नई दिल्ली। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत के सामने अब एक नई जनसांख्यिकीय चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। दशकों तक बढ़ती आबादी को लेकर चिंता जताई जाती रही, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे पहुंच चुकी है। इसका मतलब है कि औसतन एक भारतीय महिला अब अपने जीवनकाल में इतने बच्चों को जन्म नहीं दे रही है, जितने किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी माने जाते हैं।
यह बदलाव केवल जनसंख्या से जुड़ा आंकड़ा नहीं है, बल्कि आने वाले दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था, रोजगार बाजार, सामाजिक संरचना और विकास मॉडल को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि टेस्ला के सीईओ एलन मस्क, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल और एडेलवाइस म्यूचुअल फंड की सीईओ राधिका गुप्ता जैसे प्रमुख लोगों ने इस विषय पर चिंता जताई है।
क्या होता है रिप्लेसमेंट रेट और क्यों है यह महत्वपूर्ण?
जनसंख्या विज्ञान में 2.1 की प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट रेट कहा जाता है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक महिला औसतन 2.1 बच्चों को जन्म दे ताकि वर्तमान पीढ़ी की जगह अगली पीढ़ी ले सके और कुल आबादी स्थिर बनी रहे।
जब किसी देश का फर्टिलिटी रेट लगातार 2.1 से नीचे चला जाता है तो लंबे समय में वहां जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या घटने लगती है। शुरुआत में इसका असर दिखाई नहीं देता क्योंकि पहले से मौजूद युवा आबादी जनसंख्या वृद्धि को बनाए रखती है, लेकिन कुछ दशकों बाद कार्यशील आबादी कम होने लगती है और बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ती है।
भारत में अब कुल प्रजनन दर करीब 2.0 तक पहुंच चुकी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और विभिन्न जनसांख्यिकीय अध्ययनों के आंकड़े भी इसी दिशा की ओर संकेत करते हैं।
संजीव सान्याल ने क्यों दी चेतावनी?
Been making this point for the last two decades – it is not a "crisis" yet – there things take a long time to build up. However, Indians need to understand that the peak number of live births in India were back in 2001. But for longevity gains, population would have started to… https://t.co/ynsxd1M9qD
— Sanjeev Sanyal (@sanjeevsanyal) June 7, 2026 प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य और अर्थशास्त्री संजीव सान्याल लंबे समय से भारत में घटती जन्म दर को लेकर चेतावनी देते रहे हैं।
उन्होंने हाल ही में सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत में जीवित जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या का शिखर वर्ष 2001 में आ चुका था। उस समय करीब 2.9 करोड़ बच्चों का जन्म हुआ था। इसके बाद से जन्म दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।
सान्याल के अनुसार यदि भारत में औसत आयु (Life Expectancy) में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई होती तो 2030 के दशक में ही आबादी घटने की प्रक्रिया शुरू हो सकती थी। हालांकि वर्तमान में बढ़ती जीवन प्रत्याशा और युवा आबादी के कारण कुल जनसंख्या अभी कुछ समय तक बढ़ती रहेगी।
उनका मानना है कि भारतीय समाज अब भी इस बदलाव की गंभीरता को पूरी तरह समझ नहीं रहा है, जबकि यह आने वाले वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक मुद्दों में शामिल हो सकता है।
राज्यों के आंकड़े दिखा रहे हैं बदलती तस्वीर
भारत में फर्टिलिटी रेट पूरे देश में समान नहीं है। कुछ राज्यों में यह पहले ही विकसित देशों के स्तर तक पहुंच चुका है।
दिल्ली में प्रजनन दर लगभग 1.2 बताई जा रही है, जो कई यूरोपीय देशों के बराबर है। केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी यह लगभग 1.3 के आसपास है। तेलंगाना में यह करीब 1.5 है।
दूसरी ओर उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में अभी भी प्रजनन दर अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है। बिहार में यह लगभग 2.9, उत्तर प्रदेश में 2.6 और राजस्थान में 2.3 बताई जा रही है।
यह अंतर बताता है कि भारत के विभिन्न हिस्से जनसांख्यिकीय बदलाव के अलग-अलग चरणों में हैं। दक्षिण भारत और शहरी क्षेत्रों में जन्म दर तेजी से घट रही है, जबकि कुछ उत्तरी राज्यों में अभी भी अपेक्षाकृत अधिक जन्म दर बनी हुई है।
एलन मस्क ने क्यों जताई चिंता?
दुनिया भर में घटती जन्म दर को लेकर लगातार चेतावनी देने वाले एलन मस्क ने भी भारत की स्थिति पर प्रतिक्रिया दी है।
मस्क का कहना है कि भारत की कुल प्रजनन दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जा चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के सबसे अधिक शिक्षित वर्गों में यह दर कई वर्ष पहले ही रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे पहुंच गई थी।
एलन मस्क पहले भी जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और यूरोप के कई देशों में घटती जन्म दर को भविष्य के लिए बड़ा खतरा बता चुके हैं। उनका तर्क है कि यदि किसी देश में पर्याप्त बच्चे पैदा नहीं होंगे तो भविष्य में आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखना कठिन हो जाएगा।
क्या भारत भी चीन जैसी चुनौती का सामना करेगा?
भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह भविष्य में चीन जैसी स्थिति का सामना करेगा?
चीन में एक समय दुनिया की सबसे बड़ी आबादी थी, लेकिन लंबे समय तक चली वन-चाइल्ड पॉलिसी और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण वहां जन्म दर तेजी से गिर गई। आज चीन को कार्यशील आयु वर्ग की कमी, बढ़ती बुजुर्ग आबादी और धीमी आर्थिक वृद्धि जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
दक्षिण कोरिया का उदाहरण और भी गंभीर है। वहां प्रजनन दर दुनिया में सबसे कम स्तरों में शामिल है। सरकार अरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद जन्म दर में उल्लेखनीय सुधार नहीं कर पाई है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि एक बार यदि प्रजनन दर बहुत नीचे चली जाए तो उसे दोबारा बढ़ाना बेहद कठिन हो जाता है।
राधिका गुप्ता ने क्यों कहा कि हर वर्कर ज्यादा महत्वपूर्ण होगा?
India’s fertility rate falling below replacement rate should open a new economic conversation.
Replacement rate simply means a country is no longer having enough children to replace its population over time. India still has demographic momentum because we are a young country,…
— Radhika Gupta (@iRadhikaGupta) June 7, 2026 एडेलवाइस म्यूचुअल फंड की मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ राधिका गुप्ता का मानना है कि घटती जन्म दर भारत की आर्थिक बहस को नई दिशा दे सकती है।
उन्होंने कहा कि जब कम बच्चे पैदा होते हैं तो भविष्य में श्रमिकों की संख्या सीमित हो जाती है। ऐसे में हर कर्मचारी की उत्पादकता पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
राधिका गुप्ता के अनुसार आने वाले समय में तीन चीजें सबसे ज्यादा मायने रखेंगी:
- श्रमिकों की उत्पादकता
- कौशल विकास और शिक्षा
- महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी
उनका कहना है कि भारत को अपनी युवा आबादी का लाभ तभी मिलेगा जब वह उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट और रोजगार सृजन पर जोर देगा।
महिलाओं की भागीदारी और फर्टिलिटी का संबंध
दुनिया भर के आंकड़े बताते हैं कि जैसे-जैसे महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में भागीदारी बढ़ती है, जन्म दर में गिरावट देखने को मिलती है।
हालांकि राधिका गुप्ता इस बात को समस्या के रूप में नहीं देखतीं। उनका मानना है कि महिलाओं का आर्थिक रूप से सशक्त होना किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है।
असल चुनौती यह नहीं है कि महिलाएं काम करें या नहीं। असली सवाल यह है कि सरकारें और कंपनियां ऐसा माहौल कैसे बनाएं जिसमें महिलाएं करियर और परिवार दोनों को संतुलित कर सकें।
भारत के लिए आगे का रास्ता क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अभी घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि देश को अगले कई दशकों तक अपनी युवा आबादी का लाभ मिलेगा। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार भारत की कुल आबादी 2050 के दशक तक बढ़ सकती है।
लेकिन इसके साथ ही नीति निर्माताओं को भविष्य की तैयारी अभी से शुरू करनी होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत को बच्चों की देखभाल की बेहतर व्यवस्था, किफायती डे-केयर सेंटर, लचीले कार्य घंटे, मातृत्व और पितृत्व अवकाश, सुरक्षित कार्यस्थल और परिवार समर्थक नीतियों पर ध्यान देना होगा।
राधिका गुप्ता का मानना है कि आने वाले वर्षों में चाइल्डकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है जितना सड़क, बिजली और बंदरगाह जैसे पारंपरिक इंफ्रास्ट्रक्चर।
निष्कर्ष
भारत अभी जनसंख्या संकट की स्थिति में नहीं है, लेकिन आंकड़े स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि देश तेजी से एक नए जनसांख्यिकीय दौर में प्रवेश कर रहा है। कुल प्रजनन दर का रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाना आने वाले दशकों में आर्थिक विकास, श्रम बाजार और सामाजिक संरचना को प्रभावित कर सकता है।
एलन मस्क, संजीव सान्याल और राधिका गुप्ता की चिंताओं का केंद्र यही है कि भारत को अभी से ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो उत्पादकता बढ़ाएं, महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करें और परिवार तथा करियर के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करें। यदि ऐसा किया गया तो भारत घटती जन्म दर की चुनौती को अवसर में बदल सकता है।


