भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश की युवा आबादी को लंबे समय से भारत के लिए बड़ा डेमोग्राफिक डिविडेंड माना जाता रहा है। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या अर्थव्यवस्था इस बड़ी वर्कफोर्स के लिए पर्याप्त और बेहतर नौकरियां पैदा कर पा रही है? जाने-माने अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने भारत के रोजगार ढांचे को लेकर इसी चुनौती पर गंभीर चिंता जताई है।
मेहरोत्रा के मुताबिक, भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तेजी से बढ़ती कामकाजी आबादी के अनुपात में पर्याप्त रोजगार पैदा करने में सफल नहीं रहा है। दूसरी तरफ उद्योगों में ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले वर्षों में रोजगार पैदा करने की चुनौती और मुश्किल हो सकती है।
अर्थशास्त्री का मानना है कि भारत को रोजगार आधारित औद्योगिक विकास के लिए एक मजबूत और स्पष्ट मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी की जरूरत है। उनका सुझाव है कि भारत को उन करीब 100 देशों से सीखना चाहिए, जिन्होंने अपनी औद्योगिक नीति और मैन्युफैक्चरिंग रणनीति के जरिए रोजगार और उत्पादन दोनों को बढ़ावा दिया।
मैन्युफैक्चरिंग में नहीं बन पाईं पर्याप्त नौकरियां
बिजनेस टुडे के एक कार्यक्रम में वरिष्ठ अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा ने भारत के रोजगार संकट पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत के पास बड़ी युवा वर्कफोर्स है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर उतनी नौकरियां पैदा नहीं कर सका, जितनी जरूरत थी।
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में युवा हर साल रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। अगर उन्हें पर्याप्त गैर-कृषि और उत्पादक रोजगार नहीं मिलता है तो देश के डेमोग्राफिक डिविडेंड का पूरा फायदा उठाना मुश्किल हो सकता है।
मेहरोत्रा ने भारत की युवा आबादी और मैन्युफैक्चरिंग रोजगार के बीच मौजूद इस अंतर को एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती के तौर पर देखा है। उनके मुताबिक, भारत को ऐसी औद्योगिक रणनीति की जरूरत है जिसमें उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा हो।
‘भारत को करीब 100 देशों से सीखना होगा’
संतोष मेहरोत्रा ने कहा कि भारत को उन देशों के अनुभव से सीखना चाहिए जिन्होंने स्पष्ट इंडस्ट्रियल पॉलिसी अपनाकर अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत किया।
उनका कहना है कि अगर भारत को मैन्युफैक्चरिंग में ज्यादा नौकरियां पैदा करनी हैं तो उसे दुनिया के उन लगभग 100 देशों जैसा बनने की जरूरत है, जिन्होंने इंडस्ट्रियल पॉलिसी और मैन्युफैक्चरिंग रणनीति को प्राथमिकता दी है।
यह बात भारत की मौजूदा औद्योगिक नीतियों पर भी सवाल खड़े करती है। देश में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के लिए कई योजनाएं लागू की गई हैं, लेकिन रोजगार पैदा करने की क्षमता को भी नीति का अहम हिस्सा बनाना होगा।
PLI स्कीम पर भी उठे सवाल
मेहरोत्रा ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या मौजूदा PLI योजना को पूरी तरह मैन्युफैक्चरिंग रणनीति माना जा सकता है?
उनके मुताबिक, PLI के 14 सेक्टरों में से 12 सेक्टर ऐसे हैं जो अपेक्षाकृत कैपिटल-इंटेंसिव हैं। यानी इनमें उत्पादन बढ़ाने के लिए पूंजी, मशीनरी और तकनीक की भूमिका ज्यादा है।
कैपिटल-इंटेंसिव उद्योगों में उत्पादन बढ़ सकता है, लेकिन हर बार उत्पादन में बढ़ोतरी का मतलब बड़ी संख्या में नई नौकरियां पैदा होना नहीं होता। यही वजह है कि भारत को ऐसी इंडस्ट्री पर भी ध्यान देने की जरूरत है जिसमें बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिल सके।
यही अंतर लेबर-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग और कैपिटल-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग के बीच महत्वपूर्ण हो जाता है।
गारमेंट और खिलौना उद्योग क्यों हैं महत्वपूर्ण?
इसी कार्यक्रम में अर्थशास्त्री अभीक बरुआ ने भी भारत के रोजगार ढांचे को लेकर चिंता जताई। उनका कहना था कि देश में बड़ी संख्या में अतिरिक्त लेबर उपलब्ध है। इसलिए भारत को अभी भी ऐसे उद्योगों की जरूरत है जिनमें बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।
गारमेंट्स, टेक्सटाइल, खिलौने और इसी तरह के अन्य उद्योग इस लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इन सेक्टरों में अपेक्षाकृत अधिक लोगों को रोजगार देने की क्षमता होती है।
भारत अगर ऐसे उद्योगों को बड़े पैमाने पर विकसित करता है तो इससे दो फायदे हो सकते हैं। पहला, देश की बड़ी युवा आबादी को रोजगार मिल सकता है। दूसरा, भारत वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है।
हालांकि, बरुआ ने लेबर रिफॉर्म्स और पेरोल स्ट्रक्चर में बदलाव के संभावित असर को लेकर भी सावधान किया। उनका तर्क है कि अगर नीतिगत बदलावों से छोटी लेबर-इंटेंसिव यूनिट्स के लिए कर्मचारियों को रखना महंगा या जटिल होता है तो वे ज्यादा मशीनों और ऑटोमेशन की तरफ जा सकती हैं।
AI और ऑटोमेशन से बढ़ रही चुनौती
भारत के रोजगार संकट को और जटिल बनाने वाला एक बड़ा फैक्टर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन है।
पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों ने उत्पादन, कस्टमर सर्विस, सॉफ्टवेयर, बैक ऑफिस और कई दूसरे क्षेत्रों में ऑटोमेशन का इस्तेमाल बढ़ाया है। AI के विस्तार के साथ आने वाले समय में कई कामों को कम कर्मचारियों के साथ पूरा करना संभव हो सकता है।
मेहरोत्रा ने खास तौर पर सर्विस सेक्टर और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर चिंता जताई। भारत पिछले दो दशकों में IT और सर्विसेज एक्सपोर्ट के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है और GCCs भी रोजगार का महत्वपूर्ण स्रोत बने हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या भविष्य में भी इन क्षेत्रों में उसी गति से नौकरियां बढ़ेंगी?
मेहरोत्रा के मुताबिक, अगर भारत रोजगार के लिए GCCs और सर्विसेज एक्सपोर्ट की वृद्धि पर बहुत ज्यादा निर्भर रहता है तो AI उस तरह की रोजगार वृद्धि को सीमित कर सकता है, जैसी पिछले 20 वर्षों में देखने को मिली है।
इसका मतलब यह नहीं है कि सर्विस सेक्टर भारत के लिए महत्वहीन हो जाएगा। बल्कि चुनौती यह है कि भारत को रोजगार के लिए मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों का संतुलित मॉडल तैयार करना होगा।
मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी भी चिंता का विषय
मेहरोत्रा ने भारत की अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी को लेकर भी एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने रखा। उनके मुताबिक, ग्रॉस वैल्यू एडेड यानी GVA में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान करीब 16-17% से घटकर 14.3% रह गया है।
मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी में यह बदलाव ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
भारत का लक्ष्य सिर्फ GDP बढ़ाना नहीं है। आर्थिक विकास का फायदा रोजगार, आय और उत्पादकता के स्तर पर भी दिखाई देना चाहिए। इसके लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का विस्तार महत्वपूर्ण माना जाता है।
एक दशक बाद रोजगार की स्थिति में सुधार
मेहरोत्रा ने यह भी कहा कि ज्यादा लोगों की जरूरत वाली मैन्युफैक्चरिंग नौकरियों में करीब एक दशक तक गिरावट देखने को मिली। हाल के समय में ये नौकरियां 2012 के स्तर तक वापस पहुंची हैं।
यह स्थिति बताती है कि मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार पैदा करना अपने आप नहीं हो रहा है। इसके लिए नीतिगत प्राथमिकताओं, निवेश और उद्योगों के स्वरूप पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
अगर उत्पादन में वृद्धि मुख्य रूप से मशीनों, तकनीक और पूंजी के जरिए होती है, तो रोजगार का अनुपात उतना नहीं बढ़ सकता। इसलिए भारत के लिए ऐसी औद्योगिक नीति जरूरी है जो निवेश और उत्पादकता के साथ रोजगार सृजन को भी महत्व दे।
भारत के सामने दोहरी चुनौती
भारत के नीति-निर्माताओं के सामने अब एक साथ दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है कि देश में ऐसी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता तैयार की जाए जो बड़ी युवा वर्कफोर्स को पर्याप्त रोजगार दे सके।
दूसरी चुनौती यह है कि ऑटोमेशन और AI के बढ़ते इस्तेमाल से रोजगार के अवसरों पर जो दबाव बन सकता है, उसका सामना किया जाए।
इसका समाधान सिर्फ अधिक फैक्ट्रियां लगाने तक सीमित नहीं हो सकता। भारत को यह भी देखना होगा कि किस तरह की फैक्ट्रियां लग रही हैं, उनमें कितने लोगों को रोजगार मिल रहा है और भारतीय कंपनियां वैश्विक सप्लाई चेन में किस स्तर पर शामिल हो रही हैं।
लेबर-इंटेंसिव सेक्टर जैसे टेक्सटाइल, गारमेंट्स, फुटवियर, खिलौने और अन्य श्रम आधारित उद्योग इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं।
क्या भारत अपना डेमोग्राफिक डिविडेंड बचा पाएगा?
भारत की युवा आबादी देश के लिए बड़ा आर्थिक अवसर है, लेकिन यह अवसर तभी फायदा देगा जब युवाओं को पर्याप्त रोजगार और कौशल आधारित काम मिल सके।
अगर अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है लेकिन रोजगार की वृद्धि उसी अनुपात में नहीं होती, तो इसे जॉबलेस ग्रोथ की चिंता से जोड़कर देखा जा सकता है। वहीं, AI और ऑटोमेशन के कारण कुछ पारंपरिक नौकरियों का स्वरूप बदलने से चुनौती और बढ़ सकती है।
इसलिए संतोष मेहरोत्रा की चेतावनी का मूल संदेश यही है कि भारत को अपनी औद्योगिक नीति में रोजगार को ज्यादा केंद्रीय भूमिका देनी होगी। सिर्फ उत्पादन और निवेश बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। देश को ऐसे सेक्टरों पर भी ध्यान देना होगा जो बड़े पैमाने पर लोगों को काम दे सकें।
आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक सफलता इस बात से भी तय होगी कि वह अपनी विशाल युवा आबादी को किस हद तक उत्पादक वर्कफोर्स में बदल पाता है। मजबूत मैन्युफैक्चरिंग, लेबर-इंटेंसिव उद्योग, कौशल विकास और AI के दौर के लिए नई नौकरियों की तैयारी—इन सभी को साथ लेकर चलना भारत के लिए बेहद जरूरी हो सकता है।


