महाराष्ट्र में रूफटॉप सोलर लगाने वाले लाखों उपभोक्ताओं के लिए आने वाला समय महंगा पड़ सकता है। राज्य सरकार एक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिससे सोलर बिजली का फायदा कम हो सकता है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो उपभोक्ताओं को एक साथ तीन तरह के असर झेलने पड़ सकते हैं—बिजली ड्यूटी, ग्रिड सपोर्ट चार्ज और नए टैरिफ नियम।
21 अप्रैल 2026 को जारी एक सरकारी प्रस्ताव के अनुसार, राज्य ने एक कमेटी बनाई है जो यह जांच करेगी कि क्या रूफटॉप सोलर (RTS) और खुद से पैदा की गई बिजली (Self-Generated Power) पर भी बिजली ड्यूटी लगाई जानी चाहिए। अभी तक इन पर आमतौर पर कोई टैक्स नहीं लगता था।
क्या बदलने वाला है? समझिए पूरा मामला
सरकार जिस बदलाव पर विचार कर रही है, उसका मतलब है कि अब आप जो बिजली अपने घर या ऑफिस में खुद सोलर पैनल से बनाते हैं, उस पर भी टैक्स देना पड़ सकता है।
यह बदलाव खासतौर पर दो चीजों को प्रभावित करेगा:
- Self-consumption: यानी जो बिजली आप खुद इस्तेमाल करते हैं
- Net metering: यानी जो अतिरिक्त बिजली आप ग्रिड को देते हैं
अगर ड्यूटी लागू होती है, तो यह लगभग 16% (घरेलू) से लेकर 21% (कमर्शियल) तक हो सकती है।
‘ट्रिपल इम्पैक्ट’ क्या है?
इस पूरे प्रस्ताव को विशेषज्ञ “Triple Hit” यानी तीन तरफ से झटका बता रहे हैं। इसमें शामिल हैं:
1. बिजली ड्यूटी (Electricity Duty)
अगर लागू हुई, तो सोलर से पैदा हुई बिजली भी टैक्स के दायरे में आ जाएगी।
2. ग्रिड सपोर्ट चार्ज (GSC)
Maharashtra Electricity Regulatory Commission (MERC) पहले ही 10kW से ज्यादा के सोलर सिस्टम पर GSC लगाने की अनुमति दे चुका है।
- लो टेंशन यूजर्स: लगभग ₹1.96 प्रति यूनिट
- हाई टेंशन यूजर्स: लगभग ₹1.42 प्रति यूनिट
3. टाइम-ऑफ-डे (ToD) टैरिफ
नए नियमों के तहत दिन में सोलर बिजली सस्ती मानी जाएगी, जबकि रात में ग्रिड से ली गई बिजली महंगी हो सकती है।
इससे नेट मीटरिंग का फायदा कम हो जाएगा।
आम उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा?
रूफटॉप सोलर लगाने का सबसे बड़ा कारण होता है बिजली बिल में बचत। लेकिन अगर इन सभी चार्जेस को जोड़ दिया जाए, तो:
- बिजली बिल में बचत कम हो सकती है
- सोलर लगाने की लागत वसूलने में ज्यादा समय लगेगा (Payback period बढ़ेगा)
- नए उपभोक्ता सोलर लगाने से हिचक सकते हैं
जो लोग पहले ही लाखों रुपये खर्च कर चुके हैं, उनके लिए यह बदलाव आर्थिक गणित बिगाड़ सकता है।
सोसायटी और छोटे बिजनेस पर ज्यादा असर
हाउसिंग सोसायटी, छोटे दुकानदार और MSME सेक्टर ने पिछले कुछ सालों में तेजी से सोलर अपनाया है।
लेकिन अगर ड्यूटी + GSC + नया टैरिफ लागू होता है, तो:
- मासिक खर्च बढ़ सकता है
- सोलर निवेश का फायदा घट सकता है
- कई प्रोजेक्ट्स आर्थिक रूप से “अव्यवहारिक” हो सकते हैं
उद्योगों के लिए और बड़ी चुनौती
इंडस्ट्रियल और कमर्शियल यूजर्स के लिए यह असर और ज्यादा गंभीर हो सकता है।
क्योंकि ये बड़े पैमाने पर सोलर का उपयोग करते हैं, इसलिए:
- ज्यादा ड्यूटी = ज्यादा लागत
- सोलर बनाम ग्रिड बिजली का अंतर कम हो जाएगा
- कंपनियां सोलर में नए निवेश टाल सकती हैं
सरकार ऐसा क्यों सोच रही है?
इस प्रस्ताव के पीछे एक बड़ा कारण है—डिस्कॉम्स (बिजली वितरण कंपनियों) की कमाई में गिरावट।
जैसे-जैसे बड़े उपभोक्ता सोलर अपनाते हैं, वे ग्रिड से कम बिजली लेते हैं, जिससे कंपनियों की आय घटती है।
Maharashtra State Electricity Distribution Company Ltd जैसी कंपनियां इसी वजह से वित्तीय दबाव में हैं।
सरकार अब यह संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है कि:
- डिस्कॉम्स की आय भी बनी रहे
- और सोलर अपनाने का ट्रेंड भी पूरी तरह न रुके
क्या इससे ग्रीन एनर्जी मिशन प्रभावित होगा?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
भारत सरकार लगातार रूफटॉप सोलर को बढ़ावा दे रही है, खासकर घरों और छोटे व्यवसायों में।
लेकिन अगर राज्यों में ऐसे टैक्स लागू होते हैं, तो:
- सोलर अपनाने की रफ्तार धीमी हो सकती है
- निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है
- क्लीन एनर्जी का लक्ष्य प्रभावित हो सकता है
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पॉलिसी कंसिस्टेंसी के खिलाफ जा सकता है।
कई उपभोक्ताओं ने सोलर सिस्टम इसलिए लगाया था क्योंकि उन्हें लंबी अवधि में बचत का भरोसा दिया गया था।
अब अगर नियम बदलते हैं, तो यह “रेट्रोस्पेक्टिव इम्पैक्ट” जैसा महसूस होगा।
उपभोक्ताओं के लिए क्या करें?
फिलहाल यह प्रस्ताव अभी विचाराधीन है, लागू नहीं हुआ है।
लेकिन अगर आप सोलर लगाने की सोच रहे हैं, तो:
- नई पॉलिसी का इंतजार करें
- अपनी लागत और बचत का नया कैलकुलेशन करें
- विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही निवेश करें
निष्कर्ष
महाराष्ट्र सरकार का यह प्रस्ताव सोलर उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
अगर बिजली ड्यूटी, ग्रिड चार्ज और टैरिफ बदलाव एक साथ लागू होते हैं, तो सोलर अब केवल “सस्ता विकल्प” नहीं रहेगा, बल्कि एक जटिल और महंगा निवेश बन सकता है।
आने वाले दिनों में कमेटी की रिपोर्ट और सरकार का अंतिम फैसला तय करेगा कि महाराष्ट्र सोलर एनर्जी को बढ़ावा देगा या उस पर नए वित्तीय बोझ डालेगा।
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