OPEC+ Meeting: रूस समेत ओपेक+ समूह के 21 सदस्य देश तेल उत्पादन को लेकर रविवार को अहम बैठक करने जा रहे हैं। इस बैठक में अक्टूबर के लिए कच्चे तेल के उत्पादन की नीति पर चर्चा होगी। दुनियाभर के तेल बाजार के साथ-साथ भारत की भी इस बैठक पर खास नजर है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में ओपेक+ की ओर से अक्टूबर के लिए मौजूदा तेल उत्पादन नीति में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है। हालांकि, आगे उत्पादन बढ़ाने या मौजूदा कटौती को खत्म करने की दिशा में कदम उठाने से पहले सदस्य देशों के बीच नए उत्पादन कोटा को लेकर सहमति बनाना जरूरी होगा।
होर्मुज संकट के बीच हो रही अहम बैठक
ओपेक+ की यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया में तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है। दुनिया के लिए यह समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में बाजार पर ओपेक+ के उत्पादन फैसलों का असर पहले की तुलना में कुछ सीमित हुआ है।
OPEC+ ने पहले क्या फैसला लिया था?
ओपेक+ ने अगस्त में सितंबर के लिए तेल उत्पादन बढ़ाने पर सहमति जताई थी। इसके साथ ही 2023 में घोषित करीब 16.5 लाख बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त उत्पादन कटौती को चरणबद्ध तरीके से वापस लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
उत्पादन बढ़ाने के फैसले के बावजूद ओपेक और उसके सहयोगी देश, जिनमें रूस भी शामिल है, युद्ध और अन्य बाजार परिस्थितियों के कारण अपने निर्धारित उत्पादन लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं।
यानी कागज पर उत्पादन बढ़ाने का फैसला होने के बावजूद वास्तविक सप्लाई में उतनी तेजी नहीं आई है, जितनी बाजार को उम्मीद थी।
अभी भी लागू है उत्पादन कटौती का एक और दौर
OPEC+ के कई सदस्य अभी भी एक अलग उत्पादन कटौती व्यवस्था का पालन कर रहे हैं। यह कटौती 2026 के अंत तक लागू रहने की योजना है।
अब समूह के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में इस कटौती को किस गति से खत्म किया जाए और अतिरिक्त तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में किस तरह वापस लाया जाए।
इसके लिए सबसे पहले सदस्य देशों की वास्तविक उत्पादन क्षमता का आकलन करना होगा। इसी समीक्षा के आधार पर 2027 के लिए नई उत्पादन बेसलाइन तय की जा सकती है। यही बेसलाइन आगे चलकर अलग-अलग देशों के तेल उत्पादन कोटा का आधार बनेगी।
रॉयटर्स के मुताबिक, इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा 2026 के अंत में होने की संभावना है। ऐसे में OPEC+ के लिए साल की चौथी तिमाही में उत्पादन बढ़ाने की योजना को आगे बढ़ाने के बजाय फिलहाल रोकने की संभावना भी जताई जा रही है।
भारत की OPEC+ बैठक पर क्यों है नजर?
भारत के लिए OPEC+ का हर उत्पादन फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
अगर OPEC+ उत्पादन में कटौती बनाए रखता है और वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई अपेक्षाकृत सीमित रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बना रह सकता है।
इसका असर भारत के ऑयल इंपोर्ट बिल पर पड़ेगा। महंगा कच्चा तेल खरीदने के लिए देश को ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी होगी।
बढ़ सकता है व्यापार घाटे पर दबाव
कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहने पर भारत के आयात खर्च में बढ़ोतरी हो सकती है। इससे व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ने के साथ-साथ चालू खाता घाटा यानी Current Account Deficit (CAD) भी प्रभावित हो सकता है।
इसके अलावा महंगा कच्चा तेल केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित असर नहीं डालता। परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से कई दूसरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी दबाव आ सकता है।
यही वजह है कि भारत के लिए OPEC+ की उत्पादन नीति और वैश्विक तेल बाजार की दिशा बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत के लिए रूस समेत गैर-OPEC देशों की भूमिका बढ़ेगी
अगर OPEC+ उत्पादन बढ़ाने से फिलहाल पीछे रहता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत को अपनी सप्लाई के स्रोतों में विविधता लाने पर ज्यादा जोर देना पड़ सकता है।
रूस से मिलने वाला कच्चा तेल और गैर-OPEC देशों से होने वाली आपूर्ति ऐसे समय में भारत के लिए अहम हो सकती है। इससे किसी एक समूह या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
साथ ही, भारत के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत और रिफाइनिंग क्षमता भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
आगे क्या होगा?
OPEC+ की आगामी बैठक में अगर उत्पादन नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता है, तो तेल बाजार के लिए आगे की दिशा सदस्य देशों के नए उत्पादन कोटा और 2027 की बेसलाइन पर होने वाली चर्चा से तय हो सकती है।
फिलहाल बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि समूह उत्पादन कटौती को कितनी तेजी से समाप्त करता है और वैश्विक मांग के मुकाबले कितनी अतिरिक्त तेल आपूर्ति बाजार में आती है।
भारत के लिहाज से कच्चे तेल की कीमतें जितनी स्थिर और नियंत्रित रहेंगी, उतना ही आयात बिल, महंगाई और बाहरी क्षेत्र पर दबाव कम रखने में मदद मिलेगी।


