FCNR (B) Deposit Scheme: नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) के लिए शुरू की गई FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम को उम्मीद से कहीं ज्यादा शानदार रिस्पॉन्स मिला है। विदेशी मुद्रा के रूप में इस योजना में तेजी से पैसा आने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इसे तय समय से करीब एक महीने पहले बंद करने का फैसला किया है। अब इस विशेष डिपॉजिट विंडो की अंतिम तारीख 30 सितंबर 2026 के बजाय 31 अगस्त 2026 कर दी गई है।
13 अगस्त तक इस व्यवस्था के तहत FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए 52 अरब डॉलर से ज्यादा की राशि जुटाई जा चुकी थी। वहीं, स्वैप फैसिलिटी समेत कुल इनफ्लो करीब 57 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इतनी तेज रफ्तार से विदेशी मुद्रा आने के कारण इस स्कीम को समय से पहले बंद करने का फैसला किया गया है।
क्या है FCNR(B) Deposit Scheme?
FCNR(B) यानी Foreign Currency Non-Resident (Bank) Account एक ऐसी बैंक डिपॉजिट सुविधा है, जिसमें NRI ग्राहक अपनी विदेशी मुद्रा को भारत में बैंक डिपॉजिट के रूप में रख सकते हैं। इसकी खासियत यह है कि डिपॉजिट विदेशी मुद्रा में रहता है, इसलिए सामान्य रुपया डिपॉजिट की तुलना में करेंसी रिस्क का स्वरूप अलग होता है।
मौजूदा विशेष व्यवस्था के तहत बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद मिली। इसका उद्देश्य देश में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाना और रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम करने में मदद करना था।
हालांकि, जिस तेजी से इस सुविधा के जरिए पैसा आने लगा, उससे यह लक्ष्य अनुमान से पहले ही काफी हद तक पूरा होता दिखाई दिया। यही वजह है कि RBI ने अब इस विंडो को निर्धारित समय से पहले बंद करने का फैसला किया है।
52 अरब डॉलर से ज्यादा आया FCNR(B) डिपॉजिट
FCNR(B) स्कीम में इनफ्लो की रफ्तार पिछले कुछ दिनों में काफी तेज रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 13 अगस्त तक FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए 52 अरब डॉलर से अधिक की राशि आ चुकी थी।
इनफ्लो की रफ्तार को इस बात से समझा जा सकता है कि शुरुआती 20 अरब डॉलर जुटाने में करीब 38 दिन लगे थे। इसके बाद अगले 20 अरब डॉलर आने में सिर्फ 14 दिन का समय लगा। यानी जैसे-जैसे स्कीम को लेकर बाजार और बैंकों की सक्रियता बढ़ी, वैसे-वैसे विदेशी मुद्रा का प्रवाह भी तेज होता गया।
पिछले 13 दिनों में ही करीब 16 अरब डॉलर का इनफ्लो दर्ज किया गया। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा था कि अगस्त के आखिरी दिनों तक यह रफ्तार और बढ़ सकती है।
अगस्त के अंत तक कितना पैसा आ सकता है?
FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए आने वाले विदेशी फंड को लेकर बाजार विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों के अनुमान भी काफी मजबूत हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगस्त के अंत तक FCNR(B) डिपॉजिट से 65-75 अरब डॉलर तक का इनफ्लो देखने को मिल सकता है। अगर व्यापक स्वैप व्यवस्था को भी शामिल किया जाए, तो कुल इनफ्लो 80-100 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।
SBI Research ने इससे पहले अनुमान लगाया था कि अगर FCNR(B) रूट के जरिए निवेश की सुविधा सितंबर तक जारी रहती है, तो इसके माध्यम से करीब 70 अरब डॉलर तक का निवेश आ सकता है। यह 2013 में दर्ज किए गए विदेशी मुद्रा इनफ्लो के स्तर से भी काफी ज्यादा होता।
इस लिहाज से RBI का समय से पहले विंडो बंद करने का फैसला यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक अब अतिरिक्त विदेशी मुद्रा और उससे पैदा होने वाली लिक्विडिटी को भी संतुलित रखना चाहता है।
FCNR(B) स्कीम और रुपये पर क्या असर पड़ा?
इतना बड़ा डॉलर इनफ्लो आने के बावजूद रुपये में उतनी मजबूती देखने को नहीं मिली, जितनी सामान्य परिस्थितियों में उम्मीद की जा सकती थी।
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि RBI ने विदेशी मुद्रा के इनफ्लो का एक बड़ा हिस्सा अपने फॉरेन करेंसी एसेट्स को बढ़ाने में इस्तेमाल किया। यानी पूरी विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये को मजबूत करने के लिए नहीं आई।
आंकड़ों के अनुसार, 5 जून को डॉलर के मुकाबले रुपया 95.39 के स्तर पर बंद हुआ था। 14 अगस्त तक यह करीब 0.2 फीसदी कमजोर होकर लगभग 95.45 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया।
हालांकि, इस दौरान जुलाई के मध्य में रुपये ने कुछ मजबूती दिखाई और डॉलर के मुकाबले करीब 94.30 के स्तर तक पहुंच गया था। लेकिन इसके बाद रुपये की रिकवरी की रफ्तार कमजोर पड़ गई।
फिर रुपये को मजबूती क्यों नहीं मिली?
विदेशी मुद्रा का बड़ा इनफ्लो होने के बावजूद रुपये पर कई दूसरे कारकों का दबाव बना रहा। इनमें कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता और डॉलर की मांग जैसे कारण शामिल हैं।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात के जरिए पूरा करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा होता है, तो तेल आयात के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा, फॉरवर्ड मार्केट में भी ऐसी गतिविधियां नहीं दिखीं, जिससे RBI के लिए विदेशी मुद्रा प्रबंधन और आर्थिक हेजिंग अपेक्षाकृत आसान हो सके।
एक पूर्व केंद्रीय बैंकर के मुताबिक, RBI पिछले कुछ समय से रुपये की गिरावट को रोकने के लिए डॉलर की बिक्री भी कर रहा है। ऐसे में FCNR(B) से आने वाले अतिरिक्त डॉलर को लेकर केंद्रीय बैंक को विदेशी मुद्रा बाजार के साथ-साथ घरेलू लिक्विडिटी पर भी नजर रखनी पड़ रही है।
बैंक डिपॉजिट पर भी पड़ा बड़ा असर
FCNR(B) स्कीम का असर केवल विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहा है। इससे भारतीय बैंकों के डिपॉजिट बेस में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है।
15 जून से 31 जुलाई के बीच भारतीय बैंकों के टाइम डिपॉजिट में करीब 8.5 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई। इसमें FCNR डिपॉजिट का योगदान करीब 3-3.5 लाख करोड़ रुपये बताया जा रहा है।
SBI Research के अनुमान के मुताबिक, अगस्त के दौरान टाइम डिपॉजिट में करीब 5 लाख करोड़ रुपये की और बढ़ोतरी हो सकती है।
बैंकों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मजबूत डिपॉजिट बेस से उन्हें अपेक्षाकृत स्थिर फंडिंग मिलती है। इससे क्रेडिट ग्रोथ को सपोर्ट करने में मदद मिल सकती है और बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की स्थिति भी बेहतर हो सकती है।
सरकारी बॉन्ड यील्ड पर भी असर संभव
FCNR(B) के जरिए आने वाले अतिरिक्त फंड और बैंकिंग सिस्टम में बढ़ती लिक्विडिटी का असर सरकारी बॉन्ड बाजार पर भी पड़ सकता है।
अगर बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी रहती है और सरकारी सिक्योरिटीज की मांग मजबूत होती है, तो सरकारी बॉन्ड यील्ड में कमी आने की संभावना बन सकती है।
हालांकि, बॉन्ड यील्ड पर केवल FCNR(B) इनफ्लो का असर नहीं होता। RBI की मौद्रिक नीति, महंगाई, सरकारी उधारी, वैश्विक बॉन्ड यील्ड और विदेशी निवेश जैसे कई अन्य कारक भी इसकी दिशा तय करते हैं।
किन बैंकों को सबसे ज्यादा फायदा?
FCNR(B) डिपॉजिट से सरकारी और निजी दोनों तरह के बैंकों को फायदा मिला है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सरकारी बैंकों और निजी बैंकों की हिस्सेदारी करीब 42-42 फीसदी रही, जबकि विदेशी बैंकों की हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी रही।
विदेशी बैंकों में HSBC ने इस स्कीम के तहत करीब 6.1 अरब डॉलर जुटाए हैं। इसके बाद SBI और ICICI Bank जैसे बड़े बैंकों ने भी महत्वपूर्ण डिपॉजिट हासिल किए हैं।
इसके मुकाबले HDFC Bank की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम रही।
इससे साफ है कि FCNR(B) स्कीम का फायदा केवल विदेशी बैंकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय सरकारी और निजी बैंकों ने भी इसका इस्तेमाल विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए किया।
RBI ने समय से पहले क्यों बंद की स्कीम?
FCNR(B) विंडो को 30 सितंबर के बजाय 31 अगस्त को बंद करने के पीछे सबसे बड़ा कारण इसका उम्मीद से बेहतर रिस्पॉन्स माना जा रहा है।
जब किसी विशेष सुविधा के जरिए बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आने लगती है, तो एक स्तर के बाद केंद्रीय बैंक को यह भी देखना पड़ता है कि इससे सिस्टम में जरूरत से ज्यादा लिक्विडिटी तो नहीं बन रही और विदेशी मुद्रा बाजार पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है।
एक निजी बैंक के ट्रेजरी हेड के मुताबिक, FCNR(B) को मिले मजबूत रिस्पॉन्स ने संभवतः RBI को अपने शुरुआती प्लान में बदलाव करने के लिए प्रेरित किया।
उनके मुताबिक, अब स्कीम के जरिए फंड जुटाने का उद्देश्य काफी हद तक पूरा हो चुका है। ऐसे में RBI का फोकस इस अतिरिक्त लिक्विडिटी और फॉरेन एक्सचेंज मार्केट पर पड़ने वाले असर को मैनेज करने पर हो सकता है।
करूर वैश्य बैंक के ट्रेजरी हेड ने क्या कहा?
करूर वैश्य बैंक के ट्रेजरी हेड रामचंद्र रेड्डी के मुताबिक, स्कीम को समय से पहले बंद करना किसी बड़े नीतिगत बदलाव की बजाय मौजूदा परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाने जैसा दिखाई देता है।
उनका मानना है कि FCNR(B) सुविधा को जिस तरह का रिस्पॉन्स मिला है, उससे पता चलता है कि इसके जरिए फंड जुटाने का उद्देश्य काफी हद तक पूरा हो चुका है। अब RBI के सामने विदेशी मुद्रा और सिस्टम में आई अतिरिक्त लिक्विडिटी को प्रभावी तरीके से मैनेज करने की चुनौती है।
इसलिए स्कीम को समय से पहले बंद करने को एक बड़े पॉलिसी बदलाव के बजाय परिस्थितियों के अनुसार किया गया संतुलित और सीमित बदलाव माना जा सकता है।
रुपये के लिए इसका क्या मतलब है?
FCNR(B) विंडो का समय से पहले बंद होना रुपये के लिए सीधे तौर पर नकारात्मक संकेत नहीं है। एक तरफ, इस सुविधा के जरिए बड़ी मात्रा में डॉलर देश में आए हैं, जिससे भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति को सपोर्ट मिला है। दूसरी तरफ, RBI को इन डॉलर को सिस्टम में किस तरह मैनेज करना है, यह भी महत्वपूर्ण है।
अगर विदेशी मुद्रा का इनफ्लो मजबूत बना रहता है और क्रूड ऑयल जैसी बाहरी चुनौतियों का दबाव कम होता है, तो रुपये को आगे चलकर कुछ राहत मिल सकती है।
हालांकि, रुपये की दिशा केवल FCNR(B) डिपॉजिट से तय नहीं होगी। कच्चे तेल की कीमत, अमेरिकी डॉलर का प्रदर्शन, विदेशी निवेश, वैश्विक बाजारों की स्थिति, भारत का ट्रेड बैलेंस और RBI की नीतियां रुपये के लिए आगे भी अहम फैक्टर बने रहेंगे।
निष्कर्ष
FCNR(B) Deposit Scheme ने अपेक्षा से कहीं ज्यादा तेज प्रतिक्रिया हासिल की है। 13 अगस्त तक 52 अरब डॉलर से अधिक के FCNR(B) डिपॉजिट आने के बाद RBI ने इसकी विंडो को निर्धारित समय से एक महीने पहले बंद करने का फैसला किया है।
इससे एक तरफ भारतीय बैंकों को विदेशी मुद्रा और डिपॉजिट के मोर्चे पर फायदा मिला है, वहीं दूसरी तरफ RBI को अब सिस्टम में आई अतिरिक्त लिक्विडिटी और फॉरेन एक्सचेंज पर इसके असर को मैनेज करना होगा।
रुपये को लेकर तत्काल बड़ी मजबूती देखने को नहीं मिली है, लेकिन विदेशी मुद्रा का यह मजबूत इनफ्लो भारत के बाहरी वित्तीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में रुपये की चाल इस बात पर भी निर्भर करेगी कि क्रूड ऑयल, वैश्विक डॉलर और भू-राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं।
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