महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए पूछा है कि आखिर 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को लागू करने में इतनी देरी क्यों की गई।
बेंगलुरु में दिए गए अपने बयान में खड़गे ने न सिर्फ देरी पर सवाल उठाए, बल्कि यह भी आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन (Delimitation) जैसे अलग-अलग मुद्दों को मिलाकर “गलत नैरेटिव” बनाने की कोशिश कर रही है।
विवाद की जड़: महिला आरक्षण बनाम परिसीमन
पूरे विवाद का केंद्र दो अलग-अलग लेकिन आपस में जोड़े जा रहे मुद्दे हैं:
- महिला आरक्षण कानून (2023)
- परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill)
खड़गे का कहना है कि:
महिला आरक्षण बिल 2023 में सर्वसम्मति से पास हो चुका है, लेकिन उसकी वास्तविक लागू करने की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई।
वहीं, हाल ही में पेश किए गए संविधान संशोधन और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को विपक्ष ने अलग मुद्दा बताते हुए विरोध किया।
खड़गे का सीधा सवाल: “क्यों रखा गया ठंडे बस्ते में?”
मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा:
“जब 2023 में बिल पास हो गया था, तो उसे 30 महीने तक ठंडे बस्ते में क्यों रखा गया? नोटिफिकेशन में देरी क्यों हुई?”
उनका आरोप है कि:
- सरकार ने समय पर कानून को लागू नहीं किया
- और बाद में इसे राजनीतिक तरीके से पेश किया
यह सवाल सीधे तौर पर सरकार की मंशा और प्राथमिकताओं पर उठता है।
“गलत प्रचार” का आरोप
खड़गे ने यह भी कहा कि:
- प्रधानमंत्री विपक्ष को “महिला विरोधी” बताने की कोशिश कर रहे हैं
- जबकि वास्तविकता इससे अलग है
उनके अनुसार:
विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह इसे परिसीमन से जोड़ने का विरोध कर रहा है।
यह बयान राजनीतिक रूप से अहम है, क्योंकि महिला वोट बैंक इस चुनाव में निर्णायक माना जा रहा है।
संसद में क्या हुआ?
हाल ही में संसद के विशेष सत्र (16–18 अप्रैल) के दौरान:
- महिला आरक्षण और उससे जुड़े विधेयकों पर चर्चा हुई
- कई प्रमुख नेताओं ने इसमें हिस्सा लिया
इनमें अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी और के.सी. वेणुगोपाल शामिल थे।
अंततः:
131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पास नहीं हो सका
विपक्षी दलों ने परिसीमन से जुड़े प्रावधानों का विरोध किया
इतिहास की बात: 2010 से 2023 तक
खड़गे ने अपने बयान में इस मुद्दे के इतिहास को भी याद दिलाया:
- 2010 में भी महिला आरक्षण बिल लाया गया था
- लेकिन वह लोकसभा में पास नहीं हो पाया
- 2023 में इसे दोबारा लाया गया और सर्वसम्मति से पारित किया गया
इससे यह स्पष्ट होता है कि:
महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है
लेकिन इसका क्रियान्वयन लगातार टलता रहा है
कांग्रेस का तर्क: “हमने हमेशा समर्थन किया”
खड़गे ने कांग्रेस के इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि:
- पार्टी ने हमेशा महिलाओं को नेतृत्व में आगे रखा
- सरोजिनी नायडू पहली महिला कांग्रेस अध्यक्ष थीं
- इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी जैसे उदाहरण मौजूद हैं
यह तर्क राजनीतिक रूप से यह दिखाने के लिए है कि कांग्रेस खुद को “प्रो-वुमन” पार्टी के रूप में पेश करना चाहती है।
सरकार का पक्ष क्या हो सकता है?
हालांकि इस बयान में सरकार की प्रतिक्रिया शामिल नहीं है, लेकिन आमतौर पर सरकार का तर्क रहा है कि:
- महिला आरक्षण लागू करने के लिए
- जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया जरूरी है
यानी:
सीटों का पुनर्निर्धारण पहले होगा
उसके बाद आरक्षण लागू होगा
यही बिंदु सरकार और विपक्ष के बीच सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है।
राजनीतिक असर: चुनाव से पहले बड़ा मुद्दा
यह विवाद ऐसे समय पर सामने आया है जब:
- कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं
- महिला मतदाता एक अहम वोट बैंक बन चुके हैं
ऐसे में:
- दोनों पक्ष इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से पेश कर रहे हैं
- और इसे चुनावी नैरेटिव में बदलने की कोशिश कर रहे हैं
असली सवाल: महिलाओं को कब मिलेगा प्रतिनिधित्व?
इस पूरे विवाद के बीच सबसे अहम सवाल यही है:
क्या महिला आरक्षण वास्तव में जल्द लागू होगा?
या यह मुद्दा फिर से राजनीतिक बहस तक ही सीमित रह जाएगा?
अगर इसे जल्द लागू नहीं किया गया, तो:
- महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ने में और देरी हो सकती है
निष्कर्ष: राजनीति बनाम नीति
महिला आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ एक कानून नहीं रहा—यह राजनीति और नीति के बीच टकराव का प्रतीक बन चुका है।
एक तरफ सरकार है, जो इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की बात कर रही है।
दूसरी तरफ विपक्ष है, जो देरी और प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि:
- क्या इस मुद्दे पर कोई सहमति बनती है
- या यह चुनावी राजनीति का हिस्सा बनकर रह जाता है
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