भारत सरकार ने सोने और चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी में अचानक भारी बढ़ोतरी करके बुलियन मार्केट के पूरे समीकरण बदल दिए हैं। सरकार ने गोल्ड और सिल्वर पर बेसिक इंपोर्ट ड्यूटी को 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया है। वहीं प्लैटिनम पर टैक्स 6.4 फीसदी से बढ़ाकर 15.4 फीसदी कर दिया गया है। इस फैसले का असर केवल भारतीय ज्वेलरी बाजार तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि इसका सीधा फायदा दुबई को मिल सकता है।
थिंक टैंक ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) का मानना है कि भारत-यूएई फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी CEPA के चलते दुबई अब भारत के लिए गोल्ड इंपोर्ट का बड़ा हब बन सकता है। इसकी वजह दोनों देशों के बीच लागू विशेष टैरिफ व्यवस्था है, जो अब पहले से कहीं ज्यादा आकर्षक हो गई है।
नई दिल्ली में बुलियन ट्रेड और इंपोर्ट सेक्टर से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार का उद्देश्य भले ही गोल्ड इंपोर्ट को नियंत्रित करना और चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर दबाव कम करना हो, लेकिन नई ड्यूटी संरचना दुबई के जरिए होने वाले इंपोर्ट को तेजी से बढ़ा सकती है।
इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने से कैसे बदल गए पूरे समीकरण?
अब तक भारत में सोने पर सामान्य आयात शुल्क 6 फीसदी था। लेकिन बुधवार से लागू नए बदलाव के बाद यह बढ़कर 15 फीसदी हो गया है। इसका मतलब है कि भारत में सीधे दूसरे देशों से आने वाला सोना अब काफी महंगा पड़ेगा।
यहीं पर भारत-यूएई CEPA समझौता महत्वपूर्ण हो जाता है। इस समझौते के तहत यूएई यानी दुबई से आने वाले सोने पर भारत पहले से ही रियायती टैरिफ देता है। अभी तक यह अंतर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन नई ड्यूटी के बाद यह अंतर अचानक काफी बढ़ गया है।
GTRI के मुताबिक अब सामान्य MFN (Most Favoured Nation) रूट से आने वाले सोने पर 15 फीसदी ड्यूटी लगेगी, जबकि यूएई कोटे के तहत आने वाला सोना लगभग 14 फीसदी प्रभावी ड्यूटी पर भारत में प्रवेश कर सकेगा। आने वाले वर्षों में यह अंतर और बढ़ने वाला है।
दुबई क्यों बन सकता है सबसे बड़ा फायदा उठाने वाला देश?
दिलचस्प बात यह है कि यूएई खुद बड़ा गोल्ड माइनिंग देश नहीं है। इसके बावजूद दुबई दुनिया के सबसे बड़े बुलियन ट्रेडिंग हब्स में गिना जाता है। अफ्रीका, यूरोप और दूसरे एशियाई देशों से सोना दुबई पहुंचता है और फिर वहां से विभिन्न देशों को एक्सपोर्ट होता है।
अब भारत में ऊंची ड्यूटी लगने के बाद वैश्विक बुलियन सप्लाई चेन दुबई के जरिए भारत में एंट्री करने की कोशिश कर सकती है। इसका कारण सीधा है—कम टैरिफ और ज्यादा मार्जिन।
GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि नया टैक्स स्ट्रक्चर दुबई के रास्ते होने वाले इंपोर्ट के लिए बड़ा “आर्बिट्रेज अवसर” पैदा कर रहा है। यानी ट्रेडर्स अलग-अलग टैक्स दरों का फायदा उठाकर अतिरिक्त मुनाफा कमा सकते हैं।
उनके मुताबिक यह अंतर आने वाले वर्षों में और बढ़ेगा क्योंकि CEPA समझौते के तहत यूएई से आने वाले कुछ कीमती धातुओं पर ड्यूटी धीरे-धीरे घटती जाएगी। 2031 तक कुछ मामलों में यह शून्य तक पहुंच सकती है।
क्या है TRQ सिस्टम, जिसके कारण बढ़ रही है चिंता?
भारत ने यूएई के साथ समझौते के तहत गोल्ड इंपोर्ट के लिए टैरिफ रेट कोटा (TRQ) सिस्टम लागू किया था। इसके तहत तय मात्रा तक सोना कम शुल्क पर भारत में आयात किया जा सकता है।
यह कोटा 2022 में सालाना 120 टन से शुरू हुआ था। अब इसे धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है और 2027 तक यह 200 टन तक पहुंच सकता है। यह मात्रा भारत के कुल वार्षिक गोल्ड इंपोर्ट का लगभग एक-चौथाई मानी जा रही है।
यानी आने वाले समय में दुबई के जरिए भारत में गोल्ड एंट्री का रास्ता और चौड़ा हो सकता है।
चांदी में भी बड़ा बदलाव
केवल सोना ही नहीं, चांदी में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। CEPA समझौते के तहत भारत ने यूएई से आने वाली चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी को 10 साल में धीरे-धीरे घटाकर शून्य करने पर सहमति दी थी।
फिलहाल यूएई से आने वाली चांदी पर रियायती टैरिफ दर करीब 7 फीसदी है। जबकि सामान्य इंपोर्ट ड्यूटी अब काफी ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में सिल्वर ट्रेड में भी दुबई की भूमिका मजबूत हो सकती है।
भारत का गोल्ड इंपोर्ट आखिर इतना बड़ा क्यों है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड उपभोक्ता देशों में शामिल है। शादी-ब्याह, त्योहार, निवेश और ग्रामीण बचत संस्कृति की वजह से देश में सोने की मांग लगातार मजबूत बनी रहती है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया। यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में करीब 25 फीसदी ज्यादा है। वहीं चांदी के आयात में 150 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट, डॉलर में उतार-चढ़ाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और केंद्रीय बैंकों की गोल्ड खरीदारी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें पहले से ही ऊंचे स्तर पर हैं। ऐसे में भारत द्वारा ड्यूटी बढ़ाना घरेलू कीमतों को और ऊपर ले जा सकता है।
सरकार ने ड्यूटी इतनी ज्यादा क्यों बढ़ाई?
सरकार का मुख्य उद्देश्य संभवतः तीन बड़े मोर्चों पर दबाव कम करना है:
- बढ़ता ट्रेड डेफिसिट
- विदेशी मुद्रा पर दबाव
- गोल्ड इंपोर्ट बिल में तेजी
भारत कच्चे तेल के बाद सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा सोने के आयात पर खर्च करता है। जब गोल्ड इंपोर्ट तेजी से बढ़ता है, तब Current Account Deficit पर दबाव बढ़ने लगता है। यही कारण है कि सरकार समय-समय पर गोल्ड ड्यूटी में बदलाव करती रही है।
हालांकि इस बार की बढ़ोतरी काफी बड़ी मानी जा रही है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी ऊंची ड्यूटी से स्मगलिंग और वैकल्पिक इंपोर्ट चैनलों का जोखिम भी बढ़ सकता है।
क्या घरेलू बाजार में सोना और महंगा होगा?
ज्वेलरी कारोबारियों का मानना है कि नई ड्यूटी का असर आने वाले दिनों में रिटेल कीमतों पर दिख सकता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी तेजी बनी रहती है तो भारतीय बाजार में सोना रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंच सकता है।
शादी के सीजन और त्योहारों के पहले यह फैसला ज्वेलरी डिमांड को प्रभावित कर सकता है। हालांकि निवेशक वर्ग अब भी सोने को सुरक्षित निवेश मान रहा है।
नोटिफिकेशन की भाषा पर भी उठे सवाल
GTRI ने वित्त मंत्रालय से टैरिफ बदलाव से जुड़ी अधिसूचनाओं की भाषा को सरल बनाने की अपील की है। थिंक टैंक का कहना है कि मौजूदा नोटिफिकेशन इतने जटिल हैं कि आम ट्रेडर्स और छोटे इंपोर्टर्स के लिए उन्हें समझना मुश्किल हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नियम स्पष्ट नहीं होंगे तो अनुपालन लागत और विवाद दोनों बढ़ सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा मामला?
यह सिर्फ टैक्स बढ़ाने का मामला नहीं है। इसके पीछे भारत की ट्रेड पॉलिसी, विदेशी मुद्रा प्रबंधन, दुबई के साथ आर्थिक रिश्ते और वैश्विक बुलियन सप्लाई चेन का बड़ा खेल जुड़ा हुआ है।
अगर दुबई के रास्ते गोल्ड इंपोर्ट तेजी से बढ़ता है, तो आने वाले वर्षों में यूएई भारत के बुलियन ट्रेड में और ज्यादा रणनीतिक भूमिका निभा सकता है। वहीं सरकार को भी यह देखना होगा कि ऊंची ड्यूटी से घरेलू बाजार में अनचाहे प्रभाव न पैदा हों।
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