देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर बड़ी चर्चा शुरू हो गई है। वैश्विक ऊर्जा संकट और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार जारी उतार-चढ़ाव के बीच भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में ईंधन की कीमतों में फिर बढ़ोतरी हो सकती है।
BPCL के HR डायरेक्टर राज कुमार दुबे ने साफ कहा कि अगर मौजूदा हालात लंबे समय तक बने रहे तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाना लगभग तय माना जा सकता है। उनके बयान ने आम लोगों से लेकर ट्रांसपोर्ट सेक्टर और उद्योग जगत तक की चिंता बढ़ा दी है।
आखिर क्यों बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
राज कुमार दुबे के मुताबिक वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार इस समय बेहद अस्थिर स्थिति में है। कई देशों में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्गों पर संकट ने पूरी दुनिया की तेल सप्लाई चेन को प्रभावित किया है।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 20% से 50% तक का उछाल देखा गया है। शुरुआत में इसे अस्थायी माना जा रहा था, लेकिन अब हालात लंबे समय तक बने रहने की आशंका बढ़ गई है। दुबे ने कहा कि तेल और गैस से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा है और उसकी मरम्मत में काफी समय लग सकता है। ऐसे में अगर यही स्थिति जारी रहती है तो तेल कंपनियों पर दबाव और बढ़ेगा।
सरकार और कंपनियों के सामने कौन-कौन से विकल्प?
BPCL अधिकारी ने नीति निर्माताओं के सामने तीन बड़े विकल्प बताए।
पहला विकल्प
पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी की जाए ताकि तेल कंपनियों का नुकसान कम हो सके।
दूसरा विकल्प
तेल कंपनियां घाटा खुद उठाती रहें। हालांकि इससे कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।
तीसरा विकल्प
सरकार तेल कंपनियों को सब्सिडी या आर्थिक सहायता देकर नुकसान की भरपाई करे। उन्होंने साफ कहा कि लंबे समय तक कीमतें स्थिर रखना आसान नहीं होगा, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता लगातार बनी हुई है।
कितनी बढ़ सकती हैं कीमतें?
राज कुमार दुबे ने किसी निश्चित बढ़ोतरी का आंकड़ा नहीं दिया, लेकिन संकेत जरूर दिए कि यदि वैश्विक संकट गहराता है तो कीमतों में और इजाफा देखने को मिल सकता है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहा तो भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में प्रति लीटर ₹2 से ₹5 तक की बढ़ोतरी संभव है। हालांकि अंतिम फैसला सरकार और तेल कंपनियों की रणनीति पर निर्भर करेगा।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट कितना बड़ा?
दुनिया की बड़ी मात्रा में तेल सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरती है। BPCL अधिकारी के मुताबिक यहां से 20 लाख बैरल से अधिक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए ऐसे संकट का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है। हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने सप्लाई सोर्सेज में बड़ा बदलाव किया है।
रूस और अफ्रीका से तेल खरीद बढ़ी
दुबे ने बताया कि भारत और BPCL ने सप्लाई सोर्सेज में काफी विविधता लाई है। पहले जहां केवल 20 सप्लाई सेंटर थे, अब उनकी संख्या बढ़ाकर 40 कर दी गई है।
भारत अब रूस, अफ्रीका, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया जैसे कई क्षेत्रों से तेल खरीद रहा है। इससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई है और सप्लाई सुरक्षा मजबूत हुई है।
संकट के बावजूद भारत में बढ़ी ईंधन खपत
दिलचस्प बात यह है कि वैश्विक संकट के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की मांग लगातार बढ़ रही है। BPCL अधिकारी ने कहा कि युद्ध और वैश्विक तनाव के बाद भी देश में ईंधन की कोई बड़ी कमी नहीं आई।
भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, बढ़ते वाहन और औद्योगिक गतिविधियां ईंधन की मांग को लगातार ऊपर ले जा रही हैं।
ग्रीन एनर्जी पर तेजी से बढ़ रहा फोकस
राज कुमार दुबे ने कहा कि मौजूदा संकट भारत को ग्रीन एनर्जी की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर रहा है।
उन्होंने बताया कि देश में 200 GW से अधिक सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित हो चुकी है। नेचुरल गैस की हिस्सेदारी बढ़ाने पर काम हो रहा है। CBG यानी कम्प्रेस्ड बायोगैस को बढ़ावा दिया जा रहा है। हाइड्रोजन फ्यूल पर भी तेजी से काम हो रहा है।
उनके मुताबिक तेल आयात पर भारी खर्च विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है, इसलिए भारत अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
इथेनॉल मिश्रण पर क्या बोले BPCL अधिकारी?
दुबे ने 20% इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को भारत के लिए बेहद अहम कदम बताया। उन्होंने कहा कि अगर इथेनॉल ब्लेंडिंग नहीं होती तो भारत को 20% ज्यादा पेट्रोल आयात करना पड़ सकता था।
इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता, तेल आयात बिल बढ़ता, वैश्विक संकट का असर और ज्यादा होता सरकार लंबे समय से पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। इसका मकसद तेल आयात कम करना और किसानों को भी फायदा पहुंचाना है।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
अगर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में फिर बढ़ोतरी होती है तो इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।
किन चीजों पर बढ़ सकता है असर?
ट्रांसपोर्ट खर्च, सब्जी और फल की कीमतें, ऑनलाइन डिलीवरी, बस और कैब किराया, एयरलाइन टिकट, लॉजिस्टिक्स लागत, महंगाई दर भारत जैसे देश में जहां ज्यादातर माल ढुलाई सड़क मार्ग से होती है, वहां ईंधन की कीमतें बढ़ने का असर लगभग हर सेक्टर पर पड़ता है।
क्या सरकार टैक्स कम कर सकती है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है तो सरकार एक्साइज ड्यूटी या वैट में कुछ राहत देने पर विचार कर सकती है। हालांकि इससे सरकारी राजस्व पर असर पड़ सकता है। केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बड़ा हिस्सा रखते हैं। ऐसे में टैक्स कटौती आम लोगों को राहत देने का एक विकल्प हो सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती तेल सप्लाई को स्थिर बनाए रखना और बढ़ती लागत को नियंत्रित करना है। BPCL अधिकारी के बयान ने साफ कर दिया है कि अगर वैश्विक हालात नहीं सुधरे तो आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में एक और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
साथ ही यह भी साफ है कि भारत अब इथेनॉल, ग्रीन एनर्जी, सोलर, CBG, और हाइड्रोजन जैसे विकल्पों की तरफ पहले से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।
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