Highlights
- देशभर में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की सप्लाई सामान्य बनी हुई है।
- प्राइवेट कंपनियों के महंगे ईंधन से ग्राहक सरकारी पंपों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं।
- फसल कटाई और रूसी कच्चे तेल की बढ़ती खरीद भी चर्चा में।
नई दिल्ली। देश में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की सप्लाई को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक देशभर में ईंधन की उपलब्धता सामान्य बनी हुई है और किसी तरह की कमी नहीं है। हालांकि, कई इलाकों में कुछ पेट्रोल पंपों पर अचानक मांग बढ़ने के कारण सीमित मात्रा में ईंधन देने जैसी स्थिति देखने को मिली है। सरकार का कहना है कि ऐसे पंपों पर प्रतिबंध हटाने और सप्लाई सामान्य करने के लिए लगातार काम किया जा रहा है।
दरअसल, हाल के दिनों में सरकारी तेल कंपनियों के पेट्रोल पंपों पर ग्राहकों की भीड़ तेजी से बढ़ी है। इसकी सबसे बड़ी वजह प्राइवेट कंपनियों की ओर से पेट्रोल-डीजल की ऊंची कीमतें बताई जा रही हैं। लोग अब सस्ता ईंधन खरीदने के लिए इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसे सरकारी पंपों का रुख कर रहे हैं।
क्यों बढ़ रही है पेट्रोल-डीजल की मांग?
सरकारी सूत्रों ने ईंधन की मांग बढ़ने के पीछे तीन बड़े कारण बताए हैं।
1. फसल कटाई का मौसम
देश के कई राज्यों में इस समय फसल कटाई का काम चल रहा है। खेतों में हार्वेस्टर, ट्रैक्टर और अन्य कृषि मशीनों के इस्तेमाल से डीजल की मांग अचानक बढ़ गई है। ग्रामीण इलाकों में डीजल की खपत हर साल इस मौसम में बढ़ती है।
2. प्राइवेट कंपनियों का महंगा ईंधन
निजी पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल और डीजल की कीमतें सरकारी कंपनियों की तुलना में ज्यादा बताई जा रही हैं। कई जगहों पर यह अंतर 15 से 20 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है। यही वजह है कि ग्राहक सरकारी पंपों की ओर तेजी से शिफ्ट हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्राइवेट कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के हिसाब से कमर्शियल और संस्थागत ग्राहकों के लिए रेट तय करती हैं। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल में उतार-चढ़ाव का असर सीधे उनकी कीमतों पर दिख रहा है।
3. रूस से बढ़ रही कच्चे तेल की खरीद
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी है। सरकारी तेल कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) के डायरेक्टर फाइनेंस वीआरके गुप्ता ने बताया कि कंपनी के कुल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 41 प्रतिशत पहुंच गई है।
इससे पहले वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में यह हिस्सेदारी 31 प्रतिशत थी, जबकि तीसरी तिमाही में करीब 25 प्रतिशत रही थी। रूस से अधिक तेल खरीदने का मकसद सप्लाई को स्थिर रखना और लागत को नियंत्रित करना माना जा रहा है।
सरकारी पंपों पर क्यों बढ़ रही भीड़?
ऊंची कीमतों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता के बीच आम उपभोक्ता कम कीमत वाले विकल्प तलाश रहे हैं। सरकारी कंपनियां अभी भी कई शहरों में अपेक्षाकृत सस्ता ईंधन उपलब्ध करा रही हैं। यही कारण है कि इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल के पेट्रोल पंपों पर वाहनों की लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो निजी कंपनियों और सरकारी कंपनियों के दामों में अंतर और बढ़ सकता है। इसका असर आने वाले दिनों में ईंधन बाजार की प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है।
क्या आगे महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल?
मध्य पूर्व में तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव जैसे कारण आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, फिलहाल सरकार सप्लाई को सामान्य बनाए रखने और बाजार में घबराहट रोकने पर फोकस कर रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक रूस से लगातार कच्चे तेल की खरीद भारत के लिए राहत का काम कर सकती है, क्योंकि इससे आयात लागत को कुछ हद तक नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
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