Business Licence Reform: केंद्र सरकार कारोबारियों को बड़ी राहत देने की तैयारी में है। सरकार रेगुलेटरी बोझ कम करने और कारोबार करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कई तरह के लाइसेंस और परमिट की वैधता बढ़ाने पर विचार कर रही है। पर्यावरण, दवा, विस्फोटक और अन्य रेगुलेटेड सेक्टर से जुड़े लाइसेंस की वैलिडिटी 10 से 15 साल तक की जा सकती है। हालांकि, लाइसेंस की वैधता लंबी होने के बावजूद कारोबारियों को तय वार्षिक फीस का भुगतान करना पड़ सकता है।
केंद्र सरकार कारोबारियों के लिए लाइसेंस और परमिट से जुड़ी मौजूदा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रही है। सरकार का फोकस ऐसी व्यवस्था तैयार करने पर है, जिसमें कारोबारियों को बार-बार लाइसेंस रिन्यू कराने की प्रक्रिया से राहत मिले और उनका समय कागजी कार्रवाई में कम खर्च हो। सूत्रों के मुताबिक, कई तरह के लाइसेंस की वैधता को बढ़ाकर 10 से 15 साल तक किया जा सकता है।
इस प्रस्ताव का मकसद कारोबारियों के ऊपर मौजूद रेगुलेटरी और कंप्लायंस बोझ को कम करना है। खासतौर पर ऐसे कारोबारों में जहां हर कुछ साल में लाइसेंस रिन्यू कराने के लिए आवेदन, दस्तावेज और दूसरी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, वहां यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
लाइसेंस रिन्यूअल की बार-बार प्रक्रिया से मिलेगी राहत
भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार करने के लिए कई तरह की मंजूरियां और लाइसेंस लेने पड़ते हैं। किसी बिजनेस को केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय निकायों से अलग-अलग परमिशन की जरूरत हो सकती है। समय-समय पर इन लाइसेंस को रिन्यू भी कराना पड़ता है।
हॉस्पिटैलिटी सेक्टर इसका एक बड़ा उदाहरण है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, किसी होटल या हॉस्पिटैलिटी बिजनेस को अपने पूरे प्रोजेक्ट के दौरान केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर कम से कम 60 लाइसेंस और मंजूरियों की जरूरत पड़ सकती है। इनमें पर्यावरण से जुड़ी मंजूरी और फूड सेफ्टी जैसे महत्वपूर्ण लाइसेंस भी शामिल हैं।
ऐसे में यदि किसी लाइसेंस की वैधता केवल कुछ वर्षों की है, तो कारोबारियों को बार-बार रिन्यूअल प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। सरकार अब इसी तरह की प्रक्रियाओं को कम करने पर जोर दे रही है।
FSSAI लाइसेंस की वैलिडिटी भी बदल सकती है
नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) के लाइसेंस को मौजूदा व्यवस्था में सामान्य तौर पर 1 से 5 साल के बीच रिन्यू कराने की जरूरत होती है।
सरकार की प्रस्तावित सुधार प्रक्रिया में फूड सेफ्टी सहित कई महत्वपूर्ण रेगुलेटरी क्षेत्रों को शामिल किया जा सकता है। इसका उद्देश्य यह है कि जिन कारोबारियों का रिकॉर्ड सही है और जो निर्धारित नियमों का पालन करते हैं, उन्हें बार-बार रिन्यूअल प्रक्रिया में नहीं उलझना पड़े।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि कारोबारियों को नियमों का पालन करने से छूट मिल जाएगी। लाइसेंस की अवधि बढ़ने और कंप्लायंस की जिम्मेदारी खत्म होने में अंतर है। कारोबारियों को संबंधित कानूनों और सुरक्षा मानकों का पालन करना जारी रखना होगा।
पर्यावरण और दवा सेक्टर भी सुधार के दायरे में
प्रस्तावित रेगुलेटरी सुधार केवल एक सेक्टर तक सीमित नहीं रहने वाले हैं। इसमें इंडस्ट्री पर असर डालने वाले कई महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल किए जा रहे हैं।
इनमें प्रमुख रूप से:
- पर्यावरण से जुड़े लाइसेंस और मंजूरियां
- दवा और फार्मास्युटिकल रेगुलेशन
- विस्फोटक से जुड़े परमिट
- फूड सेफ्टी लाइसेंस
- ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) से जुड़े रेगुलेटरी प्रावधान
- अन्य इंडस्ट्री स्पेसिफिक परमिट और सर्टिफिकेशन
शामिल हो सकते हैं।
सरकार का प्रयास है कि जहां जोखिम और रेगुलेटरी जरूरत इसकी अनुमति देती है, वहां लंबी अवधि के लाइसेंस दिए जाएं और कारोबारियों को बार-बार रिन्यूअल आवेदन जमा करने की जरूरत न पड़े।
हर साल फीस देनी होगी, लेकिन रिन्यूअल की झंझट घटेगी
प्रस्तावित सिस्टम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लाइसेंस की वैधता और लाइसेंस फीस के भुगतान को अलग-अलग रखा जा सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, अगर किसी लाइसेंस की वैधता 10 या 15 साल कर दी जाती है, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि कारोबारी को एक बार फीस देकर अगले 15 साल तक कोई भुगतान नहीं करना पड़ेगा। इसके बजाय तय नियमों के अनुसार हर साल लाइसेंस फीस का भुगतान करना पड़ सकता है।
फर्क यह होगा कि कारोबारी को हर कुछ साल बाद लाइसेंस के रिन्यूअल के लिए अलग से आवेदन और कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं करनी पड़ेगी।
इसे एक आसान उदाहरण से समझें। मान लीजिए किसी लाइसेंस की वैधता अभी 3 साल है। 3 साल पूरा होने के बाद कारोबारी को रिन्यूअल के लिए आवेदन करना पड़ता है। नई व्यवस्था में उसी लाइसेंस को 10 या 15 साल के लिए वैध किया जा सकता है। इस दौरान कारोबारी को सालाना फीस भरनी होगी, लेकिन हर कुछ साल बाद दोबारा रिन्यूअल प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत नहीं होगी।
क्या सभी लाइसेंस एक ही लाइसेंस में बदल जाएंगे?
यहां एक बात समझना बेहद जरूरी है। प्रस्तावित सुधार का मतलब यह नहीं है कि सरकार अलग-अलग इंडस्ट्री के सभी लाइसेंस को मिलाकर एक ही कॉमन लाइसेंस बनाने जा रही है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, अलग-अलग गतिविधियों के लिए जरूरी अलग-अलग लाइसेंस की व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने पर विचार नहीं किया जा रहा है। यानी जिस कारोबार के लिए पर्यावरण मंजूरी जरूरी है, उसे वह मंजूरी लेनी होगी और जिस कारोबार के लिए फूड सेफ्टी लाइसेंस जरूरी है, उसे संबंधित लाइसेंस लेना होगा।
सुधार का मुख्य उद्देश्य लाइसेंस की प्रक्रिया को आसान बनाना और रिन्यूअल से जुड़े प्रशासनिक बोझ को कम करना है।
अगस्त 2025 में बनी हाई-लेवल कमिटी कर रही है काम
इन सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए नॉन-फाइनेंशियल रेगुलेटरी रिफॉर्म्स पर बनी एक हाई-लेवल कमिटी काम कर रही है। इस कमिटी की अध्यक्षता नीति आयोग के सदस्य और पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी राजीव गौबा कर रहे हैं।
इस कमिटी का गठन अगस्त 2025 में किया गया था। इसका उद्देश्य केंद्र सरकार के स्तर पर लागू होने वाले विभिन्न रेगुलेशन, सर्टिफिकेशन, लाइसेंस और परमिशन की समीक्षा करना है।
कमिटी का फोकस यह पता लगाने पर है कि कारोबारियों के लिए किन नियमों को आसान बनाया जा सकता है, किन प्रक्रियाओं को डिजिटल किया जा सकता है और कहां बार-बार होने वाली मंजूरी या रिन्यूअल प्रक्रिया को कम किया जा सकता है।
यह कदम सरकार के व्यापक रेगुलेटरी रिफॉर्म एजेंडे का हिस्सा माना जा रहा है।
भरोसे पर आधारित कंप्लायंस सिस्टम की ओर बढ़ने की कोशिश
सरकार की इस कवायद में एक बड़ा विचार रिस्क-बेस्ड और भरोसे पर आधारित कंप्लायंस को बढ़ावा देना है।
मौजूदा व्यवस्था में कई बार एक ही तरह के दस्तावेज, जानकारी और प्रक्रियाएं दोहरानी पड़ती हैं। इससे कारोबारी का समय और संसाधन दोनों खर्च होते हैं। खासतौर पर छोटे और मध्यम कारोबारियों के लिए यह प्रक्रिया अधिक मुश्किल हो सकती है।
लाइसेंस की वैधता बढ़ने से कारोबारियों को अपने बिजनेस के संचालन पर ज्यादा ध्यान देने का मौका मिल सकता है। साथ ही सरकारी विभागों पर भी बड़ी संख्या में रिन्यूअल आवेदनों को प्रोसेस करने का प्रशासनिक दबाव कम हो सकता है।
हालांकि, जहां स्वास्थ्य, सुरक्षा, पर्यावरण या सार्वजनिक हित से जुड़े जोखिम अधिक हैं, वहां रेगुलेटरी निगरानी बनाए रखना जरूरी होगा। इसलिए सभी लाइसेंस के लिए एक समान 15 साल की अवधि लागू होगी, ऐसा मानना अभी सही नहीं होगा।
Ease of Doing Business को मिलेगा बढ़ावा
भारत सरकार पिछले कई वर्षों से देश में Ease of Doing Business यानी कारोबार करने में आसानी बढ़ाने पर जोर देती रही है। लाइसेंस और परमिट की प्रक्रिया को सरल बनाना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
वर्ल्ड बैंक के Ease of Doing Business इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 2014 में 142वीं थी। इसके बाद भारत की रैंकिंग में लगातार सुधार हुआ और 2020 में यह 63वीं हो गई थी।
हालांकि, डेटा की विश्वसनीयता से जुड़ी चिंताओं के कारण वर्ल्ड बैंक ने बाद में इस इंडेक्स को बंद कर दिया। इसलिए 2020 की रैंकिंग को इस इंडेक्स का आखिरी संस्करण माना जाता है।
अब भारत वर्ल्ड बैंक के नए Business Ready यानी B-READY असेसमेंट में शामिल होने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में घरेलू रेगुलेटरी सिस्टम में सुधार और कारोबारियों के लिए प्रक्रियाओं को आसान बनाना भारत के कारोबारी माहौल की तस्वीर को बेहतर करने में मदद कर सकता है।
छोटे कारोबारियों को भी हो सकता है फायदा
लंबी अवधि के लाइसेंस का सबसे बड़ा फायदा केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अगर सुधार सही तरीके से लागू होते हैं, तो छोटे और मध्यम कारोबारियों को भी इसका फायदा मिल सकता है।
छोटे बिजनेस के लिए हर कुछ साल में लाइसेंस रिन्यू कराना, दस्तावेज तैयार करना और अलग-अलग विभागों से संपर्क करना अतिरिक्त लागत और समय की मांग करता है। यदि रिन्यूअल की आवृत्ति कम होती है, तो कारोबारियों का प्रशासनिक खर्च घट सकता है।
इससे कारोबारी अपने संसाधनों को बिजनेस विस्तार, कर्मचारियों, तकनीक और ग्राहकों से जुड़े कामों में लगा सकते हैं।
सरकार के लिए भी कम होगा प्रशासनिक बोझ
इस सुधार का फायदा सिर्फ कारोबारियों को ही नहीं बल्कि सरकार को भी हो सकता है। बड़ी संख्या में लाइसेंस के रिन्यूअल आवेदनों को हर साल या कुछ वर्षों में प्रोसेस करने में सरकारी विभागों के संसाधन लगते हैं।
अगर लाइसेंस लंबे समय के लिए जारी किए जाते हैं और बीच में केवल जरूरी कंप्लायंस की निगरानी की जाती है, तो विभाग अपने संसाधनों को ज्यादा महत्वपूर्ण निरीक्षण और जोखिम वाले मामलों पर केंद्रित कर सकते हैं।
इस तरह सरकार का उद्देश्य कम कागजी कार्रवाई, ज्यादा डिजिटल प्रक्रिया और बेहतर रेगुलेटरी निगरानी का संतुलन बनाना हो सकता है।
क्या यह सच में खत्म करेगा ‘लाइसेंस राज’?
‘लाइसेंस राज’ शब्द का इस्तेमाल भारत में उस दौर के लिए किया जाता रहा है जब कारोबार शुरू करने और चलाने के लिए बड़ी संख्या में सरकारी मंजूरियों और परमिट की जरूरत होती थी। पिछले कुछ दशकों में इस व्यवस्था में काफी बदलाव हुए हैं, लेकिन कई सेक्टर में अभी भी रेगुलेटरी मंजूरियों की संख्या और प्रक्रियाएं कारोबारियों के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
प्रस्तावित बदलाव को उसी दिशा में एक और कदम माना जा सकता है। हालांकि, इसे पूरी तरह ‘लाइसेंस राज की समाप्ति’ कहना अभी जल्दबाजी होगी। सरकार फिलहाल लाइसेंस खत्म करने के बजाय उनकी वैधता बढ़ाने और रिन्यूअल प्रक्रिया को आसान बनाने पर ध्यान दे रही है।
अगर यह सुधार प्रभावी तरीके से लागू होते हैं, तो कारोबारियों को बार-बार होने वाली कागजी कार्रवाई से राहत मिल सकती है और भारत में बिजनेस करने की प्रक्रिया पहले के मुकाबले अधिक सरल हो सकती है।
निष्कर्ष
केंद्र सरकार की प्रस्तावित लाइसेंस सुधार योजना कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकती है। पर्यावरण, दवा, विस्फोटक, फूड सेफ्टी और BIS जैसे क्षेत्रों से जुड़े कुछ लाइसेंस की वैधता 10 से 15 साल तक बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।
हालांकि, लंबी वैधता का मतलब नियमों से छूट नहीं होगा। कारोबारियों को संबंधित कानूनों और सुरक्षा मानकों का पालन करना जारी रखना होगा और तय वार्षिक फीस भी देनी पड़ सकती है। असली बदलाव यह होगा कि उन्हें बार-बार लाइसेंस रिन्यू कराने के लिए आवेदन और कागजी प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत कम होगी।
अगर सरकार इस सुधार को व्यावहारिक और पारदर्शी तरीके से लागू करती है, तो इससे Ease of Doing Business को बढ़ावा मिल सकता है और कारोबारियों का समय, लागत तथा अनुपालन संबंधी बोझ कम हो सकता है।


