महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के किसान मिथिलेश देसाई इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने हुए हैं। उन्हें ‘फणस किंग’ यानी ‘जैकफ्रूट किंग’ के नाम से जाना जाता है। इसकी वजह है कटहल की खेती को लेकर उनका लंबे समय से किया जा रहा प्रयोग, रिसर्च और किसानों को बाजार से जोड़ने की कोशिश। खास बात यह है कि मिथिलेश ने खेती को अपना करियर बनाने से पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और विदेश में नौकरी भी की थी।
हाल ही में दिल्ली में उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई। इस मुलाकात का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें एनसीपी नेता शरद पवार मिथिलेश देसाई का परिचय प्रधानमंत्री से कराते दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद पीएम मोदी उनसे कटहल की खेती और उनके काम के बारे में बातचीत करते नजर आए। वीडियो वायरल होने के साथ ही लोग यह जानने में दिलचस्पी ले रहे हैं कि आखिर मिथिलेश देसाई कौन हैं और उन्हें ‘जैकफ्रूट किंग’ क्यों कहा जाता है।
दिल्ली के एक रिसेप्शन में PM मोदी से हुई मुलाकात
I am sure 99% of who don't know who is the guy showing phone to PM Modi.
>His name is Mithilesh Desai
>He is “Jackfruit King of India”
>He uses blockchain in farming Jackfruit
>He cultivated 88+ jackfruit
>He supplied Jackfruit leaves Germany for cancer-related research
>He has… pic.twitter.com/i5xZs0LqMq
— Chota Don (@choga_don) August 10, 2026 मिथिलेश देसाई की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात दिल्ली में आयोजित एक रिसेप्शन के दौरान हुई। यह कार्यक्रम सांसद सुप्रिया सुले की बेटी रेवती सुले और सारंग लखानी के रिसेप्शन का था। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राहुल गांधी और सोनिया गांधी समेत कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियां मौजूद थीं।
इसी दौरान एनसीपी नेता शरद पवार ने रत्नागिरी के किसान मिथिलेश देसाई को प्रधानमंत्री मोदी से मिलवाया। बातचीत के दौरान मिथिलेश ने मोबाइल पर कुछ जानकारी दिखाते हुए पीएम मोदी को कटहल की खेती और उससे जुड़े अपने काम के बारे में बताया। वीडियो में प्रधानमंत्री उनकी बातों को ध्यान से सुनते दिखाई दे रहे हैं।
यह छोटा-सा संवाद सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और इसके साथ ही मिथिलेश देसाई की कहानी भी लोगों के बीच चर्चा में आ गई।
कौन हैं ‘फणस किंग’ मिथिलेश देसाई?
मिथिलेश देसाई महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के लांजा तालुका स्थित झोपडे गांव के रहने वाले हैं। उनका परिवार खेती से जुड़ा रहा है, लेकिन पढ़ाई के बाद उन्होंने पारंपरिक खेती से अलग करियर बनाने की कोशिश की।
मिथिलेश ने राहुरी कृषि विद्यापीठ से एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने UPSC की लिखित परीक्षा भी पास की, लेकिन इंटरव्यू में सफलता नहीं मिल सकी। इसके बाद उन्होंने नौकरी की तलाश जारी रखने के बजाय अपने गांव लौटने और खेती के क्षेत्र में कुछ नया करने का फैसला किया।
यहीं से कटहल के साथ उनका प्रयोग शुरू हुआ।
पिता ने 2010 में शुरू की थी कटहल की खेती
मिथिलेश के पिता ने साल 2010 में अपने खेत में कटहल की खेती शुरू की थी। गर्मियों के दौरान परिवार हाईवे के किनारे कटहल बेचता था। मिथिलेश ने जब इस काम को करीब से देखा तो उन्हें महसूस हुआ कि कटहल केवल स्थानीय स्तर पर बिकने वाला फल नहीं है, बल्कि इसमें बड़े कृषि कारोबार की संभावना भी मौजूद है।
उन्होंने कटहल की अलग-अलग किस्मों, उत्पादन और बाजार की संभावनाओं पर काम शुरू किया। साल 2014 में उन्होंने 36 अलग-अलग प्रजातियों के करीब 400 कटहल के पेड़ लगाए।
यह प्रयोग आगे चलकर उनके लिए एक बड़े मिशन में बदल गया।
केरल की वर्कशॉप से मिली नई दिशा
साल 2017 मिथिलेश देसाई के लिए महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने केरल के वायनाड में कटहल को लेकर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में हिस्सा लिया। यहां उन्हें यह समझने का मौका मिला कि भारत के बाहर भी कटहल का बड़ा बाजार मौजूद है।
वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में कटहल से जुड़े कारोबार और इसकी अलग-अलग उपयोगिताओं ने उनका ध्यान खींचा। इसके बाद उन्होंने कटहल को केवल फल के रूप में देखने के बजाय इससे जुड़ी पूरी एग्रीकल्चर वैल्यू चेन पर काम करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
उनका फोकस बेहतर किस्मों, उत्पादन, प्रोसेसिंग, बाजार और किसानों को सीधे अवसर उपलब्ध कराने पर बढ़ता गया।
100 किसानों से शुरू हुआ सफर, अब 1077 सदस्य
कटहल की खेती को किसानों के लिए बेहतर आय का जरिया बनाने के उद्देश्य से मिथिलेश ने साल 2020 में एक किसान उत्पादक कंपनी (FPO) शुरू की। शुरुआत में करीब 100 किसान इससे जुड़े थे।
समय के साथ इस नेटवर्क का विस्तार होता गया और अब इसमें 1077 सदस्य होने की बात सामने आती है। कंपनी केवल कटहल तक सीमित नहीं है, बल्कि काजू और आम जैसे अन्य कृषि उत्पादों पर भी काम करती है।
इस तरह मिथिलेश का व्यक्तिगत खेती का प्रयोग धीरे-धीरे किसानों के सामूहिक कारोबार और बाजार से जुड़ने के मॉडल में बदल गया।
कटहल के पत्तों का भी मिला विदेशी बाजार
मिथिलेश देसाई के काम का एक दिलचस्प पहलू कटहल के उन हिस्सों का इस्तेमाल तलाशना है, जिन्हें आम तौर पर किसान कम महत्व देते हैं।
साल 2022 में उनकी कंपनी को जर्मनी से कटहल के पत्तों का ऑर्डर मिलने की बात सामने आई। शुरुआत में करीब एक टन पत्ते भेजे गए और अगले साल यह मात्रा बढ़कर लगभग पांच टन हो गई।
मिथिलेश के अनुसार, उन्हें जानकारी मिली थी कि इन पत्तों से अर्क तैयार किया जाता है और जर्मनी में इसका इस्तेमाल कैंसर मरीजों से जुड़े उपचार में किया जाता है। हालांकि, इस तरह के चिकित्सकीय दावों की पुष्टि विशेषज्ञ और वैज्ञानिक स्रोतों से अलग से की जानी चाहिए। कृषि के नजरिए से यह जरूर दिखाता है कि किसी फसल के केवल मुख्य उत्पाद ही नहीं, बल्कि उसके दूसरे हिस्सों में भी संभावित बाजार तलाशे जा सकते हैं।
विदेश में इंजीनियर की नौकरी छोड़कर खेती को बनाया मिशन
मिथिलेश देसाई की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने खेती को मजबूरी के तौर पर नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देखा। एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने विदेश में इंजीनियर के तौर पर काम किया, लेकिन बाद में खेती और कृषि अनुसंधान की ओर लौट आए।
UPSC की कोशिश के बाद गांव लौटकर उन्होंने परिवार की खेती को एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया। कटहल की अलग-अलग किस्मों से शुरुआत करते हुए उन्होंने इसके उत्पादन, प्रोसेसिंग, बाजार और निर्यात की संभावनाओं पर काम किया।
धीरे-धीरे यह व्यक्तिगत प्रयास दूसरे किसानों को जोड़ने वाले मॉडल में बदल गया।
क्यों कहा जाता है ‘जैकफ्रूट किंग’?
मिथिलेश देसाई को ‘फणस किंग’ या ‘जैकफ्रूट किंग’ कहे जाने के पीछे मुख्य वजह कटहल के क्षेत्र में उनका लंबे समय से किया जा रहा काम है। उन्होंने अलग-अलग किस्मों को इकट्ठा करने, खेती की तकनीकों को समझने, कटहल के नए बाजार तलाशने और किसानों को इससे जोड़ने पर जोर दिया।
उनका मॉडल इस बात पर आधारित है कि किसान केवल कच्चा कृषि उत्पाद बेचने तक सीमित न रहे, बल्कि उत्पादन से लेकर बाजार और वैल्यू एडिशन तक पूरी श्रृंखला में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाए।
PM मोदी से मुलाकात के बाद फिर चर्चा में आए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात का वीडियो वायरल होने के बाद मिथिलेश देसाई की कहानी एक बार फिर बड़े स्तर पर चर्चा में आ गई है। हालांकि, उनकी पहचान सिर्फ इस मुलाकात तक सीमित नहीं है।
एक छोटे से गांव से निकलकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने, UPSC की कोशिश करने, विदेश में नौकरी करने और फिर खेती में लौटकर कटहल पर काम करने की उनकी यात्रा कृषि क्षेत्र में अलग सोच की मिसाल पेश करती है।
मिथिलेश की कहानी यह भी बताती है कि खेती में सफलता के लिए केवल जमीन और पारंपरिक फसलें ही जरूरी नहीं हैं। किसी स्थानीय उत्पाद की संभावनाओं को समझकर उसके आसपास रिसर्च, प्रोसेसिंग, बाजार और किसानों का नेटवर्क तैयार किया जाए तो खेती को एक बड़े कारोबारी अवसर में बदला जा सकता है।
आज ‘फणस किंग’ के नाम से पहचाने जाने वाले मिथिलेश देसाई का सफर इसी सोच का उदाहरण है। जिस कटहल को कभी उनके परिवार ने हाईवे किनारे बेचने से शुरू किया था, उसी फसल ने आगे चलकर उन्हें किसानों, बाजार और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई मुलाकात तक पहुंचा दिया।


