Crude Oil Price: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। ब्रेंट क्रूड 94 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जबकि WTI क्रूड भी 87 डॉलर के करीब कारोबार कर रहा है। भारत के लिए यह चिंता बढ़ाने वाली खबर है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है।
मध्यपूर्व में एक बार फिर बढ़ती भू-राजनीतिक टेंशन ने अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच 20 अगस्त को ब्रेंट क्रूड की कीमत 94 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई। कच्चे तेल में लगातार चौथे दिन तेजी देखने को मिली। इसका असर सिर्फ ग्लोबल एनर्जी मार्केट तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था, रुपये की चाल, महंगाई और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
भारतीय समय के मुताबिक शाम 5 बजे ब्रेंट क्रूड 2.63 फीसदी की तेजी के साथ 94.02 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं, WTI क्रूड करीब 3 फीसदी चढ़कर 86.92 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। बाजार में यह तेजी ऐसे समय आई है, जब निवेशक अमेरिका-ईरान तनाव और मध्यपूर्व में आगे की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
ट्रंप के सख्त रुख से बढ़ी बाजार की चिंता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बेहद सख्त आर्थिक कार्रवाई के संकेत दिए हैं। उन्होंने ईरान पर ऐसे प्रतिबंध लगाने की बात कही है, जिन्हें अब तक किसी देश के खिलाफ लगाए गए सबसे कड़े प्रतिबंधों में बताया गया है। साथ ही उन्होंने उन देशों को भी चेतावनी दी है, जो ईरान की आर्थिक मदद कर रहे हैं।
अमेरिका के इस आक्रामक रुख के बीच ईरान की ओर से भी नरमी के संकेत नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में बाजार को आशंका है कि अगर दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ता है, तो मध्यपूर्व से होने वाली तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
मध्यपूर्व दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। ऐसे में यहां किसी भी बड़े संघर्ष की आशंका अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को तुरंत प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि निवेशक सप्लाई से जुड़ी किसी भी संभावित बाधा को लेकर सतर्क हैं।
फरवरी के बाद भी क्रूड में दिखी बड़ी तेजी
अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला था। उस दौरान ब्रेंट क्रूड एक समय करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था।
बाद में जून में अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा के बाद बाजार की चिंता कुछ कम हुई और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई। लेकिन युद्धविराम की अवधि समाप्त होने के बाद मध्यपूर्व में तनाव फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। इसका असर अब एक बार फिर क्रूड की कीमतों पर नजर आने लगा है।
अगर आने वाले दिनों में तनाव कम नहीं होता और तेल सप्लाई को लेकर जोखिम बढ़ता है, तो क्रूड की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है परेशानी?
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के लिए अच्छी खबर नहीं होती। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होता है, तो भारत को उसी मात्रा में तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे देश का क्रूड इंपोर्ट बिल बढ़ता है और व्यापार घाटे पर दबाव पड़ सकता है।
इसका असर विदेशी मुद्रा बाजार पर भी देखने को मिल सकता है। भारत को कच्चे तेल के आयात के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत होती है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ सकती है और इससे रुपये पर दबाव आने की संभावना रहती है।
हालांकि, रुपये में हालिया कमजोरी के बाद कुछ स्थिरता देखने को मिली है, लेकिन अगर क्रूड लगातार ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो भारतीय मुद्रा के लिए चुनौती फिर बढ़ सकती है।
अप्रैल-जुलाई में 56.5% बढ़ा क्रूड इंपोर्ट बिल
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारत के इंपोर्ट बिल पर पहले ही दिखाई दे चुका है। अप्रैल-जुलाई की अवधि में भारत का क्रूड इंपोर्ट बिल 56.5 फीसदी बढ़कर 63.4 अरब डॉलर पहुंच गया।
खास बात यह है कि इस दौरान आयात की मात्रा में बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ। अप्रैल-जुलाई में भारत ने करीब 8.19 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह आंकड़ा करीब 8.15 करोड़ टन था।
यानी आयात की मात्रा लगभग समान रहने के बावजूद इंपोर्ट बिल में इतनी बड़ी बढ़ोतरी बताती है कि कीमतों में उछाल का कितना बड़ा असर पड़ता है।
1 डॉलर क्रूड महंगा हुआ तो 2 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ
भारत हर साल करीब 1.8 से 2 अरब बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत में सिर्फ 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भी देश के सालाना इंपोर्ट बिल में करीब 2 अरब डॉलर तक का इजाफा कर सकती है।
यही कारण है कि 94 डॉलर के आसपास पहुंच चुका ब्रेंट क्रूड भारत के लिए चिंता का विषय है। अगर कीमतें 100 डॉलर या उससे ऊपर लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो इसका असर भारत के चालू खाते, व्यापार घाटे और रुपये की स्थिति पर ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है असर
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी का सबसे सीधा असर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर पड़ता है। अगर कंपनियों की लागत बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव का दबाव बढ़ सकता है।
जून में अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर से पहले क्रूड की कीमतों में तेजी के बीच भारत में ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी की थी। इससे आम लोगों के बजट पर असर पड़ा था।
अगर इस बार भी कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखना कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, घरेलू ईंधन की कीमतों का फैसला सिर्फ अंतरराष्ट्रीय क्रूड के भाव पर निर्भर नहीं करता। इसमें टैक्स, रुपये की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत और अन्य कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
महंगाई का भी बढ़ सकता है दबाव
महंगा कच्चा तेल सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित असर नहीं डालता। परिवहन लागत बढ़ने से कई दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव आ सकता है।
ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने पर फल, सब्जियां, खाद्य उत्पाद और रोजमर्रा की दूसरी चीजों की लागत प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा प्लास्टिक, केमिकल और पेट्रोकेमिकल से जुड़े कई उद्योग भी कच्चे तेल की कीमतों से प्रभावित होते हैं।
इसलिए अगर ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक 90-100 डॉलर के ऊंचे स्तर पर रहता है, तो भारत में महंगाई को लेकर भी चिंता बढ़ सकती है।
सोने और चांदी पर भी दिखा असर
मध्यपूर्व में बढ़ते तनाव का असर सिर्फ क्रूड पर ही नहीं, बल्कि सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने और चांदी पर भी देखने को मिल सकता है। जब भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ता है, तो निवेशक अक्सर जोखिम वाली संपत्तियों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले एसेट्स की ओर रुख करते हैं।
यही वजह है कि एक तरफ कच्चे तेल में तेजी दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर सोने और चांदी की कीमतों में भी मजबूती देखने को मिल रही है।
हालांकि, इन सभी बाजारों की दिशा आगे अमेरिका-ईरान तनाव, मध्यपूर्व में संभावित सप्लाई व्यवधान, डॉलर की चाल और वैश्विक आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेगी।
आगे क्या देखना होगा?
अब बाजार की नजर मुख्य रूप से तीन चीजों पर रहेगी। पहला, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किस दिशा में जाता है। दूसरा, क्या मध्यपूर्व से होने वाली तेल सप्लाई वास्तव में प्रभावित होती है या नहीं। और तीसरा, प्रमुख तेल उत्पादक देश बाजार में संभावित सप्लाई की कमी को किस तरह संभालते हैं।
अगर तनाव कम होता है, तो क्रूड में आई तेजी कुछ हद तक वापस हो सकती है। लेकिन अगर संघर्ष बढ़ता है और तेल की सप्लाई पर वास्तविक खतरा पैदा होता है, तो ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के स्तर की ओर बढ़ सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है कि देश कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है। इसलिए क्रूड की कीमतों में लंबे समय तक रहने वाली तेजी से इंपोर्ट बिल, व्यापार घाटा, रुपया, महंगाई और अंततः आम लोगों के खर्च पर असर पड़ सकता है। फिलहाल 94 डॉलर के पार पहुंचा ब्रेंट क्रूड भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण निगरानी वाला संकेत बन गया है।


