India Export to BRICS: अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों में जारी तनाव के बीच भारत के निर्यात बाजार का रुख बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। अप्रैल-अगस्त 2026-27 के दौरान चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख BRICS देशों को भारत का निर्यात 34 फीसदी बढ़कर 19.9 अरब डॉलर पहुंच गया। इस वृद्धि में चीन की भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण रही, जहां भारत के निर्यात में 39 फीसदी की तेजी दर्ज की गई।
हालांकि, इन आंकड़ों को सीधे तौर पर यह निष्कर्ष नहीं माना जा सकता कि भारत ने अमेरिकी बाजार का पूरी तरह विकल्प तलाश लिया है। लेकिन निर्यात के आंकड़े यह जरूर दिखाते हैं कि भारत अपने व्यापारिक बाजारों में विविधता बढ़ा रहा है और BRICS के साथ-साथ जापान, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ रही है।
BRICS देशों को भारत का निर्यात कितना बढ़ा?
वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-अगस्त 2025-26 में चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को भारत का कुल निर्यात 14.9 अरब डॉलर था। अप्रैल-अगस्त 2026-27 में यह बढ़कर 19.9 अरब डॉलर हो गया। यानी एक साल में करीब 5 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई।
इन चार देशों की भारत के कुल निर्यात में हिस्सेदारी भी बढ़ी है। अप्रैल-अगस्त 2025-26 में जहां इनकी हिस्सेदारी 8.1 फीसदी थी, वहीं अप्रैल-अगस्त 2026-27 में यह बढ़कर 9.2 फीसदी हो गई।
चीन को भारत का निर्यात 39 फीसदी बढ़ा
चारों देशों में चीन भारत के लिए सबसे बड़ा बाजार रहा। अप्रैल-अगस्त 2026-27 के दौरान चीन को भारत का निर्यात 39 फीसदी बढ़कर 9.6 अरब डॉलर हो गया।
यह वृद्धि ऐसे समय में आई है जब भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों में कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिल रहे हैं। चीन के साथ भारत का कुल व्यापार लंबे समय से काफी बड़ा रहा है, लेकिन निर्यात की तुलना में भारत का आयात अधिक रहने के कारण व्यापार संतुलन एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है।
ऐसे में चीन को भारतीय निर्यात में 39 फीसदी की वृद्धि यह संकेत देती है कि भारतीय कंपनियों की कुछ उत्पाद श्रेणियों की वहां मांग बढ़ी है। हालांकि, केवल पांच महीने के आंकड़ों के आधार पर पूरे वित्त वर्ष की तस्वीर तय करना जल्दबाजी होगी।
दक्षिण अफ्रीका में सबसे तेज 58% की वृद्धि
इन चार प्रमुख BRICS बाजारों में दक्षिण अफ्रीका को भारत के निर्यात में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई। अप्रैल-अगस्त 2026-27 के दौरान यहां भारतीय निर्यात 58 फीसदी बढ़ा।
ब्राजील को भारत का निर्यात 13 फीसदी बढ़ा, जबकि रूस को निर्यात में 11 फीसदी की वृद्धि हुई। इस तरह चारों प्रमुख बाजारों में भारत के निर्यात में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई।
वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, इन देशों में भारत की कारोबारी हिस्सेदारी बढ़ रही है और BRICS की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भारत की एक्सपोर्ट रणनीति में महत्वपूर्ण बाजार बन रही हैं।
अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के बीच बढ़ी बाजारों की अहमियत
भारत के निर्यात में इन बाजारों की बढ़ती हिस्सेदारी ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से जुड़े अमेरिकी प्रावधानों ने भी भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों को लेकर चर्चा बढ़ाई है। भारत रूस से ऊर्जा आयात करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है।
ऐसे माहौल में निर्यात के लिए अलग-अलग बाजारों में मौजूदगी बढ़ाना भारतीय कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, अमेरिका जैसे बड़े बाजार को किसी एक देश या समूह से पूरी तरह बदलना आसान नहीं है। इसलिए मौजूदा आंकड़ों को भारत की निर्यात विविधीकरण रणनीति के हिस्से के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।
BRICS में अब कितने देश हैं?
BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई थी। बाद में समूह का विस्तार किया गया।
2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को समूह में शामिल किया गया। इसके बाद 2025 में इंडोनेशिया भी BRICS का सदस्य बना।
इसके अलावा बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम को पार्टनर देशों का दर्जा दिया गया।
BRICS के विस्तार से भारत के लिए संभावित बाजारों का दायरा भी बढ़ा है। खासकर विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारतीय फार्मा, इंजीनियरिंग उत्पाद, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य उत्पादों के लिए अवसर बन सकते हैं।
BRICS के बाहर भी बढ़ा भारत का निर्यात
भारत के निर्यात में तेजी केवल BRICS देशों तक सीमित नहीं रही। अप्रैल-अगस्त 2026-27 में जापान, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में भी भारतीय निर्यात बढ़ा है।
जापान को निर्यात 43% बढ़ा
जापान को भारत का निर्यात अप्रैल-अगस्त 2026-27 में 43 फीसदी बढ़कर 3.43 अरब डॉलर हो गया।
इस वृद्धि में मिनरल फ्यूल की अहम भूमिका रही। जापान को मिनरल फ्यूल का निर्यात 76 फीसदी बढ़ा। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स और एल्युमीनियम जैसे उत्पादों के निर्यात में भी वृद्धि दर्ज की गई।
इटली को निर्यात 30% बढ़ा
इटली को भारत का निर्यात भी तेजी से बढ़ा। अप्रैल-अगस्त 2026-27 में यह 3.92 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 3.02 अरब डॉलर था।
इस तरह इटली को निर्यात में करीब 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। यूरोपीय बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग में यह वृद्धि भारत के लिए अपने एक्सपोर्ट बेस को व्यापक बनाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
दक्षिण कोरिया को निर्यात 22% बढ़ा
दक्षिण कोरिया को भारत का निर्यात पांच महीने की अवधि में 22 फीसदी बढ़कर 3.21 अरब डॉलर हो गया।
मिनरल्स, फ्यूल, इलेक्ट्रॉनिक्स, एल्युमीनियम, आयरन एंड स्टील और केमिकल्स जैसे क्षेत्रों ने इस वृद्धि में योगदान दिया।
दक्षिण कोरिया ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रहा है। ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए औद्योगिक कच्चे माल, ऊर्जा उत्पादों और इंटरमीडिएट गुड्स की मांग से नए निर्यात अवसर बन सकते हैं।
क्या BRICS अमेरिका का विकल्प बन सकता है?
मौजूदा आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि भारत के निर्यात का दायरा अमेरिका से आगे बढ़कर BRICS और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं तक फैल रहा है। चीन को निर्यात में 39 फीसदी और दक्षिण अफ्रीका को निर्यात में 58 फीसदी की वृद्धि इसका उदाहरण है।
लेकिन इसे अमेरिका के लिए सीधा विकल्प कहना अभी जल्दबाजी होगी। किसी बड़े निर्यात बाजार को बदलने के लिए सिर्फ कुल निर्यात बढ़ना पर्याप्त नहीं होता। बाजार का आकार, उत्पादों की मांग, व्यापार समझौते, लॉजिस्टिक्स, भुगतान व्यवस्था और भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं।
फिलहाल आंकड़ों से इतना स्पष्ट है कि भारत के निर्यात बाजारों में विविधता बढ़ रही है। BRICS के प्रमुख देशों के साथ-साथ जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के बाजारों में निर्यात वृद्धि भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसरों की ओर संकेत करती है।
Source: वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों और PTI की रिपोर्ट पर आधारित।
डिस्क्लेमर: निर्यात और व्यापार से जुड़े आंकड़े संबंधित अवधि के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित हैं। किसी देश को भारत के लिए स्थायी या पूर्ण विकल्प मानने के लिए लंबी अवधि के व्यापार आंकड़ों और अन्य आर्थिक कारकों का विश्लेषण जरूरी है।


