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    # UP के सरकारी इंजीनियर ने खड़ा किया था खरबों का JP साम्राज्य, फिर कर्ज ने किया बर्बाद; अब अदाणी के हाथों में कंपनी की कमान **JP Associates Story:** उत्तर प्रदेश के एक सरकारी इंजीनियर ने अपनी नौकरी छोड़कर कारोबार की दुनिया में कदम रखा और देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया। यह कहानी है जयप्रकाश गौड़ और जयप्रकाश एसोसिएट्स (JP Associates) की। यमुना एक्सप्रेसवे, बड़े बांध, सीमेंट प्लांट, बिजली परियोजनाएं और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने वाला यह समूह कभी देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबारियों में गिना जाता था। लेकिन जरूरत से ज्यादा कर्ज, आर्थिक मंदी और कारोबार में आई मुश्किलों ने इस साम्राज्य की नींव हिला दी। आखिरकार कंपनी दिवालिया प्रक्रिया में पहुंच गई और अब इसका अधिग्रहण अदाणी समूह ने कर लिया है। **बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली।** कारोबार की दुनिया में कई ऐसी कहानियां हैं, जहां एक छोटे से सफर की शुरुआत करने वाला व्यक्ति बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर देता है। लेकिन कभी-कभी यही साम्राज्य समय के साथ कर्ज और आर्थिक चुनौतियों के कारण ढह भी जाता है। जयप्रकाश एसोसिएट्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय उत्तर भारत में जेपी समूह का नाम बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जाना जाता था। कंपनी ने सड़क निर्माण से लेकर बिजली उत्पादन, सीमेंट, होटल और रियल एस्टेट तक कई क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बनाई। ग्रेटर नोएडा से आगरा को जोड़ने वाला यमुना एक्सप्रेसवे भी इसी समूह की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। जेपी समूह की पहचान केवल बड़े प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं थी। लाखों निवेशकों और कर्मचारियों का भी इस कंपनी से जुड़ाव था। लेकिन लगातार बढ़ते कर्ज और कारोबार में आई गिरावट ने कंपनी को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां से वापसी मुश्किल हो गई। अब अदाणी समूह ने दिवालिया समाधान प्रक्रिया के जरिए जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ कर लिया है। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे एक सरकारी इंजीनियर ने यह कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया और फिर यह आर्थिक संकट में कैसे फंस गया। ## सरकारी इंजीनियर से कारोबारी बनने तक का सफर जयप्रकाश गौड़ का जन्म वर्ष 1931 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया और इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की। सरकारी सेवा के दौरान उन्हें निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ी परियोजनाओं को समझने का मौका मिला। हालांकि, उनके मन में खुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा थी। करीब सात साल तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और निर्माण कार्यों की ठेकेदारी शुरू कर दी। शुरुआत में उनके पास कारोबार के लिए बहुत ज्यादा पूंजी नहीं थी। उन्होंने अपनी करीब 10 हजार रुपये की बचत से छोटे-मोटे निर्माण और सड़क निर्माण के ठेके लेने शुरू किए। धीरे-धीरे अनुभव और काम के आधार पर उन्हें बड़ी परियोजनाएं मिलने लगीं। वर्ष 1979 में उन्होंने जयप्रकाश एसोसिएट्स की स्थापना की। शुरुआत में कंपनी का मुख्य कारोबार निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ा था। समय के साथ कंपनी ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अपनी जगह बनाई और जेपी समूह का विस्तार होता चला गया। ## बांध से लेकर बिजली और सीमेंट तक फैला कारोबार जेपी समूह ने निर्माण क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत करने के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की तरफ कदम बढ़ाया। टिहरी बांध और विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से कंपनी की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई। इसके बाद समूह ने सीमेंट, बिजली उत्पादन, होटल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार शुरू किया। कंपनी का उद्देश्य केवल निर्माण ठेके लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विकास और संचालन तक पहुंच गया। इस विस्तार ने जयप्रकाश एसोसिएट्स को देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में शामिल कर दिया। कंपनी के पास अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार था और निवेशकों के बीच भी इसकी अच्छी पहचान बन गई थी। ## यमुना एक्सप्रेसवे ने दिलाई देशभर में पहचान जेपी समूह के इतिहास में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना को एक बड़ा पड़ाव माना जाता है। वर्ष 2003 में ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच एक्सप्रेसवे बनाने की परियोजना जेपी समूह को मिली। करीब 165 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का निर्माण समूह की कंपनी जेपी इंफ्राटेक ने किया। इस परियोजना के तहत सड़क निर्माण के साथ-साथ एक्सप्रेसवे के आसपास रियल एस्टेट विकास के अधिकार भी मिले। इससे कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रॉपर्टी कारोबार दोनों में विस्तार का अवसर मिला। वर्ष 2012 में यमुना एक्सप्रेसवे को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच सड़क संपर्क बेहतर हुआ। इस परियोजना ने जेपी समूह को देशभर में पहचान दिलाई। इसी दौरान कंपनी ने ग्रेटर नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का निर्माण भी किया। इस रेसिंग सर्किट पर वर्ष 2011 से 2013 तक फॉर्मूला-1 इंडियन ग्रां प्री का आयोजन हुआ। यह परियोजना भारत में मोटरस्पोर्ट्स के लिहाज से काफी चर्चित रही। ## 2008 की मंदी के बाद बिगड़ने लगे हालात तेजी से विस्तार कर रहे जेपी समूह के लिए वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी बड़ा झटका साबित हुई। मंदी के बाद रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती आने लगी। मकानों की बिक्री प्रभावित हुई और निर्माण परियोजनाओं से मिलने वाली रकम में देरी होने लगी। दूसरी तरफ बिजली और सीमेंट कारोबार में भी कंपनी को उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हो रही थी। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत थी, जबकि कारोबार से पर्याप्त नकदी नहीं आ रही थी। बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट जैसी बड़ी परियोजनाओं पर हुआ निवेश भी कंपनी के वित्तीय दबाव को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल रहा। कंपनी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बड़ी रकम उधार ली थी, लेकिन आमदनी और नकदी का प्रवाह कर्ज चुकाने की रफ्तार के अनुरूप नहीं रहा। कर्ज का बोझ बढ़ने के साथ कंपनी को अपनी कई संपत्तियां और कारोबारी हिस्सेदारियां बेचनी पड़ीं। इसके बावजूद वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे जेपी समूह का संकट गहराता चला गया। ## घर खरीदारों से लेकर बैंकों तक, हर कोई हुआ परेशान जेपी समूह का आर्थिक संकट केवल कंपनी और बैंकों तक सीमित नहीं रहा। इसका असर उन हजारों लोगों पर भी पड़ा, जिन्होंने कंपनी के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में अपने घर बुक किए थे। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जेपी विशटाउन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में घर खरीदारों का पैसा फंस गया। कई लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत लगाकर घर खरीदे थे, लेकिन उन्हें तय समय पर फ्लैट नहीं मिल पाए। इस स्थिति ने जेपी समूह की मुश्किलें और बढ़ा दीं। एक तरफ बैंक और वित्तीय संस्थान अपना कर्ज वापस मांग रहे थे, वहीं दूसरी तरफ घर खरीदार अपने घरों का इंतजार कर रहे थे। ## 2017 में शुरू हुई दिवालिया प्रक्रिया जेपी समूह की मुश्किलें सबसे पहले उसकी सहायक कंपनी जेपी इंफ्राटेक के मामले में सामने आईं। अगस्त 2017 में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की गई। बाद में सुरक्षा समूह ने समाधान प्रक्रिया के तहत जेपी इंफ्राटेक के अधिग्रहण की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, इससे पूरे जेपी समूह की वित्तीय परेशानियां खत्म नहीं हुईं। समूह की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड भी भारी कर्ज के कारण संकट में फंस गई। 3 जून 2024 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की इलाहाबाद पीठ ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। इस मामले में वित्तीय लेनदारों ने करीब 57,185 करोड़ रुपये के बकाये का दावा किया था। इसके बाद कंपनी के कारोबार और संपत्तियों के समाधान के लिए बोली प्रक्रिया शुरू हुई। कई बड़े कारोबारी समूहों ने कंपनी को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई। ## वेदांता ने लगाई बड़ी बोली, लेकिन अदाणी ने मारी बाजी जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण की प्रक्रिया में वेदांता समूह और अदाणी समूह समेत कई कंपनियों ने हिस्सा लिया। सितंबर 2025 में वेदांता समूह की 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की बोली की खबर सामने आई थी। इससे माना जा रहा था कि कंपनी का नियंत्रण अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता समूह के पास जा सकता है। हालांकि, बाद में समाधान प्रक्रिया में स्थिति बदल गई। नवंबर 2025 में वित्तीय लेनदारों ने अदाणी एंटरप्राइजेज की 14,535 करोड़ रुपये की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव को कर्जदाताओं के करीब 89 फीसदी वोट मिले। इसके बाद 17 मार्च 2026 को NCLT की इलाहाबाद पीठ ने अदाणी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस फैसले के साथ जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, वेदांता समूह ने इस फैसले को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी थी। मई 2026 में NCLAT ने वेदांता की अपील खारिज कर दी। इससे अदाणी समूह के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ने का रास्ता मिला। ## अब अदाणी समूह के नियंत्रण में जेपी की संपत्तियां जयप्रकाश एसोसिएट्स के समाधान के बाद समूह की कई संपत्तियां और कारोबार अदाणी समूह की रणनीति का हिस्सा बन गए हैं। अदाणी समूह की अलग-अलग कंपनियां जेपी समूह की विभिन्न कारोबारी इकाइयों और परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी हासिल कर रही हैं। इसी क्रम में अदाणी पावर ने जेपी पावर से जुड़ी हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया। वहीं, जेपी समूह के कुछ सीमेंट प्लांटों को अदाणी समूह ने डालमिया भारत को बेचने का फैसला किया। इस तरह जिस जेपी समूह ने कभी उत्तर भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई थी, उसका कारोबारी स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। जयप्रकाश गौड़ की कहानी कारोबार की दुनिया में बड़े सपने, तेजी से विस्तार और वित्तीय अनुशासन के महत्व को समझाती है। महज 10 हजार रुपये की बचत से शुरू हुआ सफर देश के बड़े कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचा, लेकिन भारी कर्ज और नकदी की कमी ने अंततः इस साम्राज्य को दिवालिया प्रक्रिया तक पहुंचा दिया। **Source:** उपलब्ध कारोबारी रिपोर्टों और दिवालिया समाधान प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पर आधारित। jp-associates-jayprakash-gaur-rise-fall-adani-takeover-story
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Reading: India Export: चीन समेत BRICS देशों को भारत का निर्यात 34% बढ़ा, क्या बदल रही है एक्सपोर्ट मार्केट की तस्वीर?
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India Export: चीन समेत BRICS देशों को भारत का निर्यात 34% बढ़ा, क्या बदल रही है एक्सपोर्ट मार्केट की तस्वीर?

Namam Sharma
Last updated: 2026/09/20 at 5:49 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
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India Export to BRICS: अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों में जारी तनाव के बीच भारत के निर्यात बाजार का रुख बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। अप्रैल-अगस्त 2026-27 के दौरान चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख BRICS देशों को भारत का निर्यात 34 फीसदी बढ़कर 19.9 अरब डॉलर पहुंच गया। इस वृद्धि में चीन की भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण रही, जहां भारत के निर्यात में 39 फीसदी की तेजी दर्ज की गई।

Contents
BRICS देशों को भारत का निर्यात कितना बढ़ा?चीन को भारत का निर्यात 39 फीसदी बढ़ादक्षिण अफ्रीका में सबसे तेज 58% की वृद्धिअमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के बीच बढ़ी बाजारों की अहमियतBRICS में अब कितने देश हैं?BRICS के बाहर भी बढ़ा भारत का निर्यातजापान को निर्यात 43% बढ़ाइटली को निर्यात 30% बढ़ादक्षिण कोरिया को निर्यात 22% बढ़ाक्या BRICS अमेरिका का विकल्प बन सकता है?

हालांकि, इन आंकड़ों को सीधे तौर पर यह निष्कर्ष नहीं माना जा सकता कि भारत ने अमेरिकी बाजार का पूरी तरह विकल्प तलाश लिया है। लेकिन निर्यात के आंकड़े यह जरूर दिखाते हैं कि भारत अपने व्यापारिक बाजारों में विविधता बढ़ा रहा है और BRICS के साथ-साथ जापान, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ रही है।

BRICS देशों को भारत का निर्यात कितना बढ़ा?

वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-अगस्त 2025-26 में चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को भारत का कुल निर्यात 14.9 अरब डॉलर था। अप्रैल-अगस्त 2026-27 में यह बढ़कर 19.9 अरब डॉलर हो गया। यानी एक साल में करीब 5 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई।

इन चार देशों की भारत के कुल निर्यात में हिस्सेदारी भी बढ़ी है। अप्रैल-अगस्त 2025-26 में जहां इनकी हिस्सेदारी 8.1 फीसदी थी, वहीं अप्रैल-अगस्त 2026-27 में यह बढ़कर 9.2 फीसदी हो गई।

चीन को भारत का निर्यात 39 फीसदी बढ़ा

चारों देशों में चीन भारत के लिए सबसे बड़ा बाजार रहा। अप्रैल-अगस्त 2026-27 के दौरान चीन को भारत का निर्यात 39 फीसदी बढ़कर 9.6 अरब डॉलर हो गया।

यह वृद्धि ऐसे समय में आई है जब भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों में कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिल रहे हैं। चीन के साथ भारत का कुल व्यापार लंबे समय से काफी बड़ा रहा है, लेकिन निर्यात की तुलना में भारत का आयात अधिक रहने के कारण व्यापार संतुलन एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है।

ऐसे में चीन को भारतीय निर्यात में 39 फीसदी की वृद्धि यह संकेत देती है कि भारतीय कंपनियों की कुछ उत्पाद श्रेणियों की वहां मांग बढ़ी है। हालांकि, केवल पांच महीने के आंकड़ों के आधार पर पूरे वित्त वर्ष की तस्वीर तय करना जल्दबाजी होगी।

दक्षिण अफ्रीका में सबसे तेज 58% की वृद्धि

इन चार प्रमुख BRICS बाजारों में दक्षिण अफ्रीका को भारत के निर्यात में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई। अप्रैल-अगस्त 2026-27 के दौरान यहां भारतीय निर्यात 58 फीसदी बढ़ा।

ब्राजील को भारत का निर्यात 13 फीसदी बढ़ा, जबकि रूस को निर्यात में 11 फीसदी की वृद्धि हुई। इस तरह चारों प्रमुख बाजारों में भारत के निर्यात में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई।

वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, इन देशों में भारत की कारोबारी हिस्सेदारी बढ़ रही है और BRICS की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भारत की एक्सपोर्ट रणनीति में महत्वपूर्ण बाजार बन रही हैं।

अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के बीच बढ़ी बाजारों की अहमियत

भारत के निर्यात में इन बाजारों की बढ़ती हिस्सेदारी ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से जुड़े अमेरिकी प्रावधानों ने भी भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंधों को लेकर चर्चा बढ़ाई है। भारत रूस से ऊर्जा आयात करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है।

ऐसे माहौल में निर्यात के लिए अलग-अलग बाजारों में मौजूदगी बढ़ाना भारतीय कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, अमेरिका जैसे बड़े बाजार को किसी एक देश या समूह से पूरी तरह बदलना आसान नहीं है। इसलिए मौजूदा आंकड़ों को भारत की निर्यात विविधीकरण रणनीति के हिस्से के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।

BRICS में अब कितने देश हैं?

BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई थी। बाद में समूह का विस्तार किया गया।

2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को समूह में शामिल किया गया। इसके बाद 2025 में इंडोनेशिया भी BRICS का सदस्य बना।

इसके अलावा बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम को पार्टनर देशों का दर्जा दिया गया।

BRICS के विस्तार से भारत के लिए संभावित बाजारों का दायरा भी बढ़ा है। खासकर विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारतीय फार्मा, इंजीनियरिंग उत्पाद, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य उत्पादों के लिए अवसर बन सकते हैं।

BRICS के बाहर भी बढ़ा भारत का निर्यात

भारत के निर्यात में तेजी केवल BRICS देशों तक सीमित नहीं रही। अप्रैल-अगस्त 2026-27 में जापान, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में भी भारतीय निर्यात बढ़ा है।

जापान को निर्यात 43% बढ़ा

जापान को भारत का निर्यात अप्रैल-अगस्त 2026-27 में 43 फीसदी बढ़कर 3.43 अरब डॉलर हो गया।

इस वृद्धि में मिनरल फ्यूल की अहम भूमिका रही। जापान को मिनरल फ्यूल का निर्यात 76 फीसदी बढ़ा। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स और एल्युमीनियम जैसे उत्पादों के निर्यात में भी वृद्धि दर्ज की गई।

इटली को निर्यात 30% बढ़ा

इटली को भारत का निर्यात भी तेजी से बढ़ा। अप्रैल-अगस्त 2026-27 में यह 3.92 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 3.02 अरब डॉलर था।

इस तरह इटली को निर्यात में करीब 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। यूरोपीय बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग में यह वृद्धि भारत के लिए अपने एक्सपोर्ट बेस को व्यापक बनाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

दक्षिण कोरिया को निर्यात 22% बढ़ा

दक्षिण कोरिया को भारत का निर्यात पांच महीने की अवधि में 22 फीसदी बढ़कर 3.21 अरब डॉलर हो गया।

मिनरल्स, फ्यूल, इलेक्ट्रॉनिक्स, एल्युमीनियम, आयरन एंड स्टील और केमिकल्स जैसे क्षेत्रों ने इस वृद्धि में योगदान दिया।

दक्षिण कोरिया ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रहा है। ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए औद्योगिक कच्चे माल, ऊर्जा उत्पादों और इंटरमीडिएट गुड्स की मांग से नए निर्यात अवसर बन सकते हैं।

क्या BRICS अमेरिका का विकल्प बन सकता है?

मौजूदा आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि भारत के निर्यात का दायरा अमेरिका से आगे बढ़कर BRICS और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं तक फैल रहा है। चीन को निर्यात में 39 फीसदी और दक्षिण अफ्रीका को निर्यात में 58 फीसदी की वृद्धि इसका उदाहरण है।

लेकिन इसे अमेरिका के लिए सीधा विकल्प कहना अभी जल्दबाजी होगी। किसी बड़े निर्यात बाजार को बदलने के लिए सिर्फ कुल निर्यात बढ़ना पर्याप्त नहीं होता। बाजार का आकार, उत्पादों की मांग, व्यापार समझौते, लॉजिस्टिक्स, भुगतान व्यवस्था और भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं।

फिलहाल आंकड़ों से इतना स्पष्ट है कि भारत के निर्यात बाजारों में विविधता बढ़ रही है। BRICS के प्रमुख देशों के साथ-साथ जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप के बाजारों में निर्यात वृद्धि भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसरों की ओर संकेत करती है।

Source: वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों और PTI की रिपोर्ट पर आधारित।

डिस्क्लेमर: निर्यात और व्यापार से जुड़े आंकड़े संबंधित अवधि के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित हैं। किसी देश को भारत के लिए स्थायी या पूर्ण विकल्प मानने के लिए लंबी अवधि के व्यापार आंकड़ों और अन्य आर्थिक कारकों का विश्लेषण जरूरी है।

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TAGGED: BRICS, BRICS Countries, BRICS Trade, China Export, India China trade, India Export, US India Trade, चीन को निर्यात, दक्षिण अफ्रीका निर्यात, भारत अमेरिका व्यापार, भारत निर्यात
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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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