भारत-यूके की नई पहल से वैश्विक सप्लाई चेन पर रहेगी नजर, EV और क्लीन एनर्जी सेक्टर को मिलेगा बड़ा फायदा
नई दिल्ली। दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), बैटरी स्टोरेज, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। इन सभी तकनीकों की रीढ़ माने जाने वाले क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा भी लगातार बढ़ रही है। लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिजों की मांग आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ने का अनुमान है। ऐसे समय में भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नई दिल्ली में ‘क्रिटिकल मिनरल्स ग्लोबल सप्लाई चेन ऑब्जर्वेटरी’ (GSCO) को औपचारिक रूप से लॉन्च किया है।
इस पहल का उद्देश्य दुनिया भर में क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन की निगरानी करना, संभावित जोखिमों की पहचान करना और नीति निर्माताओं को बेहतर निर्णय लेने में मदद करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल चीन के उस मजबूत प्रभाव को चुनौती देने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है, जो वर्तमान में वैश्विक क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन पर काफी हद तक हावी है।
क्या है क्रिटिकल मिनरल्स ग्लोबल सप्लाई चेन ऑब्जर्वेटरी?
क्रिटिकल मिनरल्स ग्लोबल सप्लाई चेन ऑब्जर्वेटरी एक डेटा-आधारित और रिसर्च-केंद्रित प्लेटफॉर्म है, जिसे भारत और ब्रिटेन के सहयोग से विकसित किया गया है। इसका मुख्य काम दुनिया भर में जरूरी खनिजों की उपलब्धता, मांग, उत्पादन, व्यापार और आपूर्ति से जुड़े जोखिमों पर लगातार नजर रखना होगा।
इस प्लेटफॉर्म को भारत के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (ISM) धनबाद के TEXMiN और यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज ने मिलकर विकसित किया है। इसका उपयोग सरकारों, उद्योगों, निवेशकों और शोध संस्थानों द्वारा किया जा सकेगा ताकि वे सप्लाई चेन से जुड़े जोखिमों का पहले से आकलन कर सकें।
नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी और ब्रिटेन की गृह एवं विदेश मामलों से जुड़ी वरिष्ठ मंत्री यवेट कूपर ने इस पहल को औपचारिक रूप से लॉन्च किया।
आखिर क्रिटिकल मिनरल्स इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?
क्रिटिकल मिनरल्स वे खनिज हैं जो आधुनिक तकनीक और औद्योगिक विकास के लिए बेहद आवश्यक माने जाते हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों, सोलर पैनल, विंड टर्बाइन, मोबाइल फोन, कंप्यूटर चिप्स, रक्षा उपकरणों और उन्नत मैन्युफैक्चरिंग में किया जाता है।
उदाहरण के लिए लिथियम और कोबाल्ट इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के प्रमुख घटक हैं, जबकि रेयर अर्थ एलिमेंट्स का इस्तेमाल हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरणों में होता है। जैसे-जैसे दुनिया कार्बन उत्सर्जन कम करने और ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ रही है, इन खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की रिपोर्टों के अनुसार, ऊर्जा परिवर्तन से जुड़े खनिजों की वैश्विक मांग आने वाले दशकों में कई गुना बढ़ सकती है। यही कारण है कि देशों के बीच इन संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करने की होड़ बढ़ रही है।
क्रिटिकल मिनरल्स पर चीन का दबदबा कितना बड़ा है?
वैश्विक स्तर पर क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग क्षमता का बड़ा हिस्सा चीन के नियंत्रण में है। कई महत्वपूर्ण खनिजों के शोधन और प्रसंस्करण में चीन की हिस्सेदारी दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है।
विशेष रूप से लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की प्रोसेसिंग में चीन की मजबूत मौजूदगी है। इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी सप्लाई चेन में भी चीन अग्रणी भूमिका निभाता है। यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक तनाव और व्यापारिक प्रतिबंधों ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता वैश्विक उद्योगों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। भारत और ब्रिटेन की नई पहल इसी चुनौती का समाधान तलाशने की दिशा में एक प्रयास मानी जा रही है।
यह ऑब्जर्वेटरी कैसे करेगी काम?
खान मंत्रालय के अनुसार यह प्लेटफॉर्म रियल टाइम डेटा, बाजार संकेतकों और वैश्विक व्यापारिक गतिविधियों का विश्लेषण करेगा। इसके माध्यम से विभिन्न देशों में खनिज उत्पादन, निर्यात, आयात, कीमतों में उतार-चढ़ाव और संभावित सप्लाई व्यवधानों की जानकारी जुटाई जाएगी।
यदि किसी क्षेत्र में राजनीतिक अस्थिरता, निर्यात प्रतिबंध या उत्पादन में कमी जैसी स्थिति पैदा होती है तो यह प्लेटफॉर्म संभावित जोखिमों की पहचान करने में मदद करेगा। इससे सरकारें और उद्योग समय रहते वैकल्पिक रणनीति तैयार कर सकेंगे।
इसके अलावा यह प्लेटफॉर्म निवेशकों और नीति निर्माताओं को यह समझने में भी मदद करेगा कि भविष्य में किन खनिजों की मांग बढ़ सकती है और किन क्षेत्रों में निवेश के अवसर मौजूद हैं।
भारत को इससे क्या फायदा होगा?
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है और आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तथा ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में बड़े निवेश की तैयारी कर रहा है। ऐसे में क्रिटिकल मिनरल्स की सुरक्षित और स्थिर आपूर्ति देश के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
इस ऑब्जर्वेटरी के माध्यम से भारत को वैश्विक सप्लाई चेन की बेहतर समझ मिलेगी। इससे घरेलू उद्योगों को समय पर आवश्यक कच्चा माल उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। साथ ही बैटरी निर्माण, इलेक्ट्रिक वाहन उत्पादन, सोलर उपकरण निर्माण और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी लाभ मिलने की संभावना है।
इसके अलावा भारत विदेशी खनिज संपत्तियों में निवेश और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को लेकर भी अधिक सटीक रणनीति तैयार कर सकेगा। इससे आयात पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने में सहायता मिलेगी।
नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन से कैसे जुड़ी है यह पहल?
भारत सरकार ने हाल के वर्षों में क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र को प्राथमिकता देना शुरू किया है। इसी दिशा में नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) की शुरुआत की गई है।
इस मिशन का उद्देश्य देश में महत्वपूर्ण खनिजों की खोज, खनन, प्रसंस्करण और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाना है। इसके तहत विदेशों में खनिज संपत्तियों में निवेश, घरेलू संसाधनों की पहचान और रणनीतिक भंडारण क्षमता विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
नई ऑब्जर्वेटरी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। इससे भारत को वैश्विक बाजार की बेहतर जानकारी मिलेगी और राष्ट्रीय स्तर पर बनाई जा रही नीतियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
भारत-यूके साझेदारी क्यों है खास?
भारत और ब्रिटेन के बीच तकनीकी सहयोग लगातार बढ़ रहा है। दोनों देशों ने टेक्नोलॉजी सिक्योरिटी, रिसर्च, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में कई कदम उठाए हैं।
क्रिटिकल मिनरल्स ऑब्जर्वेटरी इसी सहयोग का नया अध्याय है। यह पहल दोनों देशों को डेटा साझा करने, रिसर्च करने और सप्लाई चेन से जुड़े जोखिमों को समझने में मदद करेगी।
अक्टूबर 2025 में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच हुई बातचीत के दौरान इस परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई थी। इसके बाद मार्च 2026 में रिसर्च सहयोग समझौते के जरिए इसे औपचारिक रूप दिया गया।
भविष्य में क्यों बढ़ेगा इसका महत्व?
दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार लगातार हो रहा है। इसके साथ ही लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ मिनरल्स की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशक में इन संसाधनों को लेकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।
ऐसे माहौल में जो देश अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित और विविधीकृत बनाने में सफल होंगे, उन्हें आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर लाभ मिलेगा। भारत और ब्रिटेन की यह नई पहल उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
निष्कर्ष
क्रिटिकल मिनरल्स ग्लोबल सप्लाई चेन ऑब्जर्वेटरी का लॉन्च केवल एक रिसर्च प्लेटफॉर्म की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह भविष्य की ऊर्जा, तकनीक और औद्योगिक सुरक्षा से जुड़ी बड़ी रणनीति का हिस्सा है। भारत और ब्रिटेन की यह साझेदारी वैश्विक खनिज आपूर्ति श्रृंखला को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और टिकाऊ बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। साथ ही यह भारत को क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने और चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी मदद करेगी।


