नई दिल्ली: भारत इस समय भीषण गर्मी और अनिश्चित मानसून की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ताजा चेतावनी ने सरकार, किसानों और बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। प्रशांत महासागर में सक्रिय हो रहा अल नीनो (El Nino) इस साल देश में सामान्य से कम बारिश का कारण बन सकता है। अगर ऐसा हुआ तो इसका असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महंगाई, ग्रामीण आय, बिजली उत्पादन और आर्थिक विकास दर तक दिखाई दे सकता है।
IMD के अनुमान के अनुसार, जून से सितंबर तक मानसून की बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) के लगभग 90 प्रतिशत रहने की संभावना है। मानसून सीजन की शुरुआत भी कमजोर रही है। 1 जून से 16 जून के बीच देशभर में सामान्य से करीब 35 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अल नीनो भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को धीमा कर सकता है?
क्या होता है अल नीनो और क्यों बढ़ जाती है चिंता?
अल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया भर के मौसम पैटर्न पर पड़ता है। भारत में अक्सर अल नीनो के दौरान मानसून कमजोर पड़ता है और कई क्षेत्रों में बारिश की कमी देखी जाती है।
पिछले कई दशकों के आंकड़े बताते हैं कि भारत में आए प्रमुख सूखे वर्षों के पीछे अल नीनो एक महत्वपूर्ण कारण रहा है। हालांकि हर बार इसका प्रभाव समान नहीं होता, लेकिन मौसम वैज्ञानिक इसे मानसून के लिए बड़ा जोखिम मानते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मानसून क्यों महत्वपूर्ण है?
भले ही आज भारत की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी घटकर लगभग 14-16 प्रतिशत रह गई हो, लेकिन देश की बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है। पीएलएफएस (PLFS) के अनुसार, भारत के लगभग 46 प्रतिशत लोग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।
यही कारण है कि कमजोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता। जब फसल उत्पादन प्रभावित होता है, तो किसानों की आय घटती है। ग्रामीण इलाकों में खर्च कम होता है और इसका असर उपभोक्ता वस्तुओं, दोपहिया वाहनों, उर्वरक, कृषि उपकरण और एफएमसीजी कंपनियों की बिक्री तक पहुंच जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण मांग भारतीय अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण ताकत है। अगर बारिश कमजोर रहती है तो ग्रामीण बाजारों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
खेती पर सबसे ज्यादा असर
कम बारिश का सबसे पहला और सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, दालें और गन्ने की बुआई काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है।
अगर जुलाई और अगस्त के दौरान पर्याप्त बारिश नहीं होती, तो फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कृषि मंत्रालय ने पहले ही कई राज्यों की पहचान की है जहां बारिश की कमी का असर सबसे ज्यादा पड़ सकता है।
कम उत्पादन का मतलब है कि बाजार में आपूर्ति घटेगी और कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे किसानों के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं पर भी दबाव बढ़ेगा।
महंगाई बढ़ने का खतरा
भारत की खुदरा महंगाई (CPI) में खाद्य पदार्थों का हिस्सा लगभग 37 प्रतिशत है। ऐसे में सब्जियों, अनाज, दालों और फलों की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे महंगाई दर को प्रभावित करती है।
कम बारिश होने पर टमाटर, प्याज, दालें और अन्य आवश्यक खाद्य वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। यही वजह है कि रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय मानसून के आंकड़ों पर लगातार नजर बनाए रखते हैं।
यदि खाद्य महंगाई बढ़ती है तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों में कटौती करना भी मुश्किल हो सकता है। इससे निवेश और खपत दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
बिजली और ऊर्जा क्षेत्र पर भी असर
कमजोर मानसून का असर बिजली क्षेत्र पर भी दिखाई देता है। भारत में जलविद्युत परियोजनाएं बारिश और जलाशयों के जलस्तर पर निर्भर करती हैं। अगर पर्याप्त बारिश नहीं होती तो बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
दूसरी ओर भीषण गर्मी के कारण बिजली की मांग पहले से ही रिकॉर्ड स्तर पर बनी हुई है। ऐसे में बिजली कंपनियों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।
क्या पहले जितना खतरनाक नहीं रहा अल नीनो?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था अब पहले की तुलना में अधिक मजबूत और लचीली हो चुकी है। पिछले एक दशक में कई ऐसे बदलाव हुए हैं जिन्होंने मानसून पर निर्भरता को कम किया है।
इकोनॉमिक सर्वे 2024-25 के अनुसार देश के कुल बुआई क्षेत्र का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई सुविधाओं के दायरे में आ चुका है। एक दशक पहले यह आंकड़ा करीब 49.3 प्रतिशत था।
इसके अलावा सरकार की विभिन्न योजनाओं ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। इनमें शामिल हैं:
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी नकद सहायता योजनाएं
- बेहतर सिंचाई परियोजनाएं
- फसल विविधीकरण
- ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार के अवसर
इन उपायों के कारण ग्रामीण मांग अब मौसम संबंधी झटकों को पहले की तुलना में बेहतर तरीके से झेल सकती है।
किन राज्यों पर सबसे ज्यादा नजर?
विशेषज्ञों के अनुसार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में मानसून की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण होगी। खासतौर पर पंजाब और हरियाणा देश के प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्र हैं।
यदि इन इलाकों में जुलाई और अगस्त के दौरान बारिश सामान्य से काफी कम रहती है, तो खाद्यान्न उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार को बफर स्टॉक का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।
क्या विकास दर पर पड़ेगा असर?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि फिलहाल अल नीनो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा नहीं बल्कि एक जोखिम कारक है। बफर स्टॉक, सिंचाई नेटवर्क, एमएसपी और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी व्यवस्थाओं ने अर्थव्यवस्था को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनाया है।
हालांकि यदि मानसून में लगातार कमजोरी बनी रहती है और मुख्य कृषि क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बनती है, तो इसका असर आर्थिक विकास दर और महंगाई दोनों पर दिखाई दे सकता है।
अगले 6 हफ्ते होंगे निर्णायक
फिलहाल विशेषज्ञ घबराने की बजाय सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। आने वाले चार से छह सप्ताह मानसून के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होंगे। इसी दौरान यह स्पष्ट होगा कि अल नीनो का प्रभाव सीमित रहेगा या यह खेती, महंगाई और आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा।
अगर जुलाई और अगस्त में बारिश की स्थिति सुधर जाती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था इस चुनौती से आसानी से निपट सकती है। लेकिन अगर बारिश में बड़ी कमी बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई और ग्रामीण मांग दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।


