Ratan Tata Will: रतन टाटा के निधन के करीब दो साल बाद भी उनकी कुछ शेयर होल्डिंग का ट्रांसफर अटका हुआ है। उनकी वसीयत में इन शेयरों का बड़ा हिस्सा दो चैरिटेबल संस्थाओं को देने की बात कही गई थी, लेकिन 1989 के एक पुराने शेयर ट्रांसफर मामले से जुड़ी शर्त अब इस विरासत के रास्ते में कानूनी पेच पैदा कर रही है।
दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा का अक्टूबर 2024 में निधन हो गया था। उनके निधन के बाद उनकी वसीयत के मुताबिक संपत्ति के बंटवारे की प्रक्रिया शुरू हुई। हालांकि, टाटा संस के उन शेयरों को लेकर मामला अभी तक पूरी तरह साफ नहीं हो पाया है, जो रतन टाटा को विरासत में मिले थे।
रतन टाटा ने अपनी वसीयत में इन शेयरों को रतन टाटा एंडोमेंट फंड (RTEF) और रतन टाटा एंडोमेंट ट्रस्ट (RTET) को देने की इच्छा जताई थी। इन दोनों चैरिटेबल संस्थाओं की स्थापना भी रतन टाटा ने ही की थी। लेकिन अब करीब 37 साल पुराने एक शेयर ट्रांसफर मामले में सामने आई शर्त ने इस ट्रांसफर को मुश्किल बना दिया है।
1989 के शेयर ट्रांसफर से जुड़ी क्या है शर्त?
महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने 1989 में नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट (NRTT) से नवल टाटा को 833 टाटा संस शेयर ट्रांसफर किए जाने के फैसले को सही माना है। इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि मूल ट्रांसफर से जुड़ी एक ऐसी शर्त भी सामने आई है, जिसका असर अब रतन टाटा की वसीयत पर पड़ सकता है।
इस शर्त के मुताबिक, इन शेयरों को आगे केवल शेयरधारक के रिश्तेदारों को ही ट्रांसफर किया जा सकता है। यानी शेयर किसी बाहरी या थर्ड पार्टी को देने पर रोक है।
यही शर्त अब रतन टाटा की वसीयत में किए गए शेयरों के बंटवारे के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरी है।
नवल टाटा ने अपने परिवार में कैसे बांटे थे शेयर?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवल टाटा ने 1989 में ट्रांसफर हुए इन शेयरों को अपनी पत्नी सिमोन टाटा और तीन बेटों—रतन टाटा, जिमी टाटा और नोएल टाटा—के बीच बांटा था।
इसके बाद सिमोन टाटा ने अपने शेयर अपने बेटे नोएल टाटा और उनके तीन बच्चों को दे दिए। वहीं जिमी टाटा और नोएल टाटा के पास भी उनके शेयर मौजूद हैं।
इस पूरी शेयर चेन की वजह से 1989 में तय की गई ट्रांसफर शर्त आज भी महत्वपूर्ण हो गई है।
रतन टाटा की वसीयत में क्या लिखा है?
रतन टाटा की वसीयत के मुताबिक, उनकी संबंधित शेयर होल्डिंग का 70% हिस्सा रतन टाटा एंडोमेंट फंड (RTEF) और बाकी 30% हिस्सा रतन टाटा एंडोमेंट ट्रस्ट (RTET) को जाना है।
समस्या यह है कि दोनों संस्थाएं रतन टाटा के रिश्तेदार नहीं बल्कि अलग चैरिटेबल संस्थाएं हैं। ऐसे में यदि 1989 की शर्त इन शेयरों पर लागू होती है, तो RTEF और RTET को सीधे शेयर ट्रांसफर करने पर कानूनी सवाल खड़ा हो सकता है।
रतन टाटा की संपत्ति का प्रबंधन फिलहाल उनकी वसीयत में नियुक्त एग्जीक्यूटर्स कर रहे हैं। इनमें उनकी सौतेली बहनें शिरीन और डियाना जीजीभॉय भी शामिल हैं।
चैरिटी कमिश्नर के आदेश में क्या कहा गया?
महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर अमोघ कलोती के हालिया आदेश में 1989 के शेयर ट्रांसफर से जुड़े मामले की जांच को बंद कर दिया गया है। हालांकि, आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि रतन टाटा की वसीयत के तहत शेयर चैरिटेबल संस्थाओं को देना मूल ट्रांसफर की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो NRTT के ट्रस्टी उचित कानूनी कदम उठाने के लिए स्वतंत्र होंगे।
NRTT के ट्रस्टियों में नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, विजय सिंह और जेएन मिस्त्री शामिल हैं। वहीं RTET के ट्रस्टियों में नोएल टाटा, शिरीन और डियाना शामिल हैं।
इस स्थिति में अब आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।
क्या बॉम्बे हाई कोर्ट से मांगा जा सकता है स्पष्टीकरण?
सूत्रों के अनुसार, इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगे जाने की संभावना है। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि रतन टाटा की वसीयत के मुताबिक RTEF और RTET को इन शेयरों का ट्रांसफर किस तरीके से किया जा सकता है।
मामले से जुड़े एक सूत्र का तर्क है कि चैरिटी कमिश्नर के पास किसी परिवार के सदस्य को शेयर ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करने या किसी व्यक्ति की निजी वसीयत में बदलाव कराने का अधिकार नहीं है।
यानी अब मुख्य सवाल यह है कि रतन टाटा की अंतिम इच्छा और 1989 में शेयर ट्रांसफर के समय लगाई गई शर्त में टकराव की स्थिति में कानूनी तौर पर किस व्यवस्था को प्राथमिकता मिलेगी।
शेयरों को ट्रांसफर करने का दूसरा रास्ता क्या हो सकता है?
इस मामले में एक संभावित विकल्प यह बताया जा रहा है कि नवल टाटा के परिवार के सदस्य इन शेयरों को खरीद सकते हैं। इसके बाद शेयरों की बिक्री से मिलने वाली रकम को रतन टाटा की इच्छा के मुताबिक दोनों चैरिटेबल संस्थाओं तक पहुंचाया जा सकता है।
हालांकि, इसके लिए एक और अहम प्रक्रिया पूरी करनी होगी—टाटा संस का उचित वैल्यूएशन।
शेयरों का लेन-देन केवल बुक वैल्यू के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए शेयरों की उचित यानी फेयर वैल्यू तय करना जरूरी होगा।
क्यों महत्वपूर्ण हैं टाटा संस के ये शेयर?
टाटा संस, टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी है। कंपनी के शेयर आम तौर पर व्यापक रूप से बाजार में उपलब्ध नहीं होते और इसकी शेयरहोल्डिंग बेहद सीमित एवं रणनीतिक मानी जाती है।
इसी वजह से रतन टाटा की विरासत में मिले टाटा संस के शेयरों का ट्रांसफर सिर्फ पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे का मामला नहीं है। इसका संबंध टाटा ग्रुप की चैरिटेबल संस्थाओं और ग्रुप की होल्डिंग संरचना से भी जुड़ा हुआ है।
फिलहाल रतन टाटा की वसीयत में तय किए गए 70:30 के अनुपात में RTEF और RTET को शेयर ट्रांसफर करने का रास्ता 1989 की शर्त के कारण अटका हुआ है। आने वाले समय में अदालत से मिलने वाला स्पष्टीकरण यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है कि इन शेयरों का अंतिम ट्रांसफर किस तरह होगा।


