नई दिल्ली: वैश्विक बाजार से भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता के लिए एक बेहद सकारात्मक खबर आई है। OPEC+ (ओपेक प्लस) देशों ने अगस्त महीने से अपने कच्चे तेल (Crude Oil) के उत्पादन को बढ़ाने का फैसला किया है। रूस और ईरान समेत ओपेक प्लस के 22 देश इस शुरुआती समझौते पर राजी हो गए हैं। इस कदम से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ेगी, जिसका सीधा और बड़ा फायदा भारत को मिलने वाला है।
भारत पर क्या होगा सीधा असर?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% से 88% कच्चा तेल आयात (Import) करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ने और कीमतें गिरने का भारत पर बहुआयामी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा:
- आयात बिल में भारी कमी: तेल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर पर आने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा और आयात बिल काफी घट जाएगा।
- आर्थिक दबाव से राहत: देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) और राजकोषीय घाटे में कमी आएगी, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
- मजबूत होता रुपया: डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की स्थिति में सुधार देखने को मिल सकता है।
- महंगाई पर लगाम: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में स्थिरता या गिरावट आएगी, जिससे सीधे तौर पर महंगाई को नियंत्रित किया जा सकेगा।
क्या है OPEC+ का पूरा प्लान?
प्रतिनिधियों से मिली जानकारी के मुताबिक, रविवार को हुई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में इस योजना को मंजूरी दी गई है।
- 1.88 लाख बैरल की बढ़ोतरी: सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व वाले 7 प्रमुख देश अगस्त से रोजाना 1,88,000 बैरल प्रति दिन (bpd) अतिरिक्त तेल का उत्पादन करेंगे।
- कटौती को धीरे-धीरे खत्म करना: यह कदम ओपेक प्लस समूह की उस योजना का हिस्सा है, जिसके तहत कुछ साल पहले लगाई गई उत्पादन कटौती को अब चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है।
- ग्लोबल मांग का 1% बहाल: युद्ध शुरू होने के बाद से कोटे में कुल 9,40,000 बैरल प्रति दिन की बढ़ोतरी की जा चुकी है, जो वैश्विक मांग का लगभग 1% है।
होर्मुज स्ट्रेट और शांति समझौते का असर
अब तक उत्पादन में यह बढ़ोतरी सिर्फ कागजों पर ही दिख रही थी क्योंकि युद्ध के चलते होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) बंद हो गया था। इससे फारस की खाड़ी के देशों के लिए तेल का निर्यात बढ़ाना लगभग असंभव हो गया था।
बदला हुआ समीकरण: तेहरान (ईरान) और वॉशिंगटन (अमेरिका) के बीच अंतरिम शांति समझौते के बाद सऊदी अरब और उसके पड़ोसी देशों ने शिपमेंट फिर से शुरू कर दिया है। इसके चलते एशियाई बाजारों में तेल की उपलब्धता बढ़ी है और युद्ध के समय कीमतों में आई रिकॉर्ड तेजी अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है। अब तेल उत्पादक देशों के बीच ग्राहकों को लुभाने के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।
ओपेक के सामने अपनी एकता बचाने की चुनौती
भले ही उत्पादन बढ़ाने पर सहमति बन गई है, लेकिन संगठन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। OPEC इस समय अपनी आंतरिक एकता को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है:
- UAE का बाहर होना: इसी साल मई में आंतरिक मतभेदों और शिकायतों के चलते संयुक्त अरब अमीरात (UAE) समूह से बाहर हो गया था।
- इराक की चेतावनी: पिछले महीने ओपेक के संस्थापक सदस्य इराक ने भी संकेत दिए थे कि यदि उसे उत्पादन की ऊंची सीमा (Quota) नहीं मिली, तो वह भी इस ग्रुप से बाहर निकल सकता है।
आगे की राह (तीसरा चरण)
ब्लूमबर्ग और टैंकर-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, सऊदी अरब और यूएई का निर्यात युद्ध-पूर्व स्तर के करीब पहुंच गया है। अगस्त में होने वाली यह बढ़ोतरी साल 2023 में रोके गए उत्पादन को बहाल करने का दूसरा-आखिरी चरण है। सितंबर में एक और बढ़ोतरी के साथ यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। हालांकि, तीसरे और अंतिम चरण का केवल कुछ ही हिस्सा हकीकत बन पाएगा, क्योंकि कई सदस्य देश अपनी भौतिक क्षमता की सीमाओं के कारण तय सीमा के मुताबिक तेल पंप करने में असमर्थ हैं।


