कर सकेंगे।
आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने से खुदरा व्यापार, सेवा क्षेत्र और उपभोक्ता वस्तुओं की मांग को भी समर्थन मिल सकता है। हालांकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इसका वास्तविक प्रभाव कंपनियों द्वारा इस मॉडल को अपनाने के स्तर पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष
अनुपम मित्तल का महीने में दो बार सैलरी देने का सुझाव कर्मचारियों की वित्तीय सुरक्षा और कैश फ्लो को लेकर एक नई बहस शुरू करता है। डिजिटल भुगतान और आधुनिक पेरोल तकनीकों के दौर में यह विचार असंभव नहीं लगता। हालांकि इसे व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले कंपनियों को लागत, प्रशासनिक व्यवस्था और वित्तीय प्रभावों का आकलन करना होगा। फिर भी यह चर्चा कर्मचारियों की आर्थिक जरूरतों को समझने और पारंपरिक वेतन प्रणाली पर पुनर्विचार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है।


