नई दिल्ली: बायोकॉन की को-फाउंडर और एग्जीक्यूटिव चेयरपर्सन किरण मजूमदार-शॉ ने अपनी जिंदगी का एक बेहद भावुक किस्सा साझा किया है। उन्होंने बताया कि कैंसर से अपनी सबसे करीबी दोस्त को खोने का दर्द ही वह वजह बना, जिसने उन्हें कैंसर की महंगी दवाओं को सस्ता और आम मरीजों की पहुंच में लाने के मिशन पर काम करने के लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि जब उन्होंने देखा कि आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति भी कैंसर के इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी संपत्ति बेचने को मजबूर हो गया, तब उन्होंने तय किया कि इस व्यवस्था को बदलना होगा।
राज शमानी के पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान किरण मजूमदार-शॉ ने बताया कि यही घटना आगे चलकर बायोकॉन के कैंसर बायोसिमिलर कार्यक्रम की नींव बनी और कंपनी ने दुनिया भर के लाखों मरीजों तक कम लागत वाली जीवनरक्षक दवाएं पहुंचाने का लक्ष्य तय किया।
दोस्त की मौत ने बदल दी सोच

किरण मजूमदार-शॉ ने बताया कि उनकी सबसे अच्छी दोस्त कैंसर से जूझ रही थीं और उन्हें इलाज के लिए नई बायोलॉजिक थेरेपी की जरूरत थी। उस समय हर डोज की कीमत करीब 2.5 लाख रुपये थी।
उन्होंने कहा कि उनकी दोस्त एक सफल और आर्थिक रूप से मजबूत प्रोफेशनल थीं, लेकिन इलाज इतना महंगा था कि उन्हें भी अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी। इसके बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
मजूमदार-शॉ ने कहा कि इस घटना ने उनके मन में कई सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने सोचना शुरू किया कि आखिर जीवन बचाने वाली दवाएं इतनी महंगी क्यों हैं और क्या इन्हें कम कीमत पर उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।
‘क्या दवाओं को सस्ता नहीं बनाया जा सकता?’
उन्होंने कहा कि दोस्त की मौत के बाद उनके मन में बार-बार यही सवाल उठता था कि आखिर मरीजों को इलाज के लिए इतनी बड़ी कीमत क्यों चुकानी पड़ती है।
उनके मुताबिक, यदि विज्ञान इतनी उन्नत दवाएं विकसित कर सकता है तो तकनीक के जरिए इन्हें अधिक किफायती बनाना भी संभव होना चाहिए। यही सोच आगे चलकर बायोकॉन की रिसर्च रणनीति का आधार बनी।
इंसुलिन से मिला आत्मविश्वास
किरण मजूमदार-शॉ ने बताया कि बायोकॉन पहले ही इंसुलिन को अधिक किफायती बनाने में सफलता हासिल कर चुकी थी। इसी अनुभव ने उन्हें भरोसा दिलाया कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी बायोलॉजिक दवाओं के सस्ते विकल्प भी विकसित किए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि इंसुलिन को दुनिया भर के मरीजों तक कम लागत में पहुंचाया जा सकता है, तो अन्य जटिल दवाओं के साथ भी यही मॉडल अपनाया जाना चाहिए।
क्या होते हैं बायोसिमिलर?
किरण मजूमदार-शॉ ने समझाया कि बायोसिमिलर ऐसी दवाएं होती हैं जो मूल (Original) बायोलॉजिक दवाओं के बेहद समान होती हैं। इनकी सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावशीलता मूल दवा के बराबर होती है, लेकिन इन्हें कम लागत पर विकसित किया जा सकता है।
बायोलॉजिक दवाएं जीवित कोशिकाओं या प्रोटीन आधारित तकनीक से तैयार की जाती हैं। इनमें मोनोक्लोनल एंटीबॉडी जैसी आधुनिक दवाएं शामिल होती हैं, जिनका उपयोग कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जाता है।
उन्होंने बताया कि पहले इन दवाओं को विकसित करना बेहद जटिल और महंगा माना जाता था, इसलिए इनकी कीमत भी बहुत अधिक होती थी।
वैज्ञानिकों को दिया बड़ा लक्ष्य
किरण मजूमदार-शॉ ने बताया कि उन्होंने अपने वैज्ञानिकों से कहा कि जिस ब्रेस्ट कैंसर की दवा उनकी दोस्त को चाहिए थी, उसी का बायोसिमिलर विकसित करने की कोशिश की जाए।
उस समय बायोसिमिलर दवाओं के लिए स्पष्ट नियामकीय (Regulatory) ढांचा भी मौजूद नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी टीम से विज्ञान पर भरोसा रखते हुए रिसर्च जारी रखने को कहा।
उनका मानना था कि यदि वैज्ञानिक मानकों का पूरी तरह पालन किया जाएगा तो भविष्य में नियामकीय प्रक्रियाएं भी उसी दिशा में विकसित होंगी। बाद में यह विश्वास सही साबित हुआ।
2017 में मिली ऐतिहासिक सफलता
लगातार रिसर्च के बाद बायोकॉन ने वैश्विक स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की। किरण मजूमदार-शॉ ने बताया कि कंपनी को 2017 में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) से ट्रैस्टुज़ुमैब (Trastuzumab) बायोसिमिलर के लिए मंजूरी मिली।
यह दवा HER2-पॉजिटिव ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाती है। बायोकॉन की यह उपलब्धि इसलिए भी खास थी क्योंकि यह दुनिया के बायोसिमिलर उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई।
लाखों मरीजों को मिला फायदा
किरण मजूमदार-शॉ के अनुसार, इस सफलता ने साबित कर दिया कि जटिल बायोलॉजिक दवाओं के कम लागत वाले विकल्प भी गुणवत्ता और सुरक्षा के सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि बायोकॉन का उद्देश्य केवल दवाएं बनाना नहीं, बल्कि जीवनरक्षक इलाज को अधिक से अधिक मरीजों की पहुंच में लाना है। आज कंपनी के बायोसिमिलर उत्पाद दुनिया के कई देशों में उपलब्ध हैं और लाखों मरीज इनका लाभ उठा रहे हैं।
इलाज की बढ़ती लागत पर दिया बड़ा संदेश
किरण मजूमदार-शॉ ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे बड़ी चुनौती इलाज की बढ़ती लागत है। उनका मानना है कि यदि विज्ञान और नवाचार का सही उपयोग किया जाए तो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज भी अधिक सुलभ और किफायती बनाया जा सकता है।


