नई दिल्ली। भारत और जापान की दोस्ती सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा जैसे बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी दोनों देशों के रिश्ते मजबूत होते जा रहे हैं। अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास पैदा हुए संकट के बीच जापान ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह भारत का भरोसेमंद साझेदार है। जब खाड़ी क्षेत्र से तेल और गैस की सप्लाई को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ी, तब जापान ने अमेरिका से LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) खरीदकर भारत समेत कई एशियाई देशों को सप्लाई जारी रखी।
जापान ने अमेरिका से LNG खरीदकर भारत को पहुंचाई
एक नए विश्लेषण के अनुसार, 2020 से 2025 के बीच जापान ने अमेरिका से बड़ी मात्रा में LNG खरीदी और उसे भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान, थाईलैंड, सिंगापुर, बांग्लादेश, पाकिस्तान और मलेशिया जैसे देशों को दोबारा बेचा। इस तरह जापान अमेरिका और एशियाई बाजारों के बीच एक बड़े LNG ट्रेडिंग हब के रूप में उभरा है।
‘जीरो कार्बन एनालिटिक्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में जापान द्वारा खरीदी और फिर बेची गई अमेरिकी LNG का करीब 31 प्रतिशत हिस्सा एशियाई देशों को भेजा गया। इससे ऊर्जा आपूर्ति के संकट के दौरान एशियाई देशों को राहत मिली।
घरेलू जरूरत से ज्यादा LNG विदेशों को बेची
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 2021 के बाद जापान ने अपने घरेलू उपयोग के मुकाबले विदेशी बाजारों में ज्यादा अमेरिकी LNG बेची। ‘डेटा डेस्क’ के आंकड़ों के अनुसार 2021 से 2025 के बीच जापान की विदेशी LNG बिक्री उसके घरेलू LNG आयात से करीब 77 प्रतिशत अधिक रही।
इसका मतलब है कि जापान सिर्फ अपनी जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाई।
भारत के लिए क्यों अहम है जापान?
भारत अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में यदि होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर संकट पैदा हो जाए तो ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। लेकिन जापान द्वारा अमेरिका से LNG खरीदकर भारत तक पहुंचाने की व्यवस्था ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जापान जैसे साझेदार होने से भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में सप्लाई शॉक का सामना करने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि भारत और जापान के बीच ऊर्जा सहयोग लगातार बढ़ रहा है।
LNG बाजार में जापान की बढ़ती ताकत
जापान आज दुनिया के सबसे बड़े LNG ट्रेडर्स में शामिल है। इसी दौरान अमेरिका भी LNG निर्यात के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा और 2023 में दुनिया का सबसे बड़ा LNG निर्यातक बन गया।
2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने LNG निर्यात परियोजनाओं पर लगी रोक हटाई और 44 अरब डॉलर के अलास्का LNG प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया। इसका उद्देश्य जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य एशियाई देशों को दीर्घकालिक LNG आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
मई 2026 तक अमेरिका ने लुइसियाना और टेक्सास स्थित पांच नए LNG टर्मिनलों तथा एक मौजूदा टर्मिनल से निर्यात की मंजूरी दे दी थी। इससे वैश्विक LNG सप्लाई और मजबूत होने की उम्मीद है।
जापान ने किए 20 साल के लंबे समझौते
घरेलू मांग में कमी के बावजूद जापान ने LNG खरीद को कम नहीं किया। जून 2025 में जापानी कंपनी ‘एनर्जी फॉर ए न्यू एरा’ ने अमेरिकी LNG सप्लायर्स के साथ कई 20-वर्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद मार्च 2026 में भी अतिरिक्त दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंध किए गए।
इन समझौतों का उद्देश्य केवल जापान की जरूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि पूरे एशिया में LNG की उपलब्धता बनाए रखना भी है।
जापान से सबसे ज्यादा LNG खरीदने वालों में भारत शामिल
जापान से दोबारा बेची जाने वाली अमेरिकी LNG के सबसे बड़े खरीदारों में दक्षिण कोरिया, चीन और भारत शामिल हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों ने भी LNG आयात में तेजी दिखाई है।
उदाहरण के तौर पर, घरेलू गैस भंडार में कमी के कारण 2020 से 2024 के बीच थाईलैंड का LNG आयात 100 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया। अप्रैल 2025 में थाईलैंड ने 15 वर्षों में 15 मिलियन मीट्रिक टन अमेरिकी LNG आयात करने का समझौता भी किया।
पर्यावरण पर भी बड़ा असर
हालांकि LNG को कोयले की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है, लेकिन इसके उत्पादन से लेकर उपयोग तक पूरी सप्लाई चेन में कार्बन उत्सर्जन होता है।
‘जीरो कार्बन एनालिटिक्स’ के अनुसार, 2020 से 2025 के बीच जापान द्वारा दोबारा बेची गई 16.5 बिलियन किलोग्राम अमेरिकी LNG से पूरी सप्लाई चेन में लगभग 63.5 बिलियन किलोग्राम CO2 उत्सर्जन हुआ। यह उत्सर्जन कोयले से चलने वाले लगभग 17 पावर प्लांटों के एक साल के उत्सर्जन के बराबर है।
रिपोर्ट के अनुसार कुल उत्सर्जन में 78 प्रतिशत हिस्सा LNG के दहन (Combustion) का था। उत्पादन और लिक्विफैक्शन का योगदान करीब 16 प्रतिशत, शिपिंग का 4.8 प्रतिशत और रीगैसिफिकेशन व वितरण का लगभग 0.5 प्रतिशत रहा।
भारत के लिए क्या है संदेश?
अमेरिका-ईरान तनाव, होर्मुज स्ट्रेट से जुड़े जोखिम और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितताओं के बीच जापान की भूमिका भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रही है। जापान ने दिखाया है कि वह केवल रणनीतिक साझेदार नहीं, बल्कि संकट के समय भरोसेमंद दोस्त भी है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत-जापान ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है, जिससे भारत को तेल और गैस आपूर्ति से जुड़े वैश्विक जोखिमों का बेहतर तरीके से सामना करने में मदद मिलेगी।
(स्रोत: Zero Carbon Analytics, Data Desk, Centre for Research on Energy and Clean Air)


