Saudi Oil Supply: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब की तेल आपूर्ति एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बन गई है। ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों की ओर से लाल सागर के रणनीतिक बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट को निशाना बनाए जाने से सऊदी अरब की 40 साल पुरानी ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन पर भी दबाव बढ़ गया है। यह वही पाइपलाइन है जिसने पहले होर्मुज स्ट्रेट पर संकट के दौरान वैश्विक तेल आपूर्ति को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई थी। अगर इस वैकल्पिक मार्ग पर भी असर पड़ता है तो भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े तेल आयातक देशों को महंगी ऊर्जा और सप्लाई में देरी का सामना करना पड़ सकता है।
क्यों अहम है सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन?
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन लगभग चार दशक पहले बनाई गई थी। इसका उद्देश्य फारस की खाड़ी में स्थित तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को सीधे लाल सागर के यानबू (Yanbu) बंदरगाह तक पहुंचाना है।
इस पाइपलाइन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके जरिए सऊदी अरब होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे बिना भी तेल निर्यात कर सकता है। यही कारण है कि क्षेत्रीय तनाव बढ़ने पर यह पाइपलाइन वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की लाइफलाइन मानी जाती है।
अब समस्या यह है कि लाल सागर के दक्षिणी हिस्से में स्थित बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर भी खतरा बढ़ गया है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो सऊदी अरब के पास विकल्प काफी सीमित रह जाएंगे।
हूती विद्रोहियों की धमकी से क्यों बढ़ी चिंता?
यमन के हूती विद्रोहियों ने हाल ही में लाल सागर में सऊदी झंडे वाले तेल टैंकरों को निशाना बनाया और बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट में नौसैनिक नाकेबंदी की चेतावनी दी।
यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों में शामिल है। यदि यहां लगातार हमले होते हैं तो:
- तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होगी।
- शिपिंग बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी।
- वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव आएगा।
- एशियाई देशों को तेल मिलने में देरी हो सकती है।
बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है।
यह समुद्री मार्ग:
- केवल लगभग 14 नॉटिकल मील चौड़ा है।
- यूरोप और एशिया के बीच तेल एवं व्यापारिक जहाजों के लिए प्रमुख रास्ता है।
- प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चा तेल इसी मार्ग से गुजरता है।
इसी वजह से इसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सबसे संवेदनशील समुद्री चोकपॉइंट्स में गिना जाता है।
सऊदी अरब के पास क्या हैं विकल्प?
यदि बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर खतरा बढ़ता है तो सऊदी अरब कई वैकल्पिक रास्तों पर विचार कर सकता है।
1. मिस्र की SUMED पाइपलाइन
सुमेड पाइपलाइन लाल सागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है।
- लंबाई लगभग 320 किलोमीटर
- क्षमता करीब 25 लाख बैरल प्रतिदिन
- बड़े टैंकरों के लिए आंशिक समाधान
हालांकि इसकी क्षमता सऊदी अरब के मौजूदा निर्यात को पूरी तरह संभालने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जाती।
2. इजरायल की इलात-अश्केलॉन पाइपलाइन
यह पाइपलाइन लाल सागर और भूमध्य सागर को जोड़ती है।
हालांकि:
- यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील विकल्प है।
- सऊदी अरब और इजरायल के औपचारिक संबंध नहीं हैं।
- जरूरत पड़ने पर गुप्त स्तर पर इसका इस्तेमाल संभव माना जा रहा है।
सबसे बड़ी चुनौती VLCC टैंकर
सऊदी अरब का अधिकांश तेल Very Large Crude Carrier (VLCC) जहाजों से भेजा जाता है।
इनकी क्षमता लगभग:
- 20 लाख बैरल कच्चा तेल
लेकिन पूरी तरह लोड होने पर ये स्वेज नहर से नहीं गुजर सकते।
ऐसे में:
- कुछ तेल पाइपलाइन से भेजना होगा।
- बाकी कार्गो दोबारा दूसरे टैंकरों में लोड करना होगा।
- इससे समय और लागत दोनों बढ़ेंगे।
तेल की कीमतों पर क्या होगा असर?
यदि बाब-अल-मंदेब में संकट लंबा चलता है तो:
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आ सकती है।
- शिपिंग लागत बढ़ेगी।
- बीमा प्रीमियम महंगा होगा।
- रिफाइनरियों की लागत बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सप्लाई बाधित होने पर तेल फिर 100 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर के स्तर पर टिक सकता है।
भारत पर कितना पड़ेगा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है।
सऊदी अरब:
- भारत का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर है।
- प्रतिदिन लगभग 5.5 से 7 लाख बैरल कच्चा तेल भारत भेजता है।
- भारत के कुल तेल आयात में इसकी हिस्सेदारी करीब 14% से 16% रहती है।
यदि सऊदी सप्लाई प्रभावित होती है तो:
- भारत का आयात बिल बढ़ सकता है।
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव आ सकता है।
- महंगाई बढ़ने का जोखिम रहेगा।
- रिफाइनरियों को वैकल्पिक स्रोतों से महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है।
किन देशों पर सबसे ज्यादा असर होगा?
सऊदी अरब के यानबू बंदरगाह से बड़ी मात्रा में तेल खरीदने वाले देशों में शामिल हैं:
- भारत
- चीन
- जापान
- दक्षिण कोरिया
इन देशों की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक लाल सागर के सुरक्षित समुद्री मार्ग पर निर्भर करती है।
क्या पहले भी बंद हुआ है यह समुद्री रास्ता?
हूती विद्रोहियों ने 2023 से 2025 के बीच भी कई व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया था।
हालांकि उस समय:
- होर्मुज स्ट्रेट खुला था।
- सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन काम कर रही थी।
- वैश्विक तेल आपूर्ति पूरी तरह बाधित नहीं हुई।
लेकिन यदि अब होर्मुज और बाब-अल-मंदेब दोनों मार्गों पर खतरा बढ़ता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका असर कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।
निष्कर्ष
मध्य पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। सऊदी अरब की 40 साल पुरानी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन ने अब तक कई संकटों में तेल आपूर्ति को संभाला है, लेकिन बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर बढ़ते खतरे ने इस विकल्प को भी चुनौती दी है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी लंबी बाधा का सीधा असर तेल की कीमतों, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।


