Market Outlook: भारतीय शेयर बाजार के लिए नया सप्ताह कई अहम घटनाक्रमों से भरा रहने वाला है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमेरिका के महंगाई आंकड़े और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इसके साथ ही रुपये की चाल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और वैश्विक बाजारों के रुख पर भी निवेशकों की नजर रहेगी।
बीते सप्ताह भारतीय बाजार में दबाव देखने को मिला। सेंसेक्स 749.08 अंक यानी 0.96 फीसदी गिरकर बंद हुआ, जबकि निफ्टी में 277.95 अंक यानी 1.14 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार, 4 सितंबर को बाजार में कुछ रिकवरी देखने को मिली। सेंसेक्स 362.57 अंक की बढ़त के साथ 76,515.43 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 24.25 अंक चढ़कर 23,897.70 पर पहुंच गया।
पश्चिम एशिया का तनाव बाजार के लिए अहम फैक्टर
इस सप्ताह निवेशकों की सबसे बड़ी नजर पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव पर रहेगी। क्षेत्र में तनाव बढ़ने की स्थिति में कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ सकती है, जिसका असर वैश्विक बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है।
रेलिगेयर ब्रोकिंग लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (रिसर्च) अजीत मिश्रा के मुताबिक, भारतीय बाजार इस सप्ताह वैश्विक मौद्रिक नीति, कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर संवेदनशील रह सकता है।
अमेरिका के हालिया रोजगार आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहे हैं। ऐसे में अब निवेशकों की नजर सितंबर में होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक पर है। रोजगार और महंगाई से जुड़े आंकड़े फेड के अगले कदम को लेकर बाजार की उम्मीदों को प्रभावित कर सकते हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल चिंता बढ़ा सकता है
भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतें हमेशा एक महत्वपूर्ण बाजार संकेतक रही हैं। पिछले सप्ताह ब्रेंट क्रूड की कीमत में 8 फीसदी से अधिक, जबकि WTI क्रूड में 9 फीसदी से ज्यादा की तेजी देखने को मिली।
एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर के अनुसार, अमेरिका-ईरान तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ती चिंताओं ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में जोखिम बढ़ाया है।
अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तथा तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इसका असर भारत के आयात बिल, रुपये की विनिमय दर और महंगाई पर पड़ सकता है। कंपनियों की लागत बढ़ने से उनकी मुनाफा क्षमता पर भी दबाव आ सकता है।
इसलिए इस सप्ताह निवेशकों के लिए ब्रेंट क्रूड और WTI की कीमतों में हर बड़े उतार-चढ़ाव पर नजर रखना जरूरी होगा।
अमेरिका के महंगाई आंकड़ों से मिलेगी बाजार को दिशा
भारतीय शेयर बाजार के लिए अमेरिका से आने वाले महंगाई आंकड़े भी बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। इन आंकड़ों से यह संकेत मिल सकता है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व आने वाले समय में ब्याज दरों को लेकर किस दिशा में आगे बढ़ सकता है।
अगर महंगाई उम्मीद से कम रहती है, तो बाजार में ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद मजबूत हो सकती है। इसके विपरीत, महंगाई के आंकड़े अनुमान से ज्यादा रहने पर फेड की नीति को लेकर सख्त रुख की आशंका बढ़ सकती है।
अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों का असर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, डॉलर और वैश्विक इक्विटी बाजारों पर पड़ सकता है। इसका अप्रत्यक्ष असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिल सकता है।
FPI की बिकवाली फिर बनी चिंता
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI का रुख भी इस सप्ताह बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। लगातार दो महीने भारतीय शेयरों में खरीदारी करने के बाद विदेशी निवेशक सितंबर के पहले सप्ताह में फिर बिकवाल बन गए।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर के पहले सप्ताह में FPI ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 7,443 करोड़ रुपये की निकासी की।
इससे पहले विदेशी निवेशकों ने जुलाई में भारतीय शेयरों में करीब 20,200 करोड़ रुपये और अगस्त में लगभग 30,919 करोड़ रुपये का निवेश किया था। हालांकि, इससे पहले मार्च से जून तक लगातार चार महीने FPI की ओर से बिकवाली देखने को मिली थी।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और डॉलर की मजबूती विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार में जोखिम को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हो सकते हैं।
रुपये की चाल पर भी रहेगी नजर
कच्चे तेल की महंगाई और डॉलर की मजबूती का असर भारतीय रुपये पर भी पड़ सकता है। अगर डॉलर मजबूत होता है और तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है।
रुपये में कमजोरी का असर उन कंपनियों पर अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है जो आयात या निर्यात पर निर्भर हैं। वहीं, विदेशी निवेशकों के लिए मुद्रा जोखिम बढ़ने से भारतीय बाजार में निवेश का आकर्षण प्रभावित हो सकता है।
इसलिए इस सप्ताह डॉलर-रुपया विनिमय दर भी बाजार की दिशा समझने के लिए अहम संकेतक होगी।
घरेलू बाजार में नकदी और निवेशकों की धारणा अहम
वैश्विक संकेतों के अलावा घरेलू बाजार में नकदी की स्थिति भी बाजार के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है। अगर घरेलू संस्थागत निवेशक विदेशी बिकवाली की भरपाई करते हैं, तो बाजार में गिरावट सीमित रह सकती है।
वहीं, विदेशी और घरेलू दोनों संस्थागत निवेशकों की ओर से बिकवाली बढ़ने पर बाजार पर दबाव और गहरा सकता है।
इस सप्ताह इन फैक्टर्स पर रखें नजर
- पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े घटनाक्रम
- ब्रेंट और WTI क्रूड की कीमतें
- अमेरिका के महंगाई आंकड़े
- फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें
- अमेरिकी बॉन्ड यील्ड
- डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल
- FPI की खरीद-बिक्री
- घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां
- वैश्विक शेयर बाजारों का रुख
बाजार में रह सकती है उतार-चढ़ाव की स्थिति
कुल मिलाकर इस सप्ताह भारतीय शेयर बाजार में वोलैटिलिटी यानी उतार-चढ़ाव बढ़ा रह सकता है। एक तरफ अमेरिका की मौद्रिक नीति को लेकर उम्मीदें और घरेलू संस्थागत निवेश बाजार को सहारा दे सकते हैं, तो दूसरी तरफ महंगा कच्चा तेल, पश्चिम एशिया का तनाव, मजबूत डॉलर और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बाजार पर दबाव डाल सकते हैं।
ऐसे माहौल में निवेशकों को केवल एक संकेत के आधार पर फैसला लेने के बजाय वैश्विक और घरेलू दोनों कारकों पर नजर रखनी होगी। खासतौर पर कच्चे तेल, अमेरिकी महंगाई और FPI फ्लो में बड़ा बदलाव बाजार की दिशा को तेजी से प्रभावित कर सकता है।
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