नई दिल्ली: भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) अब लागू हो चुका है। इस ऐतिहासिक व्यापार समझौते से दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। खासतौर पर ब्रिटेन से आने वाली प्रीमियम व्हिस्की, लग्जरी कारें, कॉस्मेटिक्स, स्किनकेयर, वॉच और वेलनेस प्रोडक्ट्स भारतीय बाजार में अधिक उपलब्ध होंगे। हालांकि, यदि आप यह सोच रहे हैं कि इन सामानों की कीमतें तुरंत कम हो जाएंगी, तो ऐसा फिलहाल होने वाला नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि टैक्स में राहत मिलने के बावजूद रुपये की कमजोरी, महंगी लॉजिस्टिक्स और वैश्विक परिस्थितियां फिलहाल कीमतों को नीचे आने से रोक रही हैं। ऐसे में ग्राहकों को सस्ते विदेशी सामान का पूरा फायदा मिलने में अभी कुछ समय लग सकता है।
CETA लागू होने से भारतीय बाजार में बढ़ेगी विदेशी ब्रांड्स की मौजूदगी
भारत-यूके व्यापार समझौते के लागू होने के बाद कई ब्रिटिश कंपनियां भारतीय बाजार में प्रवेश की तैयारी कर रही हैं। रिटेल और लाइफस्टाइल सेक्टर से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, अब भारत विदेशी ब्रांड्स के लिए पहले से कहीं अधिक आकर्षक बाजार बन गया है।
कॉस्मेटिक्स, स्किनकेयर, फैशन, लग्जरी घड़ियां और वेलनेस से जुड़े कई नए ब्रिटिश ब्रांड अगले कुछ महीनों में भारतीय ग्राहकों तक पहुंच सकते हैं। इससे उपभोक्ताओं के पास पहले की तुलना में अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे।
फिर भी अभी क्यों नहीं घटेंगे दाम?
हालांकि इस समझौते के तहत कई उत्पादों पर आयात शुल्क (Import Duty) में कमी की गई है, लेकिन कंपनियां फिलहाल इसका पूरा लाभ ग्राहकों तक नहीं पहुंचा पा रही हैं।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह रुपये का कमजोर होना है। पिछले एक वर्ष में ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले भारतीय रुपया करीब 12% तक कमजोर हुआ है। इससे ब्रिटेन से सामान खरीदने की लागत पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है।
यानी कंपनियों को जितनी राहत आयात शुल्क में मिल रही है, उससे कहीं अधिक अतिरिक्त खर्च उन्हें मुद्रा विनिमय दर (Exchange Rate) के कारण उठाना पड़ रहा है।
युद्ध और महंगी लॉजिस्टिक्स भी बनी बड़ी चुनौती
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध का असर वैश्विक सप्लाई चेन पर भी दिखाई दे रहा है। समुद्री मार्गों में देरी और जोखिम बढ़ने के कारण कई कंपनियों को महंगे हवाई परिवहन का सहारा लेना पड़ रहा है।
इससे फ्रेट चार्ज, बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत में काफी बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में आयात शुल्क में मिलने वाली राहत का बड़ा हिस्सा परिवहन लागत में ही खर्च हो जा रहा है।
कुछ कैटेगरी में मिल सकती है राहत
ब्रिटिश कॉस्मेटिक ब्रांड Lush ने फिलहाल भारत में कीमतें बढ़ाने का फैसला टाल दिया है।
भारत में कंपनी के पार्टनर बिलबेरी ब्रैंड्स के सीईओ विशाल आनंद के अनुसार, जिन उत्पादों पर आयात शुल्क में सबसे अधिक राहत मिली है, वहां ग्राहकों को कीमतों में कुछ कमी देखने को मिल सकती है। इनमें प्रमुख रूप से—
- शॉवर जेल
- साबुन
- कुछ पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स
शामिल हैं।
हालांकि सभी प्रोडक्ट्स पर कीमत घटाना फिलहाल संभव नहीं है।
अगले 6 से 9 महीनों में आएंगे नए ब्रिटिश ब्रांड
ब्यूटी और वेलनेस प्लेटफॉर्म Kindlife फिलहाल ब्रिटेन के 12 से अधिक स्किनकेयर और वेलनेस ब्रांड्स के साथ काम कर रहा है। कंपनी के अनुसार ये ब्रांड अगले 6 से 9 महीनों के भीतर भारतीय बाजार में लॉन्च हो सकते हैं।
इनमें से अधिकांश उत्पादों की कीमत 700 रुपये से 1,500 रुपये के बीच रहने की संभावना है। कंपनी का मानना है कि अब विदेशी ब्रांड भारत को केवल संभावित बाजार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक निवेश के अवसर के रूप में देख रहे हैं।
लग्जरी वॉच और प्रीमियम प्रोडक्ट्स को मिलेगा फायदा
लग्जरी रिटेल सेक्टर के जानकारों का मानना है कि CETA लागू होने के बाद कई ब्रिटिश वॉच ब्रांड भी भारतीय बाजार में प्रवेश कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले वर्षों में भारतीय ग्राहकों को प्रीमियम और लग्जरी सेगमेंट में अधिक विकल्प मिलने के साथ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी, जिसका लाभ अंततः उपभोक्ताओं को मिलेगा।
लंबी अवधि में मिलेगा सबसे बड़ा फायदा
विशेषज्ञों का कहना है कि CETA का सबसे बड़ा लाभ धीरे-धीरे दिखाई देगा। जैसे-जैसे आयात शुल्क चरणबद्ध तरीके से और कम होंगे तथा वैश्विक सप्लाई चेन सामान्य होगी, विदेशी सामानों की कीमतों में वास्तविक कमी देखने को मिल सकती है।
यदि रुपये में स्थिरता आती है और लॉजिस्टिक्स लागत घटती है, तो आने वाले वर्षों में ब्रिटेन से आने वाले कई उत्पाद भारतीय ग्राहकों के लिए पहले से अधिक किफायती हो सकते हैं।
निष्कर्ष
भारत-यूके CETA व्यापार समझौता भारतीय उपभोक्ताओं और कारोबार दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर लेकर आया है। इससे विदेशी ब्रांड्स की भारत में मौजूदगी बढ़ेगी और बाजार में प्रतिस्पर्धा तेज होगी। हालांकि, रुपये की कमजोरी, वैश्विक युद्ध और बढ़ी हुई लॉजिस्टिक्स लागत के कारण फिलहाल ग्राहकों को कीमतों में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। वास्तविक फायदा तब मिलेगा जब आयात शुल्क में और कमी आएगी तथा वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां सामान्य होंगी।


