India Sugar Policy: भारत की चीनी नीति में अचानक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कुछ महीने पहले तक सरकार जहां बंपर उत्पादन की उम्मीद के चलते चीनी के निर्यात को मंजूरी दे रही थी, वहीं अब घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों को काबू करने के लिए आयात का सहारा लेना पड़ रहा है। सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है।
यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि नवंबर 2025 में सरकार ने 2025-26 सीजन में बेहतर उत्पादन की उम्मीद के आधार पर पहले 15 लाख टन चीनी के निर्यात को मंजूरी दी थी। बाद में इसमें 5 लाख टन की और बढ़ोतरी कर कुल निर्यात सीमा 20 लाख टन कर दी गई। लेकिन घरेलू स्टॉक तेजी से घटने के बाद करीब 8 लाख टन चीनी के निर्यात के पश्चात सरकार को निर्यात पर रोक लगानी पड़ी।
अब सवाल यह है कि आखिर चीनी की गणित में गलती कहां हुई? क्या सरकार और इंडस्ट्री के शुरुआती उत्पादन अनुमान जरूरत से ज्यादा आशावादी थे? और क्या समय रहते चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज किया गया?
साल की शुरुआत में ही दिखने लगे थे खतरे के संकेत
चीनी उद्योग से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, 2026 की शुरुआत में ही घरेलू बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता के संकेत दिखाई देने लगे थे। उस समय तक गन्ने की पेराई का सीजन काफी आगे बढ़ चुका था और उत्पादन की वास्तविक तस्वीर सामने आने लगी थी।
इसके बावजूद फरवरी 2026 में सरकार ने पहले से मंजूर 15 लाख टन के अलावा 5 लाख टन अतिरिक्त चीनी निर्यात की अनुमति दे दी।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि मार्च तक स्थिति और स्पष्ट हो गई थी। कई चीनी मिलों को अपने मासिक घरेलू बिक्री कोटे को पूरा करने में परेशानी आने लगी थी। इसी दौरान घरेलू बाजार में कीमतों ने धीरे-धीरे बढ़ना शुरू किया।
जानकारों के मुताबिक, उस समय बढ़ती कीमतों और मिलों की सप्लाई संबंधी दिक्कतों को शुरुआती चेतावनी के तौर पर देखा जाना चाहिए था। लेकिन नीति स्तर पर इसका असर देर से दिखाई दिया।
दो महीने में करीब 40 फीसदी महंगी हुई चीनी
घरेलू बाजार में पिछले करीब दो महीनों में चीनी की कीमतों में लगभग 40 फीसदी की तेजी आई है। बाजार अनुमानों के अनुसार महाराष्ट्र समेत कई प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में एक्स-मिल कीमतें करीब 5,400-5,560 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं।
ग्रेड के हिसाब से कीमतें और ज्यादा हैं। S-ग्रेड चीनी करीब 5,750 रुपये और M-ग्रेड करीब 5,850-5,900 रुपये प्रति क्विंटल बताई जा रही है। इन कीमतों में GST शामिल नहीं है।
कीमतों में इस तेज उछाल ने सरकार के सामने त्योहारों से पहले घरेलू सप्लाई को पर्याप्त बनाए रखने की चुनौती खड़ी कर दी है। इसी वजह से सरकार को करीब एक दशक बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति देनी पड़ी।
उत्पादन के शुरुआती अनुमान में बड़ी चूक?
चीनी बाजार की मौजूदा स्थिति का सबसे बड़ा सवाल उत्पादन के अनुमानों पर उठ रहा है।
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने 31 जुलाई 2025 को 2025-26 शुगर सीजन के लिए भारत में चीनी उत्पादन करीब 3.49 करोड़ टन रहने का शुरुआती अनुमान लगाया था।
लेकिन बाद में तस्वीर काफी बदल गई। ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) ने 6 मार्च 2026 को अपने नेट चीनी उत्पादन अनुमान को घटाकर करीब 2.83 करोड़ टन कर दिया। यानी शुरुआती अनुमान और बाद के आकलन में बड़ा अंतर सामने आया।
पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन के मुताबिक, उत्पादन के अनुमान में इतना बड़ा अंतर इस बात पर सवाल खड़ा करता है कि मौजूदा एग्री-टेक और डेटा सिस्टम फसल का सही अनुमान लगाने में कितने सक्षम हैं।
उद्योग के कुछ जानकार तो वास्तविक उत्पादन को 2.8 करोड़ टन से भी कम मान रहे हैं। इसके अलावा करीब 30 लाख टन सुक्रोज का इस्तेमाल इथेनॉल और दूसरे उद्देश्यों के लिए किया गया।
इसका सीधा असर घरेलू चीनी के उपलब्ध स्टॉक पर पड़ा।
पिछले सीजन में भी दिखी थी ऐसी ही तस्वीर
मौजूदा सीजन में उत्पादन अनुमान का अंतर कोई बिल्कुल नई समस्या नहीं है। 2024-25 शुगर सीजन में भी शुरुआती अनुमान और वास्तविक आंकड़ों में बड़ा अंतर देखने को मिला था।
शुरुआत में कुल चीनी उत्पादन करीब 3.33 करोड़ टन रहने का अनुमान लगाया गया था। इस अनुमान के आधार पर क्लोजिंग स्टॉक 85 लाख टन से ज्यादा रहने की उम्मीद थी।
लेकिन वास्तविक उत्पादन करीब 2.95 करोड़ टन रहा और क्लोजिंग स्टॉक लगभग 55 लाख टन पर आ गया।
उस समय कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक ने बाजार को संभाल लिया था। इसलिए कीमतों पर मौजूदा सीजन जैसा दबाव नहीं आया। लेकिन इस बार शुरुआती स्टॉक और उत्पादन दोनों ही अपेक्षाकृत कम रहे, जिससे सप्लाई का संतुलन बिगड़ गया।
चीनी का पूरा बैलेंस कैसे बिगड़ा?
इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक 2025-26 सीजन में इथेनॉल के लिए करीब 24 लाख टन चीनी अलग करने के बाद नेट उत्पादन लगभग 2.79 करोड़ टन रह सकता है।
सीजन की शुरुआत में करीब 47 लाख टन का ओपनिंग स्टॉक था। इस तरह कुल उपलब्धता लगभग 3.26 करोड़ टन बैठती थी।
देश में घरेलू चीनी खपत करीब 2.8 करोड़ टन मानी जाए तो शुरुआत में यह बैलेंस बहुत चिंताजनक नहीं दिख रहा था। लेकिन निर्यात और वास्तविक उत्पादन में कमी के बाद तस्वीर तेजी से बदल गई।
करीब 8 लाख टन चीनी के निर्यात के बाद कुछ अनुमानों के मुताबिक घरेलू स्टॉक घटकर 35-39 लाख टन के आसपास रह गया। यह सरकार के करीब 60 लाख टन के नॉर्मेटिव बफर स्टॉक से काफी नीचे है। नॉर्मेटिव बफर को लगभग तीन महीने की घरेलू खपत के बराबर माना जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि अब सरकार ने जितनी कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी है, उसकी मात्रा लगभग उतनी ही है जितनी पहले निर्यात की जा चुकी है।
क्या सिर्फ गलत अनुमान जिम्मेदार हैं?
इस सवाल पर चीनी उद्योग में पूरी तरह एक राय नहीं है।
केयरएज रेटिंग्स की डायरेक्टर रवलीन कौर सेठी के मुताबिक, इस सीजन में शुरुआती उत्पादन अनुमान जरूरत से ज्यादा आशावादी थे। बेहतर उत्पादन की उम्मीद ने सरकार को ज्यादा एक्सपोर्ट की अनुमति देने के लिए प्रोत्साहित किया।
उनके अनुसार, अगर शुरुआत में ही ज्यादा सटीक उत्पादन अनुमान उपलब्ध होते तो निर्यात की मात्रा पर अलग फैसला लिया जा सकता था और आज जैसी स्थिति से बचने की संभावना थी।
हालांकि, ISMA के डायरेक्टर जनरल दीपक बल्लानी इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि सिर्फ ISMA ही नहीं बल्कि लगभग पूरी इंडस्ट्री और सरकार को भी बेहतर उत्पादन की उम्मीद थी। महाराष्ट्र में मौसम के असर का अनुमान पहले से लगाना आसान नहीं था।
उनके मुताबिक मौजूदा स्थिति को केवल गलत शुरुआती अनुमान के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।
इंडस्ट्री का एक वर्ग मानता है कि अभी कमी नहीं
ISMA का कहना है कि मौजूदा स्थिति को लेकर बाजार में जरूरत से ज्यादा घबराहट है।
बल्लानी के मुताबिक क्लोजिंग स्टॉक करीब 35-40 लाख टन रह सकता है। उनके अनुसार यह स्टॉक अक्टूबर और नवंबर के शुरुआती हिस्से तक बाजार की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त हो सकता है, क्योंकि आमतौर पर नई पेराई अक्टूबर के तीसरे या चौथे सप्ताह में शुरू हो जाती है।
उनका मानना है कि फिलहाल कीमतों में तेजी का एक बड़ा कारण सट्टेबाजी और घबराहट में की जा रही खरीदारी है।
त्योहारों के नजदीक आने के कारण कुछ बड़े खरीदार सामान्य 10-15 दिनों के बजाय करीब दो महीने की जरूरत का स्टॉक जमा करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा और कम दिखाई देती है और कीमतों पर दबाव बढ़ता है।
इसके अलावा अगले सीजन की फसल पर कमजोर मॉनसून और संभावित अल-नीनो प्रभाव की चिंता भी बाजार के सेंटीमेंट को प्रभावित कर रही है। हालांकि, अभी तक अगली फसल को बड़े नुकसान का स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है।
सरकार ने स्टॉक लिमिट भी सख्त की
बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने केवल आयात का रास्ता नहीं चुना, बल्कि जमाखोरी और जरूरत से ज्यादा स्टॉक रखने पर भी लगाम लगाने की कोशिश की है।
सरकार ने ‘चीनी (बल्क कंज्यूमर्स के लिए स्टॉक रखने की सीमा) आदेश, 2026’ जारी किया है। इसके तहत ऐसे बल्क कंज्यूमर्स जो कच्चे माल के रूप में हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी का इस्तेमाल करते हैं, वे अधिकतम 15 दिनों की खपत के बराबर स्टॉक रख सकेंगे।
यह नियम 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक लागू रहेगा।
सरकार ने मिलों को यह भी निर्देश दिया है कि बिक्री के सात दिनों के भीतर चीनी की डिलीवरी की जाए। इसका उद्देश्य ऐसे लेनदेन को रोकना है जिनमें कागज पर बिक्री दर्ज हो जाए लेकिन वास्तविक चीनी लंबे समय तक खरीदार तक न पहुंचे।
क्या भारत की चीनी नीति में आया यू-टर्न?
मौजूदा घटनाक्रम को देखें तो भारत की चीनी नीति में स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। कुछ महीने पहले प्राथमिकता अतिरिक्त उत्पादन को निर्यात करने की थी, जबकि अब सरकार की प्राथमिकता घरेलू कीमतों और उपलब्धता को नियंत्रित करना बन गई है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक अहम सबक भी निकलता है। कृषि जिंसों में केवल शुरुआती उत्पादन अनुमान के आधार पर निर्यात नीति बनाना जोखिम भरा हो सकता है। मौसम, गन्ने की पैदावार, इथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल, घरेलू खपत और वास्तविक मिल स्टॉक जैसे आंकड़ों को लगातार अपडेट करना जरूरी है।
अगर उत्पादन के शुरुआती अनुमान वास्तविक स्थिति से काफी ज्यादा हों, तो निर्यात की अनुमति घरेलू बफर को तेजी से कम कर सकती है। और जब कमी का एहसास होता है, तब तक कीमतों को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
भारत के लिए मौजूदा चीनी संकट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले महीनों में त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने की संभावना है। सरकार का 10 लाख टन ड्यूटी-फ्री आयात, स्टॉक लिमिट और मिलों से तेज सप्लाई के निर्देश बाजार में दबाव कम करने की कोशिश हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि नई फसल आने तक घरेलू स्टॉक कितना टिकता है और अगले सीजन का उत्पादन अनुमान कितना सटीक साबित होता है। अगर उत्पादन और स्टॉक के आंकड़ों में फिर बड़ा अंतर आया, तो चीनी बाजार में कीमतों और सरकारी नीति—दोनों में अस्थिरता बनी रह सकती है।


