Chabahar Port Challenge: ईरान के रणनीतिक रूप से अहम चाबहार पोर्ट पर भारत का बहुचर्चित ड्रीम प्रोजेक्ट इस समय सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंध छूट (Sanctions Waiver) की अवधि समाप्त हो चुकी है, वहीं पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक हालात ने इस परियोजना की चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। इसके बावजूद भारत इस परियोजना से पीछे हटने के बजाय अपने निवेश, रणनीतिक हितों और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को सुरक्षित रखने के लिए सभी संभावित विकल्पों पर काम कर रहा है।
भारत के लिए चाबहार पोर्ट केवल एक बंदरगाह नहीं बल्कि अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस तक पहुंच बनाने की दीर्घकालिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में अमेरिका के प्रतिबंध, ईरान की स्थिति और चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
चाबहार पोर्ट पर संकट क्यों खड़ा हुआ?
चाबहार पोर्ट संकट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका की वह प्रतिबंध छूट है, जिसके समाप्त होने के बाद भारत की परिचालन गतिविधियां कानूनी और वित्तीय जोखिम के दायरे में आ गई हैं।
भारत सरकार ने 31 जुलाई को लोकसभा में लिखित जवाब में स्पष्ट किया कि अमेरिका द्वारा दी गई सशर्त प्रतिबंध छूट 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो चुकी है। सरकार ने कहा कि वह इस मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षों के साथ लगातार बातचीत कर रही है और संभावित विकल्पों का मूल्यांकन किया जा रहा है।
इसका अर्थ यह है कि भारत को अब एक तरफ अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध बनाए रखने हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान में अपने बड़े निवेश और क्षेत्रीय हितों की रक्षा भी करनी है।
भारत ने कितना निवेश किया है?
भारत की सरकारी कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल चाबहार फ्री जोन (IPGCFZ) वर्ष 2018 से शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन कर रही है।
मई 2024 में भारत और ईरान के बीच 10 वर्ष का समझौता हुआ था, जिसके तहत भारत ने टर्मिनल के संचालन और आधुनिक उपकरण लगाने के लिए 120 मिलियन डॉलर निवेश करने का वादा किया था।
सरकार के अनुसार अगस्त 2025 तक अंतिम किस्त सहित पूरी राशि ईरान को ट्रांसफर की जा चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रतिबंधों के बावजूद भारत इस परियोजना में अपनी परिचालन भूमिका कैसे बनाए रखेगा।
भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है चाबहार पोर्ट?
चाबहार पोर्ट ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित है। इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक खासियत यह है कि यह भारत को पाकिस्तान को बायपास करते हुए सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का समुद्री मार्ग देता है।
पाकिस्तान ने वर्षों से भारत को अपने रास्ते अफगानिस्तान तक व्यापारिक पहुंच नहीं दी। ऐसे में चाबहार पोर्ट भारत के लिए एक वैकल्पिक और सुरक्षित व्यापारिक गलियारा बन गया।
इस परियोजना के जरिए भारत न केवल अफगानिस्तान बल्कि कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और रूस जैसे देशों तक व्यापारिक पहुंच मजबूत करना चाहता है।
चीन के ग्वादर पोर्ट का जवाब है चाबहार
चाबहार पोर्ट की सबसे बड़ी रणनीतिक अहमियत यह भी है कि यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से लगभग 72 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
ग्वादर पोर्ट चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ऐसे में चाबहार में भारत की मौजूदगी क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का रणनीतिक संतुलन मानी जाती है। यदि भारत इस परियोजना से पीछे हटता है तो इससे चीन या अन्य क्षेत्रीय शक्तियों को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
मानवीय सहायता में भी निभाई बड़ी भूमिका
चाबहार पोर्ट केवल व्यापारिक परियोजना नहीं बल्कि मानवीय सहायता के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ है।
भारतीय संचालन शुरू होने के बाद अब तक—
- भारत से अफगानिस्तान को 25 लाख टन से अधिक गेहूं भेजा गया।
- लगभग 2,000 टन दालें मानवीय सहायता के रूप में पहुंचाई गईं।
- बंदरगाह ने 90,000 TEU से अधिक कंटेनर ट्रैफिक संभाला।
- 84 लाख मीट्रिक टन से अधिक बल्क और जनरल कार्गो का संचालन किया गया।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए क्यों अहम है?
चाबहार पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह कॉरिडोर भारत को ईरान, कैस्पियन क्षेत्र, रूस और यूरोप से जोड़ने वाला बहु-देशीय व्यापारिक नेटवर्क है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि INSTC पूरी क्षमता से विकसित होता है तो भारत के लिए यूरोप और रूस तक सामान पहुंचाने का समय और लागत दोनों में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।
अमेरिकी प्रतिबंध सबसे बड़ी चुनौती क्यों?
पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और क्षेत्रीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए चाबहार परियोजना को प्रतिबंधों से विशेष छूट दी थी।
हालांकि बाद में अमेरिकी नीति में बदलाव हुआ और यह छूट समाप्त कर दी गई। भारत को संचालन व्यवस्थित करने के लिए सीमित समय दिया गया, जिसकी अंतिम अवधि 26 अप्रैल 2026 को खत्म हो गई।
अब यदि अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा बढ़ता है तो भारतीय कंपनियों, बैंकों और शिपिंग कंपनियों के लिए इस परियोजना में सक्रिय रहना मुश्किल हो सकता है।
भारत के सामने क्या हैं विकल्प?
रिपोर्टों के अनुसार भारत और ईरान कई वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार कर रहे हैं।
संभावित विकल्पों में शामिल हैं—
- ईरानी पोर्ट अथॉरिटी के साथ अस्थायी परिचालन व्यवस्था।
- प्रतिबंधों के अनुरूप संचालन मॉडल तैयार करना।
- भारत के निवेश और दीर्घकालिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत जारी रखना।
- भविष्य में प्रतिबंधों में राहत मिलने की स्थिति के लिए परिचालन संरचना बनाए रखना।
भारत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अस्थायी समाधान उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक भूमिका को कमजोर न कर दे।
पश्चिम एशिया का युद्ध बढ़ा रहा है जोखिम
ईरान के आसपास बढ़ते सैन्य तनाव और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इस परियोजना के जोखिम को और बढ़ा दिया है।
यदि क्षेत्र में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है तो समुद्री व्यापार, बीमा लागत, जहाजों की आवाजाही और निवेश संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर चाबहार पोर्ट की व्यावसायिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
भारत की रणनीति क्या है?
भारत फिलहाल इस परियोजना से पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा है। सरकार की रणनीति संतुलित कूटनीति अपनाने की है, जिसमें एक ओर ईरान के साथ सहयोग जारी रखा जाएगा और दूसरी ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों को भी नुकसान नहीं पहुंचने दिया जाएगा।
भारत का प्रयास है कि प्रतिबंधों के जोखिम को कम करते हुए चाबहार पोर्ट में अपना निवेश, परिचालन अधिकार और क्षेत्रीय प्रभाव सुरक्षित रखा जाए।
निष्कर्ष
चाबहार पोर्ट भारत की विदेश नीति, व्यापारिक रणनीति और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट माना जाता है। अमेरिका के प्रतिबंध, ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने इसकी राह जरूर कठिन बना दी है, लेकिन भारत इस परियोजना को छोड़ने के बजाय कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर सभी विकल्पों पर काम कर रहा है। आने वाले महीनों में अमेरिका-ईरान संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा की स्थिति यह तय करेगी कि भारत अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट को कितनी मजबूती से आगे बढ़ा पाता है।


