नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान युद्ध के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एलपीजी आयात का नक्शा ही बदल दिया है। लंबे समय से मिडल ईस्ट के देशों पर निर्भर भारत अब अमेरिका, अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों से भी बड़ी मात्रा में एलपीजी मंगा रहा है। इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा यह रहा कि रसोई गैस की घरेलू उपलब्धता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा।
होर्मुज संकट ने बदली रणनीति
भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। आमतौर पर इसका अधिकांश हिस्सा पश्चिम एशिया से आता रहा है, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ी अनिश्चितता और युद्ध संबंधी जोखिमों ने सरकार और तेल कंपनियों को वैकल्पिक सप्लाई चेन तलाशने के लिए मजबूर कर दिया।
सीएएस (CAS) के आंकड़ों के अनुसार 5 मार्च को समाप्त सप्ताह में भारत का एलपीजी आयात 3.22 लाख मीट्रिक टन था, जो 19 मार्च को समाप्त सप्ताह में घटकर 2.65 लाख मीट्रिक टन रह गया। सबसे बड़ा झटका पश्चिम एशिया से आने वाली सप्लाई को लगा, जो घटकर केवल 89,000 मीट्रिक टन रह गई। कुल आयात में इसकी हिस्सेदारी सिर्फ 34 फीसदी पर आ गई, जो जनवरी के बाद सबसे निचला स्तर था।
हालांकि इसी दौरान अन्य क्षेत्रों से आयात बढ़कर 1.76 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया। दिलचस्प बात यह रही कि इससे एक सप्ताह पहले अन्य क्षेत्रों से आयात लगभग शून्य था और पूरी निर्भरता मिडल ईस्ट पर थी।
अमेरिका के साथ 22 लाख टन की बड़ी डील
भारत की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने 2026 के लिए अमेरिका से 22 लाख मीट्रिक टन एलपीजी आयात करने का बड़ा समझौता किया है। यह मात्रा हर महीने लगभग चार बड़े वीएलजीसी (Very Large Gas Carrier) जहाजों के बराबर है।
साल 2026 के शुरुआती दो महीनों में ही भारत लगभग 4.8 लाख मीट्रिक टन अमेरिकी एलपीजी आयात कर चुका है। यह करीब 11 बड़े जहाजों की खेप के बराबर है। इससे साफ है कि अमेरिका अब भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2026 तक अमेरिका भारत के प्रमुख एलपीजी आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया। फरवरी में भारत के कुल एलपीजी आयात में उसकी हिस्सेदारी जहां केवल 8 फीसदी थी, वहीं अप्रैल तक यह बढ़कर करीब 33 फीसदी हो गई।
यह 22 लाख टन का वार्षिक समझौता भारत की कुल एलपीजी आयात आवश्यकता का लगभग 10 फीसदी हिस्सा पूरा करेगा।
ईरान की भी हुई वापसी
हालांकि पश्चिम एशिया से आयात में गिरावट आई, लेकिन ईरान ने भी भारतीय बाजार में आंशिक वापसी की है। अप्रैल 2026 में भारत के कुल एलपीजी आयात में ईरान की हिस्सेदारी करीब 6 फीसदी रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव कम होता है तो ईरान भविष्य में भारत के लिए फिर से एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बन सकता है। हालांकि फिलहाल भारत एक ही क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचने की नीति पर काम कर रहा है।
अर्जेंटीना से लेकर फ्रांस तक से गैस खरीद
ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने के लिए भारत ने आयात स्रोतों में व्यापक विविधता लाई है। अमेरिका के अलावा अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों से भी एलपीजी खरीद बढ़ाई गई है।
इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर देश की ऊर्जा जरूरतों को प्रभावित होने से बचाना है। पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाओं ने दिखाया है कि ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को विविध बनाना अब केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी बन चुका है।
बढ़ी लॉजिस्टिक्स लागत
हालांकि आयात स्रोतों के विविधीकरण से सप्लाई सुरक्षित हुई है, लेकिन इसकी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। अमेरिका और दक्षिण अमेरिका से आने वाले एलपीजी टैंकरों को भारत तक पहुंचने में अधिक समय और लंबी समुद्री यात्रा करनी पड़ती है।
इस वजह से माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि हुई है। तेल कंपनियों को अतिरिक्त फ्रेट चार्ज देना पड़ रहा है। हालांकि सरकार और कंपनियां इसे ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी निवेश मान रही हैं।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मिला नया आधार
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के साथ एलपीजी आयात समझौता केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं बल्कि भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। इससे भारत को मिडल ईस्ट पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और वैश्विक आपूर्ति नेटवर्क को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी।
आने वाले वर्षों में यदि वैश्विक ऊर्जा बाजार में इसी तरह की अनिश्चितता बनी रहती है तो भारत अमेरिका समेत कई अन्य देशों के साथ ऐसे दीर्घकालिक समझौतों को और बढ़ा सकता है।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध और होर्मुज संकट ने भारत को अपनी गैस आयात नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। परिणामस्वरूप अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एलपीजी साझेदार बनकर उभरा है। 22 लाख टन की वार्षिक डील और आयात स्रोतों के विविधीकरण ने यह सुनिश्चित किया है कि देश में रसोई गैस की सप्लाई बनी रहे। हालांकि लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ी है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से यह रणनीति भारत के लिए एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम मानी जा रही है।


