India-Canada Trade: अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ता कारोबारी तनाव भारत के लिए एक नए एक्सपोर्ट अवसर में बदल सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता में खटास बढ़ने और टैरिफ को लेकर टकराव के बीच कनाडा अपने आयात के लिए वैकल्पिक सप्लायर्स की तलाश कर रहा है। ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए कनाडाई बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की गुंजाइश बनती दिख रही है।
नई दिल्ली: अमेरिका और कनाडा के बीच पिछले कुछ समय से व्यापारिक रिश्तों में तनाव बढ़ा है। दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता भी आगे नहीं बढ़ सकी। दूसरी तरफ, भारत और कनाडा के आर्थिक संबंधों में सुधार देखने को मिल रहा है। बदलते वैश्विक व्यापार समीकरणों के बीच यह स्थिति भारतीय निर्यातकों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकती है।
रुबिक्स डेटा साइंसेज के विश्लेषण के मुताबिक, कनाडा के साथ भारत का व्यापार आने वाले वर्षों में और विस्तार कर सकता है। दोनों देश 2030 तक वस्तुओं और सेवाओं में द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
इसके अलावा, मार्च 2026 में शुरू हुई कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) वार्ता का तीसरा दौर भी शुरू हो चुका है। ऐसे में दोनों देशों के बीच व्यापार को आसान बनाने और नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
कनाडा में भारत का एक्सपोर्ट लगातार बढ़ा
भारत पहले ही कनाडा के बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 में कनाडा को भारत का वस्तुओं का निर्यात करीब 3.8 अरब डॉलर था। वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 4.7 अरब डॉलर पहुंच गया।
इस अवधि में निर्यात की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट यानी CAGR करीब 6% रही। खास बात यह है कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के कनाडा को एक्सपोर्ट में सालाना आधार पर 10.6% की वृद्धि दर्ज की गई।
यह आंकड़ा बताता है कि कनाडाई बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग पहले से मौजूद है और बदलते कारोबारी माहौल में भारतीय कंपनियां इसका फायदा उठा सकती हैं।
भारत को कनाडा के साथ व्यापार में मिला सरप्लस
भारत और कनाडा के बीच व्यापार की तस्वीर सिर्फ निर्यात बढ़ने तक सीमित नहीं है। कनाडा से भारत के आयात में भी हाल के वर्षों में कमी आई है।
वित्त वर्ष 2023-24 में कनाडा से भारत का आयात करीब 4.6 अरब डॉलर के उच्च स्तर पर था। वित्त वर्ष 2025-26 में यह घटकर लगभग 3.3 अरब डॉलर रह गया। यानी साल-दर-साल आधार पर आयात में 26.1% की गिरावट आई।
इस बदलाव का सीधा असर भारत के व्यापार संतुलन पर पड़ा। वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 0.2 अरब डॉलर के व्यापार घाटे की स्थिति वित्त वर्ष 2025-26 में बदलकर 1.4 अरब डॉलर के व्यापार सरप्लस में पहुंच गई।
यह वित्त वर्ष 2022 से 2026 के बीच भारत और कनाडा के बीच दर्ज सबसे बड़ा व्यापार सरप्लस रहा।
अब ज्यादा वैल्यू वाले प्रोडक्ट्स पर भारत का फोकस
कनाडा को भारत के निर्यात की संरचना में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। भारतीय कंपनियां धीरे-धीरे ज्यादा वैल्यू वाले और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े उत्पादों की ओर बढ़ रही हैं।
वित्त वर्ष 2021-22 में कनाडा को भारत के कुल निर्यात में फार्मास्यूटिकल्स की हिस्सेदारी करीब 8% थी। वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 11% हो गई।
इसके अलावा ऑटो कंपोनेंट्स और हीरों जैसे उत्पादों की हिस्सेदारी में भी वृद्धि हुई है। इसी अवधि में भारत के टॉप-5 एक्सपोर्ट प्रोडक्ट्स का कुल योगदान 19% से बढ़कर 23% हो गया।
इसका मतलब है कि भारत का कनाडा एक्सपोर्ट सिर्फ पारंपरिक उत्पादों पर निर्भर नहीं रह गया है, बल्कि इसमें मैन्युफैक्चरिंग और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स की भूमिका बढ़ रही है।
अमेरिका पर कनाडा की निर्भरता घटने से भारत को फायदा?
भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ते टैरिफ विवाद से पैदा हो सकता है।
रुबिक्स डेटा साइंसेज के विश्लेषण के मुताबिक, कनाडा कुछ अमेरिकी उत्पादों पर 15%, 25% और 50% तक काउंटर-टैरिफ लगाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रस्तावित टैरिफ में स्टील, घरेलू उपकरण, कृषि उपकरण, पल्प एंड पेपर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
यदि अमेरिकी उत्पाद कनाडा में महंगे होते हैं, तो वहां की कंपनियां दूसरे देशों से सामान खरीदने के विकल्प तलाश सकती हैं। यही वह जगह है जहां भारतीय निर्यातकों के लिए नया बाजार खुल सकता है।
इन सेक्टर्स में भारत की पहले से मजबूत मौजूदगी
खास बात यह है कि जिन क्षेत्रों में कनाडा वैकल्पिक सप्लायर तलाश सकता है, उनमें भारतीय कंपनियों की पहले से मौजूदगी है।
अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में इन प्रमुख सेक्टरों से भारत ने कनाडा को करीब 1 अरब डॉलर के उत्पादों का निर्यात किया।
इसमें सबसे बड़ा हिस्सा मशीनरी और मैकेनिकल उपकरणों का था, जिसका निर्यात करीब 37.94 करोड़ डॉलर रहा।
इसके बाद:
- लोहा और स्टील से बने उत्पाद: 29.25 करोड़ डॉलर
- इलेक्ट्रिकल मशीनरी और उपकरण: 22.60 करोड़ डॉलर
- मशीनरी एवं मैकेनिकल उपकरण: 37.94 करोड़ डॉलर
इन आंकड़ों से साफ है कि भारत के पास उन क्षेत्रों में पहले से एक्सपोर्ट बेस मौजूद है, जहां कनाडा भविष्य में अमेरिकी सप्लायर्स के विकल्प तलाश सकता है।
भारतीय कंपनियों के लिए कितना बड़ा है मौका?
अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनाव जितना लंबा चलेगा, कनाडाई कंपनियों के लिए सप्लाई चेन में विविधता लाने की जरूरत उतनी बढ़ सकती है। ऐसे में भारत को एक भरोसेमंद वैकल्पिक सप्लायर के तौर पर अपनी जगह मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
भारत की स्थिति इसलिए भी बेहतर है क्योंकि फार्मा, ऑटो कंपोनेंट्स, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल उपकरण, स्टील और अन्य मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों का एक्सपोर्ट नेटवर्क पहले से मौजूद है।
हालांकि, सिर्फ अमेरिका पर टैरिफ बढ़ने से भारत को अपने आप बड़ा फायदा नहीं मिल जाएगा। वास्तविक अवसर इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय कंपनियां कीमत, गुणवत्ता, सप्लाई क्षमता और डिलीवरी टाइम के मामले में कितनी प्रतिस्पर्धी रहती हैं।
इसके अलावा अलग-अलग उत्पादों पर लागू टैरिफ, कनाडा के इंपोर्ट नियम और भारत-कनाडा के बीच व्यापार समझौते की प्रगति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
CEPA से और मजबूत हो सकते हैं भारत-कनाडा कारोबारी रिश्ते
भारत और कनाडा के बीच CEPA वार्ता आगे बढ़ना भी इस पूरे समीकरण में महत्वपूर्ण है। अगर दोनों देशों के बीच व्यापार बाधाएं कम होती हैं और बाजार तक पहुंच बेहतर होती है, तो भारतीय कंपनियों के लिए कनाडा में एक्सपोर्ट बढ़ाना आसान हो सकता है।
एनर्जी, क्रिटिकल मिनरल्स, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने की उम्मीद भी दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई दिशा दे सकती है।
भारत के लिए मौका, लेकिन तैयारी भी जरूरी
कुल मिलाकर अमेरिका-कनाडा के बीच बढ़ता व्यापारिक तनाव भारत के लिए ‘चांस’ जरूर पैदा करता है, लेकिन यह अपने आप मिलने वाला फायदा नहीं है। भारतीय कंपनियों को इस अवसर को हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धी कीमत, बेहतर गुणवत्ता और भरोसेमंद सप्लाई चेन के साथ कनाडाई बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी।
अगर भारत-कनाडा व्यापार वार्ता भी सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है, तो अमेरिकी सप्लायर्स से दूरी बनाने वाली कनाडाई कंपनियों की बढ़ती मांग का एक हिस्सा भारतीय कंपनियां हासिल कर सकती हैं। इससे 2030 तक 50 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य की दिशा में भी भारत को बढ़त मिल सकती है।


