नई दिल्ली। रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements) की वैश्विक सप्लाई पर लंबे समय से चीन का दबदबा रहा है। इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा उपकरण, सेमीकंडक्टर और हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में इन खनिजों की बढ़ती मांग के बीच भारत अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। इसी कड़ी में भारत रूस के विशाल रेयर अर्थ भंडारों का अध्ययन करने की तैयारी कर रहा है।
भारत और रूस के बीच चल रही इस संभावित साझेदारी को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भारत को रेयर अर्थ खनिजों के नए स्रोत मिल सकते हैं और भविष्य में सप्लाई चेन से जुड़े जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।
रूस की दिग्गज कंपनी रोसनेफ्ट से चल रही बातचीत
सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत रूस की प्रमुख ऊर्जा कंपनी रोसनेफ्ट (Rosneft) के साथ बातचीत कर रहा है। रोसनेफ्ट रूस की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी मानी जाती है और इसका बाजार पूंजीकरण करीब 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।
भारत की रुचि साइबेरिया में मौजूद रेयर अर्थ खनिजों के भंडार का अध्ययन करने में है। विशेष रूप से टॉमटोर (Tomtor) क्षेत्र को लेकर चर्चा हो रही है, जहां दुनिया के महत्वपूर्ण रेयर अर्थ संसाधनों में से एक मौजूद है। हाल ही में रोसनेफ्ट ने इस परियोजना में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है, जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई है।
चीन के निर्यात प्रतिबंधों के बाद बढ़ी चिंता
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने रेयर अर्थ से जुड़ी तकनीकों और कुछ उत्पादों के निर्यात नियमों को सख्त किया है। इसके कारण कई देशों के साथ भारत भी प्रभावित हुआ।
भारत के ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिक वाहन और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों को रेयर अर्थ मैग्नेट की उपलब्धता को लेकर चिंता का सामना करना पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस जैसे वैकल्पिक स्रोतों से सहयोग भारत को सप्लाई संकट से बचाने में मदद कर सकता है।
भारत-रूस शिखर सम्मेलन में बनी थी सहमति
दिसंबर में आयोजित भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों ने रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई थी। इसके बाद विभिन्न सरकारी और औद्योगिक स्तरों पर बातचीत तेज हुई है।
इस सहयोग का उद्देश्य केवल खनिजों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन तकनीकों में भी साझेदारी बढ़ाना है।
भारतीय कंपनियां भी कर रही हैं साझेदारी
मई महीने में रूस की परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम के वैज्ञानिक विभाग की इकाई JSC Giredmet और भारत की नेक्सन जियोकेम के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
इस समझौते का उद्देश्य रेयर अर्थ कच्चे माल की प्रोसेसिंग तकनीकों पर अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना है।
इसके अलावा Giredmet ने आईआईटी (ISM) धनबाद से जुड़े TEXMiN फाउंडेशन के साथ भी एक आशय पत्र (Letter of Intent) पर हस्ताक्षर किए हैं। दोनों पक्ष नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) आधारित स्थायी चुंबकों के निर्माण की तकनीक विकसित करने पर संयुक्त रूप से काम करेंगे।
भारत को क्या होगा फायदा?
यदि रूस के साथ यह सहयोग सफल रहता है तो भारत को कई बड़े लाभ मिल सकते हैं।
- रेयर अर्थ खनिजों के नए और विश्वसनीय स्रोत मिलेंगे।
- चीन पर निर्भरता कम होगी।
- इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को मजबूती मिलेगी।
- रक्षा और एयरोस्पेस सेक्टर को रणनीतिक लाभ मिलेगा।
- सेमीकंडक्टर और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा।
- भारत की महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा मजबूत होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में रेयर अर्थ खनिज वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी प्रतिस्पर्धा का अहम आधार बनेंगे। ऐसे में रूस के साथ भारत का यह कदम केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
(स्रोत: सरकारी सूत्र, भारत-रूस सहयोग संबंधी आधिकारिक जानकारी और उद्योग विशेषज्ञों के इनपुट)


