Share Market Weekly Update: भारतीय शेयर बाजार में लगातार तीसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है। बीते सप्ताह बाजार में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला और सेंसेक्स-निफ्टी सीमित दायरे में कारोबार करते रहे। हालांकि, सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन यानी 28 अगस्त को दोनों प्रमुख सूचकांक बढ़त के साथ बंद हुए। इसके बावजूद विदेशी निवेशकों की बिकवाली, महंगे क्रूड ऑयल और वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने बाजार पर दबाव बनाए रखा।
28 अगस्त को Nifty 84 अंक यानी 0.35 फीसदी की तेजी के साथ 24,175 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं, Sensex 330 अंक यानी 0.43 फीसदी चढ़कर 77,264 पर बंद हुआ। हालांकि, पूरे सप्ताह के आधार पर सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लाल निशान में रहे।
लगातार तीसरे सप्ताह बाजार में गिरावट
शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांकों में यह लगातार तीसरे सप्ताह की गिरावट है। बीते पांच महीनों में पहली बार ऐसा हुआ है, जब बाजार में गिरावट का सिलसिला लगातार तीन सप्ताह तक चला है।
पूरे सप्ताह में सेंसेक्स करीब 0.44 फीसदी नीचे रहा, जबकि निफ्टी में लगभग 0.47 फीसदी यानी 114 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने से निवेशकों की चिंता भी बढ़ी है।
हालांकि, सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में सेंसेक्स और निफ्टी की मजबूत क्लोजिंग ने बाजार को कुछ राहत जरूर दी। अब निवेशकों की नजर अगले सप्ताह के वैश्विक संकेतों और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर रहेगी।
BSE का मार्केट कैप करीब 1 लाख करोड़ रुपये घटा
बाजार में लगातार कमजोरी का असर कंपनियों के कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन पर भी पड़ा। सप्ताह के दौरान BSE पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब 1 लाख करोड़ रुपये कम हो गया।
इस गिरावट में रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारती एयरटेल और महिंद्रा एंड महिंद्रा जैसे बड़े शेयरों की भूमिका रही। इन कंपनियों के शेयरों में कमजोरी का असर प्रमुख सूचकांकों पर भी देखने को मिला।
दूसरी ओर, घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी DII की खरीदारी ने बाजार को कुछ हद तक सहारा दिया। हालांकि, विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII की लगातार बिकवाली बाजार के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है।
FII की बिकवाली से बाजार पर दबाव
विदेशी निवेशकों ने लगातार दूसरे सप्ताह भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली की। विदेशी पूंजी का बाहर निकलना आमतौर पर बाजार की धारणा पर नकारात्मक असर डालता है।
इसके मुकाबले घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी ने बाजार में गिरावट को सीमित करने का काम किया। यही वजह है कि बाजार में बड़ी गिरावट के बजाय फिलहाल सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
निवेशकों के लिए आने वाले दिनों में FII और DII के आंकड़े महत्वपूर्ण रहेंगे। अगर विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रहती है तो बाजार की तेजी पर दबाव बना रह सकता है।
मिडिलईस्ट संकट और महंगा क्रूड बना बड़ी चिंता
भारतीय शेयर बाजार के लिए वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी चुनौती बनी हुई हैं। खासकर मिडिलईस्ट में तनाव का असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ रहा है।
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बनी स्थिति ने कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। हालांकि, ईरान और ओमान के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने को लेकर बातचीत से क्रूड की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली है।
इसके बावजूद ब्रेंट क्रूड 88 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में लंबे समय तक महंगा क्रूड देश के आयात बिल, महंगाई और रुपये पर दबाव बढ़ा सकता है।
अमेरिका की ब्याज दरों पर भी बाजार की नजर
अमेरिका की मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर अनिश्चितता ने भी वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ाई है। फेडरल रिजर्व चेयरमैन केविन वॉर्श की हालिया टिप्पणी के बाद निवेशकों के बीच अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर सतर्कता बढ़ी है।
फेड अगर महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखता है या दरों में बढ़ोतरी की संभावना बनती है, तो इसका असर उभरते बाजारों पर पड़ सकता है। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें रहने की स्थिति में विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी एसेट्स अधिक आकर्षक हो सकते हैं।
इसका सीधा असर भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी के प्रवाह पर पड़ सकता है।
महंगा क्रूड बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव
भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी एक और बड़ी चिंता है। क्रूड महंगा होने पर परिवहन से लेकर उत्पादन लागत तक कई क्षेत्रों पर असर पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है।
अब निवेशकों की नजर अगस्त के रिटेल महंगाई के आंकड़ों पर रहेगी। यह डेटा सितंबर के दूसरे सप्ताह में जारी होने की उम्मीद है।
अगर महंगाई में उम्मीद से ज्यादा तेजी आती है तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की मौद्रिक नीति पर भी दबाव बढ़ सकता है। बाजार में यह आशंका मजबूत हो सकती है कि RBI आगे ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपना सकता है।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी या लंबे समय तक ऊंची दरें रहने से कंपनियों की उधारी लागत बढ़ सकती है और उनके कैपेक्स प्लान पर असर पड़ सकता है।
कंपनियों के अच्छे नतीजे बाजार को दे रहे हैं सहारा
बाजार के लिए पूरी तस्वीर नकारात्मक नहीं है। जून तिमाही में कई कंपनियों के वित्तीय नतीजे उम्मीद के मुताबिक मजबूत रहे हैं।
अच्छे कॉरपोरेट रिजल्ट यह संकेत देते हैं कि घरेलू अर्थव्यवस्था में मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। अगर आने वाली तिमाहियों में कंपनियों की कमाई और मार्जिन में सुधार जारी रहता है तो यह शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है।
हालांकि, फिलहाल वैश्विक जोखिम और कच्चे तेल की कीमतें बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
क्या बाजार में बड़ी गिरावट आने वाली है?
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के सीनियर टेक्निकल रिसर्च एनालिस्ट नागराज शेट्टी के मुताबिक निफ्टी का अंडरलाइंग ट्रेंड फिलहाल सीमित दायरे में रहने का संकेत दे रहा है।
इसके साथ ही India VIX करीब 3.5 फीसदी गिरकर 10.68 पर आ गया है। इसका अपने शॉर्ट-टर्म मूविंग एवरेज से नीचे रहना बाजार में तत्काल बड़ी घबराहट नहीं दिखाता।
इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में गिरावट का जोखिम पूरी तरह खत्म हो गया है, लेकिन मौजूदा संकेतों से फिलहाल किसी बड़ी और एकतरफा गिरावट की संभावना कम दिखाई देती है।
निवेशकों के लिए आगे क्या अहम रहेगा?
आने वाले सप्ताह में बाजार की दिशा कई महत्वपूर्ण फैक्टर्स से तय होगी। इनमें सबसे अहम होंगे:
- कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव
- अमेरिका की ब्याज दरों को लेकर संकेत
- विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीद-बिक्री
- अगस्त के महंगाई आंकड़ों को लेकर उम्मीदें
- ग्लोबल जियोपॉलिटिकल तनाव
- कंपनियों की कमाई और घरेलू मांग
कुल मिलाकर, Sensex और Nifty में फिलहाल सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है। घरेलू अर्थव्यवस्था और कंपनियों के मजबूत नतीजे बाजार को सपोर्ट दे रहे हैं, लेकिन महंगा क्रूड, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता तेजी को सीमित कर रही है।
इसलिए निवेशकों के लिए फिलहाल जल्दबाजी में बड़े फैसले लेने के बजाय बाजार की दिशा और प्रमुख आर्थिक संकेतकों पर नजर रखना महत्वपूर्ण रहेगा। अगर क्रूड की कीमतों में नरमी आती है और विदेशी निवेशकों की बिकवाली कम होती है, तो बाजार में दोबारा मजबूती देखने को मिल सकती है। दूसरी ओर, क्रूड और वैश्विक जोखिमों में बढ़ोतरी बाजार की रिकवरी को और टाल सकती है।


