RBI Repo Rate Hike: आने वाले महीनों में होम लोन, कार लोन और अन्य कर्ज लेने वालों को झटका लग सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में रेपो रेट बढ़ाने पर विचार कर सकता है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (UBI) के अनुमान के मुताबिक, रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की दो से तीन बढ़ोतरी हो सकती है। इससे मौजूदा 5.25 फीसदी की दर बढ़कर 5.75-6 फीसदी तक पहुंच सकती है।
रेट बढ़ाने की यह संभावना ऐसे समय में जताई गई है जब देश की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, जबकि बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी भी काफी बढ़ गई है। इसके अलावा महंगाई और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां भी RBI के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं।
दिसंबर से शुरू हो सकती है रेपो रेट बढ़ोतरी
UBI की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में RBI एक बार फिर ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर विचार कर सकता है। रिपोर्ट में दिसंबर 2026 को रेट बढ़ाने की शुरुआत के लिए सबसे संभावित समय बताया गया है।
बैंक का अनुमान है कि RBI एक बार में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है। ऐसी दो से तीन बढ़ोतरी होने पर रेपो रेट 5.25 फीसदी से बढ़कर 5.75-6 फीसदी के दायरे में पहुंच सकता है।
UBI ने यह अनुमान मजबूत आर्थिक विकास, महंगाई के संभावित दबाव और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने के असर को ध्यान में रखते हुए दिया है।
विदेशी मुद्रा की भारी आवक से बढ़ी लिक्विडिटी
RBI के सामने इस समय बैंकिंग सिस्टम में बढ़ती लिक्विडिटी को मैनेज करना भी बड़ी चुनौती बन रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, 31 अगस्त तक RBI की स्पेशल स्वैप सुविधा के तहत विदेशी मुद्रा का इनफ्लो करीब 136 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
इसमें लगभग 127.23 अरब डॉलर FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए आए। इसके अलावा विदेशी मुद्रा में लिए गए कर्ज और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग के जरिए भी पैसा आया।
विदेशी मुद्रा की इस भारी आवक का सीधा असर बैंकिंग सिस्टम की रुपये वाली लिक्विडिटी पर पड़ा है।
4.82 लाख करोड़ से बढ़कर 8.05 लाख करोड़ हुई कोर लिक्विडिटी
UBI की रिपोर्ट के अनुसार, बैंकिंग सिस्टम की कोर लिक्विडिटी जून के मध्य में करीब 4.82 लाख करोड़ रुपये थी। अगस्त के मध्य तक यह बढ़कर लगभग 8.05 लाख करोड़ रुपये हो गई।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगर मौजूदा स्थिति बनी रहती है तो 11 सितंबर तक यह आंकड़ा करीब 14.17 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
ऐसे में RBI के लिए अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करना मौद्रिक नीति की अहम चुनौती बन सकता है।
RBI अपना सकता है ये उपाय
UBI के मुताबिक, RBI अक्टूबर की पॉलिसी मीटिंग से पहले सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त लिक्विडिटी को कम करने के लिए कुछ कदम उठा सकता है। इनमें प्रमुख रूप से:
- शॉर्ट-टर्म VRRR ऑपरेशन
- लॉन्ग-टर्म VRRR ऑपरेशन
- Incremental Cash Reserve Ratio (I-CRR)
- सरकारी बॉन्ड की बिक्री
- विदेशी मुद्रा स्वैप
जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।
बैंक का अनुमान है कि RBI शुरुआत में ऐसे अस्थायी उपायों को प्राथमिकता दे सकता है जिन्हें जरूरत पड़ने पर बाद में वापस लिया जा सके। खासतौर पर वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में अगर क्रेडिट की मांग बढ़ती है तो RBI इन उपायों को वापस लेकर सिस्टम में लिक्विडिटी फिर बढ़ा सकता है।
50:50 के मिक्स से लिक्विडिटी सोख सकता है RBI
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के लिए RBI शॉर्ट-टर्म VRRR और लंबे समय के उपायों का करीब 50:50 मिक्स अपना सकता है।
इसका उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा रुपये की उपलब्धता को नियंत्रित करना होगा, ताकि महंगाई और वित्तीय स्थिरता से जुड़े जोखिमों को मैनेज किया जा सके।
अक्टूबर में भी बढ़ सकता है रेपो रेट
UBI ने एक और संभावित स्थिति का जिक्र किया है। अगर अमेरिकी फेडरल रिजर्व सितंबर में ब्याज दर बढ़ाता है और RBI इससे पहले टिकाऊ उपायों के जरिए अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करता है, तो अक्टूबर में भी रेपो रेट बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, ब्याज दरों को लेकर RBI का अंतिम फैसला महंगाई, आर्थिक विकास, रुपये की स्थिति और वैश्विक बाजारों समेत कई परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
90 डॉलर के पार कच्चा तेल बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव
कच्चे तेल की कीमत भी RBI की चिंता बढ़ा सकती है। UBI के अनुसार, अगर तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाती है तो भारत में महंगाई और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर रुपये तथा घरेलू महंगाई पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, अगर भू-राजनीतिक तनाव कम होता है तो RBI को मौद्रिक नीति के मोर्चे पर ज्यादा लचीलापन मिल सकता है।
लोन लेने वालों पर क्या होगा असर?
अगर RBI वास्तव में रेपो रेट बढ़ाता है तो इसका असर बैंकों की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। खासतौर पर रेपो रेट से जुड़े फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन और अन्य कर्ज की EMI बढ़ने की संभावना रहती है।
हालांकि, RBI की ओर से अभी ऐसी कोई अंतिम घोषणा नहीं की गई है कि रेपो रेट निश्चित रूप से 6 फीसदी तक बढ़ाया जाएगा। 5.75-6 फीसदी का अनुमान UBI की रिपोर्ट में जताया गया है। इसलिए इसे अभी संभावित परिदृश्य के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष
RBI के सामने आने वाले महीनों में आर्थिक विकास को बनाए रखने के साथ-साथ महंगाई और बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त लिक्विडिटी को नियंत्रित करने की चुनौती होगी। UBI के अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की दो से तीन बढ़ोतरी हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो रेपो रेट 5.75-6 फीसदी तक पहुंच सकता है और इसका असर बैंक लोन की ब्याज दरों तथा EMI पर देखने को मिल सकता है।


