Crude Oil Price: मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। इससे वैश्विक महंगाई (Inflation) के फिर से तेज होने का खतरा बढ़ गया है। ऐसे समय में अमेरिका के फेडरल रिजर्व (Fed), बैंक ऑफ इंग्लैंड (BoE), बैंक ऑफ जापान (BoJ) समेत दुनिया के कई बड़े केंद्रीय बैंक इस सप्ताह ब्याज दरों (Interest Rates) पर अहम फैसले लेने जा रहे हैं। निवेशकों की नजर अब सिर्फ ब्याज दरों पर नहीं, बल्कि केंद्रीय बैंकों के भविष्य के संकेतों पर भी टिकी हुई है क्योंकि इन फैसलों का असर शेयर बाजार, बॉन्ड मार्केट, मुद्रा बाजार और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
कच्चे तेल की तेजी ने बढ़ाई महंगाई की चिंता
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसका असर तेल की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। यदि कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल, परिवहन, बिजली उत्पादन और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ सकती है। इससे उपभोक्ताओं पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी केंद्रीय बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है क्योंकि पिछले कुछ महीनों से महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिशें अब फिर कमजोर पड़ सकती हैं।
फेडरल रिजर्व की बैठक पर टिकी दुनिया की नजर
इस सप्ताह सबसे अधिक फोकस अमेरिका के फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक पर रहेगा। फेड 29 जुलाई को ब्याज दरों पर अपना फैसला सुनाएगा।
हाल के महीनों में अमेरिका में महंगाई के आंकड़े उम्मीद से बेहतर आए थे, जिससे माना जा रहा था कि आगे ब्याज दरों में कटौती का रास्ता आसान हो सकता है। लेकिन तेल की कीमतों में तेजी और भू-राजनीतिक तनाव ने हालात बदल दिए हैं। अब बाजार को आशंका है कि फेड जरूरत पड़ने पर पहले से अधिक सख्त रुख अपना सकता है या फिर ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकता है।
केवल तेल ही नहीं, ये फैक्टर भी बढ़ा रहे हैं दबाव
महंगाई का खतरा सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में कई ऐसे कारक हैं जो आने वाले महीनों में कीमतों पर दबाव बना सकते हैं।
इनमें प्रमुख कारण हैं—
- प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतें
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश
- अमेरिका में संभावित नए आयात शुल्क (टैरिफ)
- वैश्विक सप्लाई चेन पर भू-राजनीतिक तनाव
इन सभी कारणों से निवेशकों को डर है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में जल्द राहत देने के बजाय सख्त नीति जारी रख सकते हैं।
बॉन्ड मार्केट में बढ़ी हलचल
महंगाई की बढ़ती आशंकाओं का असर वैश्विक बॉन्ड बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। जी-7 देशों के सरकारी बॉन्ड की यील्ड लगातार बढ़ रही है।
अमेरिका के 30 वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड भी कई वर्षों के उच्च स्तर के करीब पहुंच गई है। आमतौर पर बॉन्ड यील्ड में तेजी इस बात का संकेत होती है कि निवेशक भविष्य में ऊंची ब्याज दरों और महंगाई की संभावना को गंभीरता से ले रहे हैं।
यूरोप में भी आएंगे अहम आर्थिक आंकड़े
यूरो जोन में इस सप्ताह दूसरी तिमाही (Q2) की जीडीपी और जुलाई महीने की शुरुआती महंगाई के आंकड़े जारी किए जाएंगे।
विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यूरोपीय अर्थव्यवस्था में हल्की रिकवरी देखने को मिल सकती है, लेकिन महंगाई भी बढ़ सकती है। यूरोपियन सेंट्रल बैंक पहले ही संकेत दे चुका है कि यदि महंगाई नियंत्रण में नहीं आती है तो भविष्य में फिर से सख्त मौद्रिक नीति अपनाई जा सकती है।
एशियाई देशों पर भी रहेगी निवेशकों की नजर
एशिया में भी यह सप्ताह आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण रहेगा।
जापान में बैंक ऑफ जापान अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा। इसके अलावा टोक्यो की महंगाई, इंडस्ट्रियल आउटपुट, रिटेल सेल्स और रोजगार से जुड़े आंकड़े भी जारी होंगे।
ऑस्ट्रेलिया में उपभोक्ता महंगाई (Consumer Inflation) के आंकड़े आएंगे, जबकि सिंगापुर और पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक भी ब्याज दरों पर फैसला सुनाएंगे।
इसके अलावा दक्षिण कोरिया, हांगकांग, फिलीपींस और थाईलैंड के व्यापार (Trade) से जुड़े आंकड़े भी जारी होंगे। खासतौर पर दक्षिण कोरिया के निर्यात आंकड़ों पर बाजार की खास नजर रहेगी क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी वैश्विक मांग के कारण वहां का एक्सपोर्ट लगातार मजबूत बना हुआ है।
लैटिन अमेरिका में भी होंगे बड़े फैसले
लैटिन अमेरिकी देशों में भी इस सप्ताह कई अहम आर्थिक घटनाक्रम देखने को मिलेंगे।
चिली, कोलंबिया समेत कई देशों के केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर निर्णय लेंगे। वहीं ब्राजील में नए महंगाई के आंकड़े जारी होंगे और मेक्सिको अपनी दूसरी तिमाही की जीडीपी का शुरुआती अनुमान पेश करेगा।
इन आंकड़ों से यह संकेत मिलेगा कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन कैसे बना रही हैं।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भारत जैसे तेल आयातक देशों पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। इससे पेट्रोल-डीजल, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और कई जरूरी वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। साथ ही, यदि वैश्विक केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखते हैं तो विदेशी निवेश, रुपये की चाल और भारतीय शेयर बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपने घरेलू महंगाई और आर्थिक विकास के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए आगे की मौद्रिक नीति तय करेगा।


